गुलाबी नगर जयपुर सदियों से अपनी अनूठी दस्तकारी, शिल्पकला और समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर के लिए पहचाना जाता रहा है। यहां की हस्तकलाएं पीढ़ियों के अनुभव और समर्पण से संवरती आई हैं, जिनमें से एक अत्यंत लोकप्रिय विधा जयपुर की ब्लू पॉटरी है। अन्य धातुओं और चीनी मिट्टी से बने बर्तनों व सजावटी सामानों के बीच आज भी इस खास नीली मिट्टी के काम की मांग दुनिया भर में बनी हुई है। ऐतिहासिक रूप से नीले रंग के बर्तनों के निर्माण की यह अनूठी कला 16वीं और 17वीं शताब्दी के दौरान मुगल शासनकाल में फारस से भारत पहुंची थी। भारत आने के बाद इस कला का सफर जयपुर में परवान चढ़ा और आधुनिक दौर में इसके वास्तविक जनक के रूप में श्री कृपाल सिंह शेखावत को ख्याति मिली। वर्तमान में उनका परिवार इसी समृद्ध कला परंपरा को निरंतर आगे बढ़ाने में जुटा हुआ है।
सवाई राम सिंह शिल्प कला मंदिर और खोई कला की वापसी
इस कला के विकास और पुनरुद्धार की कहानी बेहद दिलचस्प है। वर्ष 1868 में जयपुर के तत्कालीन महाराजा सवाई राम सिंह ने शहर में एक विशेष शिल्प विद्यालय की स्थापना करवाई थी ताकि स्थानीय कारीगरी को बढ़ावा मिल सके। समय बीतने के साथ एक दौर ऐसा भी आया जब कभी बेहद प्रसिद्ध रही जयपुर की यह नीली कला लगभग विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गई थी। इसके बाद वर्ष 1963 में एक बड़ा मोड़ आया, जब कोलकाता के शांति निकेतन और जापान के टोक्यो विश्वविद्यालय से उच्च प्रशिक्षित विख्यात कलाकार श्री कृपाल सिंह शेखावत को जयपुर स्थित सवाई राम सिंह शिल्प कला मंदिर का निदेशक बनाया गया। कार्यभार संभालने के बाद उन्होंने लुप्तप्राय हो चुकी इस कला को पुनर्जीवित करने का बीड़ा उठाया। उन्होंने पुरानी सीमाओं को तोड़ते हुए नई भट्टियों, आधुनिक डिज़ाइनों और नए रंग संयोजनों के साथ पूरे काम की नए सिरे से शुरुआत की।
कृपाल कुंभ की शुरुआत और रंगों का नया संसार
ब्लू पॉटरी को नया जीवन देने में श्री कृपाल सिंह शेखावत का योगदान ऐतिहासिक माना जाता है। 1960 के दशक के उत्तरार्ध में उन्होंने “कृपाल कुंभ” की स्थापना की, जिसके माध्यम से इस शिल्पकला में कई क्रांतिकारी और अनूठे प्रयोग किए गए। इससे पहले इस कला में केवल पारंपरिक नीले रंग का ही उपयोग होता था, जिससे इसकी विविधता सीमित थी। कृपाल सिंह शेखावत ने इस परंपरा में बड़ा बदलाव करते हुए पीले, हरे, भूरे और काले रंगों के अनगिनत शेड्स तैयार किए। इन नए रंगों के जुड़ने से बर्तनों को एक बिल्कुल नया और आकर्षक रूप मिला। इसके साथ ही उन्होंने केवल पारंपरिक आकारों तक सीमित न रहकर बर्तनों को कई नए आधुनिक आकार और बारीक रूपांकन दिए, जिससे यह कला अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराही जाने लगी।
मूल रूप से झुंझुनू जिले के श्रीमाधोपुर के एक साधारण गांव से ताल्लुक रखने वाले कृपाल सिंह शेखावत ने अपनी असाधारण प्रतिभा के दम पर देश के शीर्ष हस्तशिल्प कलाकारों में अपनी खास पहचान बनाई। कला क्षेत्र में उनके इस अतुलनीय योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें वर्ष 1974 में प्रतिष्ठित पद्म श्री सम्मान से नवाजा। इसके बाद हस्तकला के क्षेत्र में उनके दीर्घकालिक योगदान को सम्मान देते हुए वर्ष 2002 में उन्हें भारत सरकार की ओर से शिल्प गुरू की सर्वोच्च उपाधि भी प्रदान की गई।
क्वार्ट्ज, कांच और धात्विक ऑक्साइड से निर्माण प्रक्रिया
पारंपरिक ब्लू पॉटरी के बर्तन तैयार करने की विधि आम मिट्टी के बर्तनों से पूरी तरह भिन्न और जटिल होती है। इस कला का आधार कोबाल्ट से मिलने वाला खास नीला रंग है, जो फारस में पाया जाता है। फारसी भाषा में कोबाल्ट को ज़फ़र नाम से जाना जाता है, जबकि कोबाल्ट युक्त रेत को गिल-ए-लज्वर्थ कहा जाता है, जो लैपिस लाजुली या लज्वर्थ से जुड़ी है। इन बर्तनों को बनाने के लिए सामान्य चिकनी मिट्टी की जगह मुख्य रूप से क्वार्ट्ज और कांच का उपयोग होता है। क्वार्ट्ज और पिसे हुए कांच में थोड़ी मात्रा में मुल्तानी मिट्टी मिलाकर एक विशेष मिश्रण तैयार किया जाता है।
इस मिश्रण से बर्तन तैयार करने के बाद उन्हें सैंडपेपर की मदद से पूरी तरह चिकना और एकसमान बनाया जाता है। चिकनी सतह तैयार होने पर बर्तनों पर स्लिप-कवर की परत चढ़ाई जाती है, जिसके बाद कारीगर उन पर बारीक आकृतियां और डिज़ाइन उकेरते हैं। इसके बाद बर्तनों में धात्विक ऑक्साइड से तैयार किए गए प्राकृतिक रंग भरे जाते हैं। गहरा नीला रंग तैयार करने के लिए कोबाल्ट का उपयोग होता है, जबकि मनमोहक हल्का नीला रंग तांबे के ऑक्साइड से हासिल किया जाता है। रंगाई पूरी होने के बाद इन बर्तनों पर एक पारदर्शी परत यानी ग्लेजिंग चढ़ाई जाती है और फिर उन्हें भट्टी में उच्च तापमान पर पकाया जाता है। इस संपूर्ण रासायनिक और शिल्प प्रक्रिया के बाद ही चमकदार ब्लू पॉटरी तैयार होती है।
नई पीढ़ी के हाथों में विरासत की कमान
कृपाल सिंह शेखावत द्वारा स्थापित इस गौरवशाली कला धरोहर को आज उनकी बेटियां पूरी निष्ठा के साथ आगे बढ़ा रही हैं। उनकी बेटी मीनाक्षी राठौड़ अपनी बहन मुकुंद राठौड़ के साथ मिलकर इस पुश्तैनी हुनर को न केवल सहेजे हुए हैं, बल्कि इसे वैश्विक स्तर पर नई ऊंचाइयों तक पहुंचा रही हैं। पारंपरिक तकनीकों की शुद्धता बनाए रखते हुए आधुनिक बाजार की मांग के अनुरूप बनाए जा रहे इन शिल्पों के दम पर दोनों बहनों ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है। हस्तशिल्प और कला के क्षेत्र में निरंतर उत्कृष्ट योगदान देने के लिए उन्हें प्रतिष्ठित राष्ट्रीय पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है, जो इस बात का प्रमाण है कि शेखावत परिवार की यह विरासत आज भी पूरी मजबूती से फल-फूल रही है।


















