हैदराबाद के ऐतिहासिक और चहल-पहल भरे बाज़ारों में अक्षरों और तख्तियों की दुनिया शहर के बीते दौर की अनूठी दास्तान सुनाती है। पुस्तक डिज़ाइनर रागिनी सिरुगुरी के मार्गदर्शन में हाल ही में आयोजित लेटरिंग लैंडस्केप्स वॉक के तहत तीस से ज्यादा कला प्रेमियों ने शहर के पारंपरिक बाज़ारों का दौरा किया। इस खास आयोजन का मुख्य उद्देश्य दुकानों पर लगे पुराने साइनबोर्डों, हाथ से रंगे अक्षरों और स्थानीय कारीगरी के जरिए हैदराबाद के सामाजिक इतिहास, व्यापारिक विकास और बहुभाषी मिजाज को समझना था। सुबह के समय मोअज्जम जाही मार्केट में जुटे लोगों ने देखा कि कैसे वाणिज्यिक तख्तियां सिर्फ व्यापार का साधन न होकर एक सांस्कृतिक दस्तावेज बन जाती हैं।
मोअज्जम जाही मार्केट में अक्षरों का ऐतिहासिक प्रभाव
इस धरोहर यात्रा की शुरुआत ऐतिहासिक मोअज्जम जाही मार्केट से हुई, जहां कारोबारियों द्वारा अपनी पहचान और स्थान को चिन्हित करने के दिलचस्प तरीके सामने आए। बाज़ार परिसर में रखी लोहे की कुर्सियों पर प्रसिद्ध दुकान का नाम स्टेंसिल के जरिए उकेरा गया है, जिससे बैठने वाला ग्राहक अनायास ही उस ब्रांड के प्रभाव में आ जाता है। इसके अलावा बाज़ार के मुख्य ढांचे पर 1935 में धातु से तैयार की गई उर्दू लिपि आज भी अपनी भव्यता और उस दौर की बेमिसाल वास्तुकला की गवाही देती है। यह कारीगरी दर्शाती है कि कैसे उस समय सार्वजनिक स्थानों और व्यापारिक केंद्रों पर अक्षरों की बनावट का विशेष ध्यान रखा जाता था।
उस्मानगंज की गलियों में कला और विविध माध्यमों का संगम
उस्मानगंज के बाज़ार में प्रवेश करते ही साइनबोर्डों की एक बहुरंगी और जीवंत दुनिया दिखाई देती है। यहां की दुकानों पर केवल आधुनिक प्लास्टिक के बोर्ड नहीं हैं, बल्कि लकड़ी, नियॉन, ऐक्रेलिक, हाथ से पेंट किए गए लोहे के पतरे और नक्काशीदार पत्थर जैसे विविध माध्यमों का इस्तेमाल मिलता है। कई प्रतिष्ठानों ने अपने नामों के शुरुआती अक्षरों को मिलाकर सुंदर मोनोग्राम और आर्ट डेको शैली के प्रतीक चिन्ह सीधे इमारतों की दीवारों पर उकेरे हैं। ये डिज़ाइन स्थानीय वास्तुशिल्प और कलात्मक समझ का बेहतरीन उदाहरण पेश करते हैं।
कारीगरों की विरासत और सौ साल पुराने बोर्ड
हाथ से तैयार किए गए ये बोर्ड अपने भीतर दोहरी यादें संजोए हुए हैं। इनमें एक तरफ दुकान की स्थापना का वर्ष दर्ज मिलता है, जैसे कि 1932 से संचालित प्रतिष्ठान, तो दूसरी तरफ उस बोर्ड को बनाने वाले स्थानीय पेंटर का नाम और संपर्क नंबर भी लिखा होता है। इस वॉक के दौरान एक चूल्हा ठीक करने वाली साधारण दुकान पर 100 साल से भी अधिक पुराना लकड़ी का बोर्ड देखने को मिला, जिसे दुकान मालिक ने आज तक पूरी हिफाजत और गर्व के साथ संभाल कर रखा है। बिना किसी औपचारिक डिज़ाइन संस्थान में पढ़े इन स्थानीय चित्रकारों ने रंगों के संतुलन, छाया और आकृतियों का ऐसा शानदार प्रयोग किया है, जिससे पेशेवर डिज़ाइनर भी बहुत कुछ सीख सकते हैं।
चार भाषाओं का अनूठा मेल और आधुनिक दौर में महत्व
उस्मानगंज के साइनबोर्डों की सबसे प्रमुख विशेषता उनका बहुभाषी स्वरूप है। यहां एक ही तख्ती पर तेलुगु, उर्दू, हिंदी और अंग्रेज़ी जैसी चार भाषाएं एक साथ सहज रूप से लिखी दिखाई देती हैं। हाईटेक सिटी जैसे आधुनिक तकनीकी इलाकों में जहां एक जैसी प्लास्टिक और फ्लेक्स शीट का बोलबाला है, वहीं इस पुराने बाज़ार में हाथ से लिखने और रंगने की परंपरा आज भी जीवित है। यह बहुभाषी शैली किसी बिखराव का संकेत नहीं, बल्कि भारत की साझी और समावेशी संस्कृति का सच्चा प्रमाण है। डिजिटल तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के इस युग में भी हाथ से बनाई गई यह लेटरिंग कला हैदराबाद की मूल आत्मा और मानवीय हुनर को महफूज़ रखे हुए है।



















