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क्या है ‘मुठ’ परंपरा और धान रोपाई से पहले क्यों निभाई जाती है? जानिए सरगुजा की यह सदियों पुरानी रस्मकल्चर
13 जून 2026, 1:40 am (137 दिन पहले)· 3

क्या है ‘मुठ’ परंपरा और धान रोपाई से पहले क्यों निभाई जाती है? जानिए सरगुजा की यह सदियों पुरानी रस्म

छत्तीसगढ़ के सरगुजा में किसान धान बोने से पहले ‘मूठ निकालने’ की सदियों पुरानी परंपरा निभाते हैं, जिसमें शुभ मुहूर्त पर पांच मुट्ठी धान को हल्दी जल से शुद्ध कर खेत में पहली बोनी की जाती है।

छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में किसान आज भी सदियों पुरानी परंपरा के अनुसार ही धान की फसल की बुवाई की शुरुआत करते हैं। स्थानीय जानकारों का कहना है कि मानसून के आगमन से पहले गांव के हर घर में ‘मुठ’ निकालने की रस्म निभाई जाती है। यह परंपरा प्रकृति और खेती दोनों के प्रति लोगों के गहरे लगाव को दर्शाती है। इसके लिए किसान पहले शुभ मुहूर्त का इंतजार करते हैं, फिर बांस से बनी एक टोकरी, जिसे आम बोलचाल में ‘मुररी’ कहा जाता है, उसका उपयोग करते हैं। इसी टोकरी में किसान 5 मुठा धान रखते हैं और सूर्योदय से पहले स्नान कर हल्दी मिले पानी से उसका शुद्धिकरण करते हैं। इसी प्रक्रिया को ‘मुठ निकालना’ कहा जाता है।

शुभ मुहूर्त में पांच मुट्ठी धान से होती है खेती की शुरुआत

सरगुजा समेत आसपास के ग्रामीण अंचलों में धान की खेती आरंभ करने से पहले ‘मूठ निकालने’ की यह परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा और आस्था के साथ निभाई जाती है। स्थानीय जानकार सिकंदर प्रजापति बताते हैं कि यह रस्म उनके पूर्वजों और बुजुर्गों के समय से चली आ रही है, यही वजह है कि गांव के लोग इसे आज तक नहीं छोड़ते। मूठ निकालने की प्रक्रिया में किसान सबसे पहले शुभ तिथि और मुहूर्त का चयन करते हैं। इसके बाद पुराने धान के बीज की पांच मुट्ठियां अलग की जाती हैं और इन बीजों को बांस से बनी एक खास टोकरी में रखा जाता है, जिसे स्थानीय भाषा में ‘मुर्री’ कहा जाता है।

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हल्दी से शुद्धिकरण के बाद खेत में बोया जाता है धान

परंपरा के अनुसार किसान सुबह सूर्योदय से पहले स्नान करते हैं। इसके बाद मुर्री में रखे धान के बीजों पर हल्दी मिले पानी का छिड़काव कर उनका शुद्धिकरण किया जाता है। फिर किसान एक लोटा पानी और धान के बीज लेकर खेत पहुंचते हैं और वहां पहली बोनी करते हैं। इसी पूरी प्रक्रिया को ‘मूठ निकालना’ कहा जाता है।

मूठ निकलने के बाद ही शुरू होती है धान की बोनी

ग्रामीण मान्यता के अनुसार, मूठ निकालने के बाद ही धान की बोनी का काम आरंभ किया जाता है और किसान इसे खेती के नए सीजन का शुभारंभ मानते हैं। गांवों में आज भी लोग इस परंपरा का पालन करते हैं और इसे अच्छी फसल तथा समृद्धि से जोड़कर देखते हैं।

पूर्वजों की विरासत को सहेज रहे हैं ग्रामीण

सिकंदर प्रजापति के मुताबिक यह केवल एक धार्मिक या सांस्कृतिक परंपरा नहीं, बल्कि पूर्वजों की विरासत है। यही कारण है कि आधुनिक खेती के इस दौर में भी ग्रामीण इस परंपरा को पूरी आस्था के साथ निभा रहे हैं। उनका दावा है कि सरगुजा और बस्तर समेत देश के कई हिस्सों में आज भी ऐसी परंपराएं प्रचलित हैं, जो खेती और प्रकृति के प्रति लोगों के गहरे जुड़ाव को दर्शाती हैं।

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