चारमीनार से चंद कदम की दूरी पर एक ऐसी इमारत खड़ी है, जिसके सामने से हर दिन हज़ारों सैलानी और खरीदार गुज़रते हैं, लेकिन बहुत कम लोगों को पता है कि इसकी दीवारों में करीब एक सदी पुरानी सेवा और इलाज की कहानी दफन है. यह इमारत है गवर्नमेंट निज़ामिया जनरल हॉस्पिटल, जिसे स्थानीय लोग चारमीनार दवाखाना के नाम से जानते हैं. आधुनिक चिकित्सा के इस दौर में भी यह अस्पताल हैदराबाद की पारंपरिक यूनानी चिकित्सा पद्धति का एक मजबूत और जिंदा स्तंभ बना हुआ है.
निज़ाम के दौर की नींव
इस दवाखाने की स्थापना साल 1926 में हुई थी, यानी आज इसका इतिहास करीब एक सदी पुराना हो चुका है. इसे हैदराबाद के सातवें और अंतिम निज़ाम मीर उस्मान अली खान के शासनकाल में बनवाया गया था, जिनका दौर शहर में कई जनकल्याण की परियोजनाओं और ऐतिहासिक इमारतों के निर्माण के लिए जाना जाता है. मीर उस्मान अली खान इसी तरह के कामों के लिए मशहूर थे, और चारमीनार दवाखाना उन्हीं की दूरदर्शी सोच का एक बेहतरीन नतीजा माना जाता है.
इंडो-सार्सेनिक वास्तुकला की मिसाल
चारमीनार दवाखाना सिर्फ अपनी चिकित्सा सेवाओं के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी बनावट के लिए भी उतना ही मशहूर है. यह इमारत इंडो-सार्सेनिक वास्तुकला शैली का एक बेहतरीन नमूना है, और इसकी खासियतें दूर से ही नज़र आ जाती हैं. ऊंची छतें, बुलंद और विशाल मेहराबें तथा नक्काशीदार पत्थर के खंभे इसे अपना अलग रंग-रूप देते हैं, और यही वे बारीकियां हैं जो इसे हैदराबाद की सबसे खूबसूरत हेरिटेज इमारतों में शुमार करती हैं.
आज भी जिंदा है यूनानी इलाज की परंपरा
एक तरफ जहां लोग तेजी से एलोपैथी की तरफ भाग रहे हैं, वहीं इस दवाखाने में पारंपरिक यूनानी इलाज की रिवायत कभी फीकी नहीं पड़ी और आज भी पूरी तरह जिंदा है. हर दिन सैकड़ों मरीज अपनी पुरानी, दीर्घकालिक और जटिल बीमारियों के इलाज के लिए खासतौर पर इसी दवाखाने का रुख करते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि ऐसी बीमारियों का सबसे बेहतर इलाज पारंपरिक तरीके से ही मुमकिन है. यही मरीजों का लगातार भरोसा है जिसने इस अस्पताल को दशकों बाद भी उतना ही प्रासंगिक बनाए रखा है.
यूनानी तालीम और तर्बियत का बड़ा केंद्र
चारमीनार दवाखाना सिर्फ मरीजों के इलाज तक सीमित कभी नहीं रहा, बल्कि यह यूनानी तिब की तालीम और ट्रेनिंग का भी एक बड़ा केंद्र रहा है. दशकों से यहां जुड़े उलेमा और हकीमों ने यूनानी मेडिसिन के इल्म को बड़ी सावधानी से संभालकर रखा है, और आधुनिक चिकित्सा पद्धतियों के बढ़ते दबदबे के बावजूद इसे फीका नहीं पड़ने दिया. इतना ही नहीं, उन्होंने इस इल्म को नई पीढ़ियों तक भी पहुंचाया है, और इसी वजह से हैदराबाद की यह खास परंपरा आज भी अमर और जिंदा बनी हुई है.
वक्त के साथ खड़ी एक जिंदा विरासत
करीब सौ साल गुजर जाने के बाद भी चारमीनार दवाखाना ठीक वहीं खड़ा है जहां यह पहले दिन से खड़ा था, और यह अपनी पुरानी रिवायत तथा अवाम की खिदमत के जज्बे को उतनी ही शिद्दत से संभाले हुए है. यह इमारत हैदराबाद के इतिहास की सबसे खूबसूरत और सबसे जिंदा मिसालों में से एक है, जो आज भी उसी मकसद के साथ आम मरीजों की सेवा कर रही है, जिसके लिए इसे एक सदी पहले बनाया गया था.



















