बीकानेर के भारत भूषण गुप्ता के घर में कदम रखते ही डाक विभाग का सवा सौ साल से भी ज्यादा पुराना इतिहास सामने खुल जाता है। मोबाइल और इंटरनेट के इस दौर में जब चिट्ठी लिखने की आदत लगभग खत्म हो चुकी है, भारत भूषण गुप्ता ने साल 1879 से लेकर आज तक के सैकड़ों पोस्टकार्ड बड़ी मेहनत से संभालकर रखे हैं। उनके इस संग्रह में झांकते ही भारत की डाक व्यवस्था, संचार के बदलते तरीके और अलग अलग ऐतिहासिक दौर की तस्वीर साफ नजर आती है। उनका यह जुनून अब डाक इतिहास और पुरानी यादों को सहेजने की एक मिसाल बन चुका है।
अंग्रेजों के जमाने से चला आ रहा है यह खजाना
भारत भूषण गुप्ता बताते हैं कि भारत में पोस्टकार्ड चलन में 1879 से आया था। उस वक्त देश में ईस्ट इंडिया कंपनी की हुकूमत खत्म होकर सीधे ब्रिटिश शासन का दौर शुरू हो चुका था और महारानी विक्टोरिया का दबदबा था। उसी दौर के पोस्टकार्ड आज भी उनके संग्रह में सुरक्षित पड़े हैं। इसके बाद किंग एडवर्ड, किंग जॉर्ज पंचम और किंग जॉर्ज षष्ठम के राज में छपे पोस्टकार्ड भी उनके पास मौजूद हैं। आजादी मिलने के बाद अलग अलग कीमतों में जारी हुए पोस्टकार्ड भी उन्होंने सालों की मेहनत से जुटाकर रखे हैं।
तीन पैसे से पचास पैसे तक, 50 से ज्यादा किस्में
भारत भूषण गुप्ता के मुताबिक उनके पास तीन पैसे, पांच पैसे, छह पैसे, दस पैसे, पंद्रह पैसे, बीस पैसे, पच्चीस पैसे और पचास पैसे कीमत वाले 50 से ज्यादा तरह के पोस्टकार्ड रखे हैं। वक्त के साथ इन पोस्टकार्डों की कीमत और बनावट बदलती गई, लेकिन इनकी ऐतिहासिक अहमियत आज भी वैसी ही बनी हुई है। उनका कहना है कि हर पोस्टकार्ड अपने दौर की अलग कहानी कहता है। इस संग्रह में कुछ पोस्टकार्ड बेहद दुर्लभ माने जाते हैं, इनमें प्रतियोगिता पोस्टकार्ड खास आकर्षण का केंद्र है, जिसकी कीमत दो रुपये हुआ करती थी और आज यह आसानी से देखने को नहीं मिलता। भारत में पोस्टकार्ड सेवा के 100 साल पूरे होने पर डाक विभाग ने जो खास स्मारक पोस्टकार्ड जारी किया था, वह भी उनके संग्रह में शामिल है। इसके अलावा एयर मेल से भेजे जाने वाले पोस्टकार्ड भी उन्होंने संभालकर रखे हैं, जो उस दौर की डाक व्यवस्था की एक अहम कड़ी रहे हैं।
पिता के हाथ की लिखावट आज भी संभाली हुई है
अजमेर में रहने वाले भारत भूषण गुप्ता बताते हैं कि एक वक्त था जब पोस्टकार्ड ही आम लोगों के बीच बातचीत का सबसे सस्ता और सबसे चलन वाला जरिया था। लोग अपने सुख दुख, घर परिवार की खबरें, शुभकामनाएं और जरूरी बातें पोस्टकार्ड के जरिए ही एक दूसरे तक पहुंचाते थे। हर गांव और शहर में लोग डाकिए का इंतजार करते थे। आज भी उनके पास पिता के हाथ से लिखे कई पोस्टकार्ड सुरक्षित हैं, जो उनके लिए सिर्फ एक संग्रह नहीं बल्कि परिवार की अनमोल यादें हैं। इस संग्रह में मेघदूत पोस्टकार्ड की भी खास जगह है, इन पोस्टकार्डों पर सरकारी योजनाओं और निजी संस्थाओं के विज्ञापन छापे जाते थे।
आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना है यह विरासत
यह पोस्टकार्ड कम कीमत में मिलते थे और लोगों में जागरूकता फैलाने का असरदार जरिया भी बने। इसके अलावा अलग अलग विषयों, मौकों और खास मुहिमों से जुड़े कई तरह के पोस्टकार्ड भी भारत भूषण गुप्ता ने बरसों की मेहनत से इकट्ठा किए हैं। उनका कहना है कि आज की तकनीक ने भले ही बातचीत के तरीके बदल दिए हों, लेकिन पोस्टकार्ड भारतीय समाज और संस्कृति के इतिहास का एक अहम हिस्सा हैं। उनकी कोशिश है कि यह विरासत आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचे, ताकि लोगों को पता चल सके कि कभी एक मामूली सा दिखने वाला पोस्टकार्ड ही लोगों के दिलों को जोड़ने का सबसे बड़ा जरिया हुआ करता था।













