हैदराबाद के मशहूर आबिड्स संडे बुक मार्केट की रौनक इन दिनों फीकी पड़ती दिखाई दे रही है। स्मार्टफोन के बढ़ते इस्तेमाल और ऑनलाइन ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स की सहज उपलब्धता ने पठन-पाठन की पारंपरिक आदतों में गहरा बदलाव ला दिया है। दशकों से सड़क किनारे लगने वाला यह ऐतिहासिक बाजार, जो कभी हर रविवार को पुस्तक प्रेमियों की चहल-पहल से गुलजार रहता था, अब ग्राहकों की राह देखने को मजबूर है।
दो दशकों में बदला नजारा, 80 प्रतिशत तक गिरा धंधा
आबिड्स क्षेत्र में पिछले 40 वर्षों से पुस्तक विक्रेता के रूप में काम कर रहे राहाबा बुक सेंटर के संचालक फारूक और उनके बड़े भाई मोहम्मद आरिफुद्दीन के अनुसार, पिछले दो दशकों के दौरान उनके व्यापार में 75 से 80 प्रतिशत की भारी गिरावट दर्ज की गई है। फारूक बताते हैं कि लगभग 15 से 20 वर्ष पहले स्थिति एकदम अलग हुआ करती थी। उस दौर में रविवार के दिन बाजार में इतनी भीड़ उमड़ती थी कि दुकानदारों को ग्राहकों से बात करने या कुछ पल सांस लेने तक की फुर्सत नहीं मिलती थी।
ई-कॉमर्स, ई-बुक्स और मोबाइल स्क्रीन की दोहरी मार
आज के आधुनिक इंटरनेट युग में परिदृश्य पूरी तरह बदल चुका है। अमेज़न जैसे ऑनलाइन शॉपिंग प्लेटफॉर्म्स के प्रचलन और डिजिटल ई-बुक्स की बढ़ती पहुंच ने पुरानी किताबों की फुटपाथ दुकानों की चमक छीन ली है। स्थानीय विक्रेताओं का मानना है कि घर पर ही किताबें डिलीवर हो जाने की सुविधा और सस्ता डेटा मिलने की वजह से लोग अब भौतिक दुकानों तक आने से कतराते हैं। इसके साथ ही, बच्चों और युवाओं में किताबों के प्रति रुचि कम होना भी इस स्थिति का मुख्य कारक है। आज की नई पीढ़ी अपना अधिकांश खाली समय किताबों के पन्ने पलटने के बजाय मोबाइल फोन की स्क्रीन पर बिता रही है।
सस्ती दरों पर हर वर्ग के लिए उपलब्ध हैं पुस्तकें
आबिड्स का यह संडे मार्केट हमेशा से अपनी व्यापक विविधता और किफायती दामों के लिए विख्यात रहा है। यहाँ पाठकों के लिए हर श्रेणी की पुस्तकें बड़े डिस्काउंट पर मिल जाती हैं। इस बाजार में सामान्य ज्ञान की किताबों से लेकर फिक्शन, नॉवेल्स, कॉमिक्स, कहानियों की पुस्तकें और विभिन्न कॉम्पिटिटिव एग्जाम्स की तैयारी से जुड़ी पठन सामग्री बेहद कम कीमत पर बेची जाती है।
किताबों में निवेश ही बनाएगा उज्ज्वल भविष्य
व्यापार पर मंडराते इस संकट के बीच स्थानीय विक्रेताओं ने समाज और अभिभावकों से अध्ययन संस्कृति को पुनर्जीवित करने की भावुक अपील की है। फारूक का कहना है कि पढ़ने की प्रक्रिया कभी रुकनी नहीं चाहिए। जब माता-पिता स्वयं पुस्तकें पढ़ेंगे, तभी बच्चे उनसे प्रेरणा लेकर किताबों की दुनिया से जुड़ेंगे। उनका मानना है कि किताबों पर खर्च किया गया पैसा कभी व्यर्थ नहीं जाता, बल्कि यह भविष्य के निर्माण के लिए किया गया एक बेहतरीन निवेश है। इससे न केवल पुराने विक्रेताओं की आजीविका को सहारा मिलेगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों में भी पठन-पाठन की परंपरा बनी रहेगी।



















