भौगोलिक सीमाओं और सैकड़ों वर्षों के लंबे अंतराल के बावजूद अपनी मूल जड़ों से जुड़ाव कभी खत्म नहीं होता, इसका जीवंत उदाहरण उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर में देखने को मिल रहा है। सुशांत महासागर के द्वीप देश फिजी से हजारों मील की दूरी तय करके कौशिक तरुण कुमार इन दिनों सुल्तानपुर की धरती पर भारतीय सनातन परंपराओं का अध्ययन कर रहे हैं। यहां की विख्यात दुर्गा पूजा, पारंपरिक रामलीला, शास्त्रीय संगीत और प्राचीन आयुर्वेद ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया है। चार पीढ़ियों के लंबे अंतराल के बाद किसी वंशज का अपनी माटी की ओर इस तरह लौटना सांस्कृतिक धरोहर की अटूट ताकत को दर्शाता है।
लम्बासा द्वीप से सुल्तानपुर तक का ऐतिहासिक सफर
कौशिक तरुण कुमार का भारत से संबंध महज एक साधारण पर्यटक या जिज्ञासु का नहीं है, बल्कि उनके परिवार का अतीत सीधे तौर पर इस मुल्क की मिट्टी से जुड़ा हुआ है। ब्रिटिश शासनकाल के दौरान उनके पुरखों को मजदूरी कराने के उद्देश्य से भारत से सुदूर फिजी ले जाया गया था। उस दौर में अनगिनत परिवारों को गिरमिटिया मजदूर बनाकर अलग-अलग ब्रिटिश उपनिवेशों में बसाया गया था, जिनमें कौशिक का परिवार भी शामिल था। समय बीतने के साथ परिवार फिजी के लम्बासा द्वीप पर स्थायी रूप से बस गया और वहीं उनकी नई पीढ़ियां पली-बढ़ीं। चार पीढ़ियां बीत जाने के बाद भी परिवार के भीतर भारतीय संस्कारों और मान्यताओं की लौ जलती रही, जिसने आखिरकार कौशिक को अपनी पैतृक थाती की खोज में भारत खींच लिया।
शास्त्रीय संगीत और सुल्तानपुर की ऐतिहासिक दुर्गा पूजा का अध्ययन
सुल्तानपुर प्रवास के दौरान कौशिक तरुण कुमार अपना पूरा समय यहां की कला और धार्मिक विधाओं को सीखने में समर्पित कर रहे हैं। वे यहां के सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ राकेश्वर मालवीय से पारंपरिक संगीत की बारीकियां सीख रहे हैं। संगीत साधना के साथ ही उनका मन सुल्तानपुर के प्रसिद्ध और ऐतिहासिक दुर्गा पूजा महोत्सव में भी पूरी तरह रम गया है। सुल्तानपुर में आयोजित होने वाली दुर्गा पूजा की अलौकिक छटा, भव्य पंडाल और वहां का सामूहिक सामाजिक उत्साह उन्हें चकित करता है। कौशिक केवल इस आयोजन के दर्शक बनकर नहीं रहना चाहते, बल्कि वे पूजा की पूरी पद्धति, कर्मकांड की विधियों और धार्मिक अनुष्ठानों को विधिवत सीख रहे हैं। इसके साथ ही वे स्थानीय रामलीला के मंचन और उसकी नाट्य परंपराओं का भी गंभीरता से अध्ययन कर रहे हैं, ताकि वे इन कलाओं को समझकर आत्मसात कर सकें।
आयुर्वेद और पारंपरिक ज्ञान को जीवन में उतारने की कोशिश
कौशिक की सीखने की ललक केवल संगीत, रामलीला और कर्मकांड तक ही सीमित नहीं है। वे भारत की प्राचीन चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद का ज्ञान लेने के लिए भी सक्रिय प्रयास कर रहे हैं। इसके लिए वे सुल्तानपुर में चिकित्सक विवेक कुमार श्रीवास्तव के मार्गदर्शन में आयुर्वेद के आधारभूत सिद्धांतों, जड़ी-बूटियों और जीवनशैली से जुड़े नियमों की शिक्षा ले रहे हैं। संगीत, आध्यात्मिक अनुष्ठान और आयुर्वेद का यह समन्वय दर्शाता है कि वे भारतीय ज्ञान की समग्र जीवनशैली को समझना चाहते हैं। उनका यह सफर स्पष्ट करता है कि पीढ़ियों का फासला भी अपनी संस्कृति और जड़ों के प्रति आत्मिक प्रेम को धुंधला नहीं कर सकता। सुल्तानपुर की ऐतिहासिक दुर्गा पूजा और सांस्कृतिक वातावरण उनके लिए पूर्वजों की स्मृतियों से संवाद करने का एक सशक्त माध्यम बन चुका है।























