आज के डिजिटल दौर में जब संगीत सुनने के लिए केवल स्मार्टफोन पर एक क्लिक या छोटा ब्लूटूथ स्पीकर काफी होता है, उस समय लगभग आठ दशक पुरानी ध्वनि परंपरा को साक्षात देखना अपने आप में अनोखा अनुभव है. हैदराबाद में 1940 के दशक का एक बेहद दुर्लभ और विशाल कैबिनेट ग्रामोफोन आज भी अपने वास्तविक स्वरूप में पूरी तरह चालू हालत में मौजूद है. यह विंटेज संगीत उपकरण न सिर्फ उस समय की उच्च स्तरीय मैकेनिकल इंजीनियरिंग का नायाब नमूना है, बल्कि दक्कन की ऐतिहासिक विरासत और समृद्ध संगीत संस्कृति का जीवंत प्रतीक भी बना हुआ है.
नक्काशीदार शीशम की अलमारी में छिपा साउंड सिस्टम
साढ़े तीन फीट ऊंचा यह अनूठा ग्रामोफोन बाहर से देखने पर किसी खूबसूरत पारंपरिक अलमारी जैसा नजर आता है. इसे प्रीमियम शीशम की नक्काशीदार लकड़ी से तैयार किया गया है. बीसवीं सदी के शुरुआती दशकों में इस तरह के कैबिनेट ग्रामोफोन केवल शाही महलों, नवाबों या अत्यंत संपन्न घरानों में ही देखने को मिलते थे. आम ग्रामोफोन के उलट इसमें बाहर की तरफ कोई बड़ा पीतल का भोंपू या हॉर्न नहीं लगाया गया है. इसके बजाय कैबिनेट के आंतरिक हिस्से में ही साउंड बॉक्स और हॉर्न को लकड़ी की बारीक जालीदार नक्काशी के पीछे छिपाया गया है, जिससे ध्वनि बेहद संतुलित होकर बाहर आती है. अलमारी के सामने की तरफ ब्रास के मजबूत और चमकदार लॉक लगे हैं, जो इसे एक क्लासिक एंटीक अलमारी का रूप देते हैं.
निज़ाम कालीन इतिहास की दुर्लभ झलक
जब इस विंटेज कैबिनेट के ऊपरी हिस्से का ढक्कन उठाया जाता है, तो अंदर टर्नटेबल के ठीक सामने हैदराबाद के तत्कालीन शासक से जुड़ी एक ऐतिहासिक तस्वीर दिखाई देती है. इस ऐतिहासिक चित्र पर अंग्रेजी और उर्दू भाषा में लिखा है कि दिल्ली से वापसी पर निज़ाम को एक मानपत्र भेंट किया गया था. यह दुर्लभ दस्तावेज इस ग्रामोफोन को सीधे तौर पर हैदराबाद के ऐतिहासिक आसफ जाही दौर और दिल्ली दरबार से जुड़े अहम पलों से जोड़ता है. संगीत के साथ इतिहास का ऐसा संगम किसी भी धरोहर प्रेमी को आकर्षित करने के लिए पर्याप्त है.
बिना बिजली सिर्फ चाबी से घूमता है 78 आरपीएम का रिकॉर्ड
इस विंटेज प्लेयर की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसे चलाने के लिए बिजली या किसी बैटरी की कतई जरूरत नहीं पड़ती. यह पूरी तरह से शुद्ध मैकेनिकल तकनीक पर आधारित है. कैबिनेट के एक तरफ हाथ से घुमाने वाला एक विशेष हैंडल दिया गया है, जिसकी मदद से अंदर मौजूद स्प्रिंग में चाबी भरी जाती है. चाबी भरने के बाद जैसे ही गियर चालू किया जाता है, टर्नटेबल पर रखा 78 आरपीएम का विनाइल रिकॉर्ड अपनी तय गति से घूमने लगता है. जब ग्रामोफोन का साउंड बॉक्स और उसकी सुई हिज मास्टर्स वॉयस के काले रिकॉर्ड पर टिकती है, तो शीशम के बक्से से निकलने वाला मधुर संगीत कमरे में 80 साल पुराने दौर की यादें ताजा कर देता है. संगीत इतिहास और दुर्लभ संग्रह के शौकीनों के लिए यह आज भी एक अनमोल खजाना है.



















