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गांवों में झूले गायब, बेटियों की मायके वाली सावन की रौनक अब पहले जैसी नहींकल्चर
5 अग॰ 2026, 3:27 pm (2 घंटे पहले)· 1

गांवों में झूले गायब, बेटियों की मायके वाली सावन की रौनक अब पहले जैसी नहीं

सावन के महीने में जो गांव कभी झूलों और मायके आई बेटियों की रौनक से गुलजार रहते थे, वहां अब सन्नाटा है। बदलती परंपराओं और मोबाइल की लत ने गांव की पुरानी तस्वीर बदल दी है।

देशभर में सावन का पवित्र महीना चल रहा है और शिव मंदिरों में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ रही है। अध्यात्म की नजर से यह महीना जितना खास माना जाता है, सामाजिक और पारंपरिक तौर पर भी इसकी उतनी ही अहमियत रही है। लेकिन गांवों में जो सावन कभी अपने अलग रंग और उत्साह के लिए जाना जाता था, वह अब धीरे धीरे बीते दिनों की बात बनता जा रहा है।

आज से करीब दस साल पीछे जाएं तो सावन के महीने गांव देहात में एक अलग ही चहल पहल दिखती थी। महीना शुरू होते ही ब्याही बेटियां मायके आने की तैयारियों में जुट जाती थीं। मायके पहुंचने के बाद सहेलियों से मुलाकात और पुरानी यादों को फिर से जीने का सिलसिला शुरू हो जाता था। इसी दौर में सावन के झूलों का मजा लेना शायद ही कोई छोड़ता था। महीने की शुरुआत होते ही गांव में जिस तरफ नजर जाती, वहां झूले टंगे नजर आते और उनके इर्द गिर्द बच्चों की भीड़ लगी रहती थी। आज हालात इतने बदल चुके हैं कि ऐसा नजारा कहीं दिखता ही नहीं, या फिर बहुत मुश्किल से किसी कोने में झलक भर मिल जाती है।

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बगीचों से गायब हुए झूले

पहले सावन में बगीचों में और गांव के जिस भी हिस्से में पेड़ होते थे, वहां झूले जरूर टंगे मिलते थे। अब हालत यह है कि पेड़ पर झूला दिखना ही एक दुर्लभ बात हो गई है। जो झूले कभी गांव की परंपरा का अभिन्न हिस्सा हुआ करते थे, वे अब कहीं नजर ही नहीं आते। पुराने दौर में बच्चों का बचपन असल मायने में बचपन जैसा दिखता था, जो किसी डिजिटल गैजेट की स्क्रीन में नहीं बल्कि अपने आसपास के माहौल में गुजरता था। आज तस्वीर पूरी तरह उलट चुकी है। गांव के बाहर जो खुला मैदान हुआ करता था, वहां भी अब बच्चे खेलते नजर नहीं आते। आजकल बच्चे अगर कहीं व्यस्त दिखते हैं तो वह सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर, जहां वे अपना ज्यादातर समय बिता रहे हैं और असली बचपन को जी ही नहीं पा रहे। जहां पहले सावन के पूरे महीने बगीचे में या घर के पास किसी पेड़ के नीचे बच्चे झूला झूलते दिखते थे, वहीं अब वही बच्चे अपना कीमती वक्त मोबाइल की स्क्रीन में गुजार रहे हैं। इसका नतीजा यह हो रहा है कि उनमें मोबाइल और दूसरे गैजेट्स की लत बढ़ रही है और साथ ही समाज से उनकी दूरी भी बढ़ती जा रही है। कई बच्चों में तो गैजेट्स की आदत इतनी गहरी हो चुकी है कि वे उसके बिना एक पल भी रहना नहीं चाहते।

बेटियों के लिए खास होता था यह महीना

सोशल मीडिया और गैजेट्स की यह लत सिर्फ बच्चों तक सीमित नहीं, बल्कि बड़ों में भी उतनी ही देखने को मिल रही है। एक वक्त था जब सावन का महीना खासतौर पर ससुराल से मायके आई बेटियों और बच्चों के लिए बेहद खास माना जाता था, लेकिन अब यह परंपरा और इसके प्रति लोगों की दिलचस्पी दोनों ही कम होती जा रही हैं। यह कहना गलत होगा कि सोशल मीडिया का इस्तेमाल करना बुरी बात है, लेकिन उसकी लत लग जाना और लगातार मोबाइल स्क्रीन पर वक्त बिताना समाज पर कहीं न कहीं नकारात्मक असर डाल रहा है। यह असर खासतौर पर बच्चों में कहीं ज्यादा गहरा दिखाई दे रहा है। जो सावन कभी खुशनुमा माहौल लेकर आता था, जब बच्चे झूलों पर झूलते और पेड़ों के नीचे खेलते नजर आते थे, आज वैसा नजारा सिरे से गायब हो चुका है। यह बदलाव सिर्फ एक मौसम या त्योहार की बात नहीं, बल्कि समाज में आ रही बड़ी तब्दीली और अपनी जड़ों से बढ़ती दूरी की तरफ इशारा करता है।

सवाल-जवाब

सावन के महीने में गांवों में पहले क्या खास होता था?
पहले सावन शुरू होते ही ब्याही बेटियां मायके आती थीं, सहेलियों से मिलती थीं और गांव में पेड़ों पर झूले टंगे रहते थे जिन पर बच्चे झूलते थे।
अब गांवों की सावन वाली रौनक क्यों कम हो गई है?
पुरानी परंपराओं के प्रति घटती दिलचस्पी और बच्चों व बड़ों में मोबाइल तथा सोशल मीडिया की बढ़ती लत की वजह से यह रौनक फीकी पड़ रही है।
क्या अब गांवों में झूले पूरी तरह गायब हो गए हैं?
पूरी तरह नहीं, लेकिन झूले अब बहुत मुश्किल से ही किसी पेड़ या बगीचे में देखने को मिलते हैं, जबकि पहले हर गांव में यह आम नजारा था।
यह बदलाव सिर्फ बच्चों तक सीमित है या बड़ों में भी दिखता है?
यह लत सिर्फ बच्चों तक सीमित नहीं है, सोशल मीडिया और गैजेट्स की यही आदत बड़ों में भी उतनी ही देखने को मिल रही है।
यह रिपोर्ट किस जगह की परंपराओं में बदलाव पर आधारित है?
यह रिपोर्ट महराजगंज के गांवों में सावन के महीने बदल रही परंपराओं और माहौल पर आधारित है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

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