पंचतंत्र की यह कथा एक शक्तिशाली सिंह और एक साधारण बैल के बीच पनपी गहरी दोस्ती की है, जो बाद में एक चालाक सियार की साजिश के चलते खूनी लड़ाई में बदल गई। कहानी की शुरुआत महिलारोप्य नगर से होती है, जहां वर्धमान नाम का एक धनी व्यापारी रहता था। एक बार वह व्यापार के सिलसिले में अपनी बैलगाड़ी पर भारी सामान लादकर कश्मीर की ओर निकल पड़ा।
दलदल में फंसा बैल और नई जिंदगी की शुरुआत
रास्ते में उसकी बैलगाड़ी में जुते सुडौल और शक्तिशाली बैलों की जोड़ी में से संजीवक नाम का एक बैल यमुना नदी के किनारे गहरे दलदल में जा फंसा। नौकरों ने उसे बाहर निकालने की पूरी कोशिश की, लेकिन बैल दलदल से बाहर नहीं आ सका। मजबूरन व्यापारी वर्धमान ने उसकी देखभाल के लिए कुछ नौकरों को वहीं छोड़ दिया और आगे बढ़ गया। लेकिन दो-तीन दिन बीतते ही ये नौकर भी बैल को दलदल में मरता हुआ छोड़कर चले गए और व्यापारी से यह झूठ बोल दिया कि संजीवक की मौत हो चुकी है।
मगर हकीकत कुछ और ही थी। यमुना किनारे मिलने वाली हरी-भरी घास और साफ पानी ने संजीवक को कुछ ही दिनों में पूरी तरह स्वस्थ, बलवान और मांसल बना दिया। ताकत लौटते ही वह मस्ती में जोर-जोर से हुंकार भरने और रंभाने लगा, जिसकी गूंज पूरे जंगल में फैल गई।
अनजान दहाड़ ने जंगल के राजा को डरा दिया
इसी जंगल में पिंगलक नाम का एक शक्तिशाली सिंह रहता था, जो वहां का राजा माना जाता था। एक दिन जब पिंगलक पानी पीने नदी किनारे पहुंचा, तो उसने संजीवक की वह भयानक हुंकार सुनी। अपने पूरे जीवन में उसने कभी किसी बैल की ऐसी दहाड़ नहीं सुनी थी। यह आवाज सुनते ही सिंह इतना डर गया कि बिना पानी पिए ही वापस अपनी गुफा में लौट गया।
मंत्री पद पाने की चाह में दमनक की चालबाज़ी
पिंगलक के दरबार में करटक और दमनक नाम के दो चतुर सियार रहते थे, जो पहले सिंह के मंत्री रह चुके अपने पिताओं की जगह अब सामान्य दरबारी बनकर रह गए थे। जब दमनक ने देखा कि राजा किसी बात से भयभीत है, तो उसने इस मौके का फायदा उठाकर दोबारा राजा का भरोसा और अपना खोया हुआ मंत्री पद हासिल करने की ठान ली।
दमनक पिंगलक के पास पहुंचा और बड़ी चतुराई से उसका डर भांप लिया। उसने कहा कि महाराज एक साधारण आवाज से क्यों घबरा रहे हैं, आज्ञा मिले तो वह उस जीव का पता लगाकर उसे राजा के सामने हाजिर कर देगा। सिंह ने उसे इसकी अनुमति दे दी। इसके बाद दमनक जंगल में गया और संजीवक से जा मिला। उसने बैल को डराया कि यह जंगल सिंह पिंगलक का इलाका है और उसे राजा के सामने पेश होना ही होगा। संजीवक ने कहा कि अगर सुरक्षा का भरोसा मिले तो उसे वहां जाने में कोई ऐतराज नहीं। दमनक ने यह शर्त मान ली और संजीवक को पिंगलक के दरबार तक ले आया।
बैल और सिंह के बीच गहरी होती दोस्ती
जब पिंगलक को पता चला कि यह डरावनी आवाज दरअसल एक शाकाहारी बैल की थी, तो उसका सारा डर छूमंतर हो गया। धीरे-धीरे दोनों के बीच इतनी गहरी दोस्ती बन गई कि सिंह ने शिकार करना ही छोड़ दिया और अपना सारा समय संजीवक के साथ शास्त्र और नीति की चर्चा में बिताने लगा। दोनों की दोस्ती अटूट हो गई।
भूख से बिलबिलाए सियारों की नई साजिश
राजा के शिकार करने से जंगल के कई जानवरों का पेट मुफ्त में भर जाता था, और करटक व दमनक भी उन्हीं में शामिल थे। जब सिंह अपना पेट भरने के बाद बचा-खुचा मांस छोड़ देता था, तो वही इन सियारों का भोजन बन जाता था। लेकिन जब से पिंगलक ने शिकार करना बंद किया, करटक और दमनक भूखे मरने लगे। तभी दमनक को अपनी भूल का अहसास हुआ और उसने इन दोनों गहरे दोस्तों के बीच दरार डालने की साजिश रच ली।
दोनों के कान भरकर दमनक ने रचाई खूनी लड़ाई की जमीन
दमनक अकेले में पिंगलक के पास गया और बोला कि यह बैल सीधा नहीं है, यह असल में राजा की गद्दी हड़पना चाहता है। उसने चेतावनी दी कि जब बैल अपनी सींगें नीचे झुकाकर और पूंछ उठाकर सामने आए, तो समझ लेना कि वह हमला करने वाला है। सिंह के कान भरने के बाद वही धूर्त सियार संजीवक के पास पहुंचा और उससे झूठ बोला कि राजा पिंगलक के मन में खोट आ गया है और वह उसे मारकर अपने मंत्रियों की भूख मिटाना चाहता है। उसने संजीवक को यह भी बता दिया कि अगर राजा की आंखें लाल दिखें तो समझ लेना कि वह अब झपटने ही वाला है।
अगले दिन जब संजीवक और पिंगलक आमने-सामने आए, तो दमनक की भड़काई बातों के कारण दोनों एक-दूसरे को शक और डर की नजर से देखने लगे। डर के मारे संजीवक ने आत्मरक्षा में अपनी सींगें नीचे कर लीं, वहीं गुस्से में सिंह ने अपनी पूंछ जमीन पर पटक दी। इन इशारों को देखकर दोनों को यकीन हो गया कि दमनक ने जो कुछ बताया था वह सच है। देखते ही देखते दोनों के बीच भयंकर युद्ध छिड़ गया और अंत में सिंह ने अपने ही सच्चे दोस्त संजीवक का वध कर डाला।
दोस्त की मौत पर पछतावा, दमनक बना फिर से मंत्री
संजीवक की मौत के बाद पिंगलक को अपने असली मित्र की याद सताने लगी और वह फूट-फूटकर रोने लगा। तभी चालाक दमनक ने उसे सांत्वना दी, अपनी योजना में पूरी तरह सफल हो चुका यह सियार एक बार फिर सिंह का मुख्य मंत्री बन बैठा।
कान के कच्चे मत बनिए, यही है कहानी की सीख
आज के समाज में भी ऐसी घटनाएं आम हैं। कार्यस्थल पर अक्सर लोग एक-दूसरे के खिलाफ कान भरते नजर आते हैं, और दूसरों की बुराई करना कई लोगों का पसंदीदा शगल बन चुका है। ऐसे चतुर लोग हमेशा अपने स्वार्थ के लिए किसी से दोस्ती का नाटक करते हैं और मौका मिलते ही उसके खिलाफ जहर घोल देते हैं। जो लोग बिना सोचे-समझे ऐसी बातों में आ जाते हैं, उनका हाल भी संजीवक जैसा ही होता है। इसलिए दुष्ट और भड़काऊ लोगों की बातों में आकर कभी भी अपने पुराने और सच्चे दोस्तों पर शक नहीं करना चाहिए, वरना अंत में सिर्फ पछतावा ही हाथ लगता है।











