सावन के पावन महीने की शुरुआत के साथ ही पूरा देश शिवभक्ति के आनंद में डूब जाता है। बिहार और विशेषकर मिथिलांचल के क्षेत्र में इस दौरान एक अलग ही आध्यात्मिक उत्साह देखने को मिलता है। लाखों की संख्या में श्रद्धालु सुल्तानगंज में गंगा नदी से पवित्र जल भरकर पैदल यात्रा करते हुए झारखंड के देवघर स्थित प्रसिद्ध बाबा बैद्यनाथ धाम पहुंचते हैं। यह कठिन पैदल मार्ग केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह श्रद्धालुओं के गहन विश्वास, अनुशासन, कठोर तपस्या और असीम समर्पण की अनूठी मिसाल है। इसी पावन परंपरा और भक्ति भाव को बिहार के समस्तीपुर जिले के जाने-माने चित्रकार कुंदन राय ने अपने कैनवास पर बेहद जीवंत रूप में उकेरा है। उन्होंने प्रसिद्ध मिथिला पेंटिंग शैली के माध्यम से कांवर यात्रा के हर पहलू, दृश्य और भावना को उकेरकर दर्शकों के सामने सावन के भक्तिमय माहौल को साक्षात कर दिया है।
कांवर यात्रा के पौराणिक प्रसंगों का कैनवास पर भव्य चित्रण
चित्रकार कुंदन राय ने अपनी इस कलाकृति में केवल वर्तमान समय की कांवर यात्रा का दृश्य ही नहीं दिखाया है, बल्कि इससे जुड़ी सदियों पुरानी धार्मिक मान्यताओं और पौराणिक कथाओं को भी बहुत ही सुंदरता से पिरोया है। सनातन परंपराओं के अनुसार, भगवान परशुराम ने सर्वप्रथम सुल्तानगंज से गंगाजल लाकर भगवान शिव के शिवलिंग पर जलाभिषेक किया था। इसके अलावा त्रेतायुग में श्रवण कुमार द्वारा अपने दृष्टिहीन माता-पिता को कांवर में बिठाकर तीर्थ स्थलों की यात्रा कराने का प्रसंग भी इस परंपरा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। धार्मिक ग्रंथों में यह भी उल्लेख मिलता है कि लंकापति रावण ने भगवान शिव की आराधना के लिए गंगाजल से उनका अभिषेक किया था और स्वयं भगवान श्रीराम ने सुल्तानगंज से जल उठाकर बाबा बैद्यनाथ धाम में अर्पित किया था। इन सभी पौराणिक संदर्भों से प्रेरणा लेकर कलाकार ने अपनी चित्रकारी में सनातन संस्कृति के इन प्रसंगों को उकेरा है, जिससे यह पेंटिंग महज एक सुंदर कलाकृति न रहकर धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का एक अमूल्य दस्तावेज़ बन गई है।
मिथिला लोककला की बारीकियाँ और रंगों का सुंदर संतुलन
समस्तीपुर के कलाकार की इस विशिष्ट पेंटिंग की सबसे मुख्य विशेषता यह है कि इसमें कांवर यात्रा के प्रत्येक दृश्य को विशुद्ध मिथिला शैली के नियमों का पालन करते हुए चित्रित किया गया है। कैनवास पर श्रद्धालु अपने कंधों पर सजाई गई पारंपरिक कांवर लिए हुए बाबा भोलेनाथ के पावन द्वार की ओर बढ़ते दिखाई देते हैं। कांवर के ऊपर मिथिला चित्रकारी की महीन रेखाएं और पारंपरिक ज्यामितीय आकृतियां बनाई गई हैं। इसके साथ ही कांवर लेकर चल रहे श्रद्धालुओं के पारंपरिक वस्त्र, उनकी भाव-भंगिमाएं और उनके साथ चल रहे अन्य भक्तों का चित्रण भी पूरी तरह से मिथिला की लोक शैली में किया गया है। रंगों का ऐसा संतुलित और मनमोहक चयन किया गया है कि संपूर्ण चित्र आस्था, संस्कृति और कला का एक अद्भुत संगम प्रतीत होता है। स्थानीय कला प्रेमियों और आम लोगों द्वारा इस कलाकृति की भूरि-भूरि प्रशंसा की जा रही है, और इसे मिथिला की समृद्ध सांस्कृतिक पहचान के एक नए रूप में देखा जा रहा है।
युवा पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने की अनूठी कोशिश
समस्तीपुर के प्रतिभाशाली कलाकार कुंदन राय बीते कई वर्षों से मिथिला पेंटिंग के ज़रिए समाज, धर्म और संस्कृति से जुड़े विभिन्न विषयों को कैनवास पर उतारकर उन्हें एक नया आयाम प्रदान कर रहे हैं। उनका दृढ विश्वास है कि कला की असली सार्थकता तभी सिद्ध होती है जब वह समाज को अपनी प्राचीन विरासत से जोड़े और लोगों में अपनी जड़ों के प्रति गर्व की भावना जगाए। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए उन्होंने सावन, शिवभक्ति और कांवर यात्रा जैसे पवित्र विषय का चयन किया है। उनकी इस रचना में मिथिला की पारंपरिक लोक शैली के साथ-साथ आधुनिक कलात्मक प्रस्तुति का बेहतरीन सामंजस्य देखने को मिलता है। इस प्रयास से न केवल पारंपरिक लोककला को प्रोत्साहन मिल रहा है, बल्कि आज की युवा पीढ़ी भी अपनी पौराणिक और सांस्कृतिक धरोहर के प्रति आकर्षित और प्रेरित हो रही है।
सावन की भक्ति, तपस्या और जन-आस्था का अमर संदेश
सनातन धर्म में सावन माह के दौरान की जाने वाली कांवर यात्रा को भगवान शिव के प्रति अटूट निष्ठा, आत्म-नियंत्रण, सेवा भाव और त्याग का सबसे बड़ा उदाहरण माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि जो भक्त सच्चे हृदय और पूर्ण भक्ति के साथ सुल्तानगंज से जल भरकर बाबा भोलेनाथ का जलाभिषेक करते हैं, उनकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। समस्तीपुर के कलाकार कुंदन राय ने जन-जन के इसी गहरे विश्वास को अपनी मिथिला पेंटिंग के ज़रिए कलात्मक रूप में अमर बना दिया है। उनकी यह कलाकृति न केवल सावन के महीने में शिवभक्ति के महत्व को रेखांकित करती है, बल्कि यह भी साबित करती है कि बिहार की पारंपरिक लोककला आज भी समकालीन दौर में अपनी विरासत को अगली पीढ़ियों तक पहुंचाने का एक सशक्त और प्रभावी माध्यम है।



















