पश्चिम बंगाल के पूर्व बर्धमान जिले में आस्था और वन्यजीवों के अनोखे तालमेल का एक अद्भुत नजारा देखने को मिलता है। यहां के ग्रामीण इलाकों में जहरीले मोनोकोल्ड कोबरा को देखकर लोग डरकर भागते नहीं हैं और न ही उसे नुकसान पहुंचाने की कोशिश करते हैं। इसके विपरीत, ग्रामीण हाथ जोड़कर इस खतरनाक सांप का स्वागत करते हैं और इसे मां झांकेश्वरी का साक्षात स्वरूप मानते हैं। पीढ़ियों से चली आ रही इस परंपरा के कारण यहां इंसान और बेहद जहरीले सांप एक ही छत के नीचे बिना किसी खौफ के रहते हैं। गांव की गलियों, घरों के आंगनों और कमरों में खुलेआम घूमते इन कोबरा को लोग देवी का आशीर्वाद मानते हैं। दुनिया जहां इस जीव के नाम से भी खौफ खाती है, वहीं इन सात गांवों में लोग आस्था और श्रद्धा के साथ इसके साथ अपनी दिनचर्या बिताते हैं।
सात गांवों में फैली सदियों पुरानी अनोखी परंपरा
मां झांकेश्वरी के रूप में नागराज की पूजा की यह परंपरा केवल किसी एक छोटे इलाके तक सीमित नहीं है, बल्कि पूर्व बर्धमान के मंगलकोट क्षेत्र के सात अलग-अलग गांवों में निभाई जाती है। इनमें पालसोना गांव मुख्य केंद्र है, जबकि इसके आसपास स्थित छोटो पोशला, बड़ो पोशला, मुसारू, निगान, शिकोट्टर और मुकुंदापुर गांवों में भी यही धार्मिक मान्यता रची-बसी है। इन सभी गांवों में जहरीले कोबरा बिना किसी बाधा के लोगों के घरों, अनाज के भंडारों और रास्तों पर विचरण करते नजर आते हैं।
स्थानीय निवासियों के लिए यह महज एक धार्मिक कर्मकांड नहीं है, बल्कि उनकी भावनाओं से जुड़ी एक अटूट परंपरा है। ग्रामीणों का कहना है कि वे बचपन से ही इन जहरीले सांपों को अपने आसपास देखते आए हैं, जिससे उनके मन से डर पूरी तरह खत्म हो चुका है। लोगों का दृढ विश्वास है कि मां झांकेश्वरी हमेशा उनकी रक्षा करती हैं और इन सांपों ने कभी किसी ग्रामीण को बेवजह नुकसान नहीं पहुंचाया है। हर साल आयोजित होने वाले विशेष उत्सव के दौरान इस अनूठी परंपरा को देखने के लिए आसपास के इलाकों से हजारों श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है।
नाग का वैज्ञानिक पहलू और ग्रामीणों की अटूट श्रद्धा
वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो इन गांवों में जिस सांप की पूजा की जाती है, वह मोनोकोल्ड कोबरा यानी Naja kaouthia प्रजाति का जीव है। यह सांप अत्यधिक विषैला होता है और इसका जहर इंसानी तंत्रिका तंत्र पर तुरंत असर करता है, जिससे सही समय पर इलाज न मिलने पर इंसान की जान भी जा सकती है। इसके बावजूद, मंगलकोट के इन गांवों में लोग बिना किसी भय के सांपों के साथ रहते हैं।
इंसान और जहरीले सांपों के बीच इस अनोखे रिश्ते की मुख्य वजह आपसी व्यवहार है। ग्रामीण सांपों को देखकर घबराते नहीं हैं और न ही उन्हें परेशान या हमलावर महसूस कराते हैं। इसी कारण सांप भी इंसानों पर हमला नहीं करते। इस क्षेत्र में लोक आस्था का प्रभाव इतना गहरा है कि यदि कभी कोई सांप किसी व्यक्ति को काट भी ले, तो ग्रामीण इसे हादसा या हमला नहीं मानते। सामान्य बोलचाल में वे इसे सांप का काटना कहने के बजाय देवी का प्रसाद कहते हैं, जो दिखाता है कि यह मान्यता लोगों के जीवन में कितनी गहराई से समाई हुई है।
मनसामंगल लोककथा से जुड़ाव और वार्षिक उत्सव की रस्में
ग्रामीणों की इस धार्मिक मान्यता की जड़ें बंगाल की प्रसिद्ध मध्यकालीन लोककथा मनसामंगल से जुड़ी हुई हैं। इस पौराणिक कथा में देवी मनसा, बेहुला और लखिंदर का विवरण मिलता है, जिसमें नागों को देवी का प्रमुख वाहक और प्रतीक माना गया है। इसी लोककथा के आधार पर मंगलकोट के सात गांवों के लोग मानते हैं कि मां झांकेश्वरी उनके बीच जीवित कोबरा के रूप में निवास करती हैं।
हर साल आयोजित होने वाले वार्षिक उत्सव के दौरान पूरे क्षेत्र में भक्ति का माहौल रहता है। उत्सव का मुख्य आकर्षण देवी झांकेश्वरी की भव्य शोभायात्रा होती है, जिसे पूरे गांव में घुमाया जाता है। इसके अलावा, मंदिर परिसर में मिट्टी का घड़ा तोड़ने की एक विशेष रस्म निभाई जाती है। ग्रामीणों की मान्यता है कि इस टूटे हुए मिट्टी के घड़े का एक टुकड़ा अपने घर में रखने से जहरीले सांप कभी घर के भीतर प्रवेश नहीं करते। इस प्राचीन परंपरा और धार्मिक आयोजन में भाग लेने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं।
सरीसृप विशेषज्ञों की नजर में इंसान और सांप का अनूठा तालमेल
मां झांकेश्वरी की यह अनोखी परंपरा न केवल आम लोगों और श्रद्धालुओं को आकर्षित करती है, बल्कि वैज्ञानिकों और सरीसृप विशेषज्ञों के लिए भी अध्ययन का विषय बनी हुई है। भारत ही नहीं, बल्कि विदेशों से भी कई वन्यजीव विशेषज्ञ इन गांवों में आकर इस दुर्लभ सह-अस्तित्व को देख चुके हैं।
विशेषज्ञ धीमान भट्टाचार्य के अनुसार, इन गांवों में इंसानों और जहरीले सांपों के बीच हमलों की घटनाएं न के बराबर होने की मुख्य वजह व्यवहारिक है। चूंकि ग्रामीण इन सांपों को नुकसान नहीं पहुंचाते और न ही उन्हें देखकर हिंसक प्रतिक्रिया देते हैं, इसलिए सांप भी खुद को सुरक्षित महसूस करते हैं और रक्षात्मक हमला नहीं करते। यह परंपरा धार्मिक आस्था, प्राचीन लोककथा और वन्यजीव संरक्षण के एक बेहतरीन उदाहरण के रूप में सामने आती है, जो सिखाती है कि बिना किसी नुकसान के प्रकृति के साथ कैसे जिया जा सकता है।



















