वर्ष 2026 के अंत में गुरु राहु और केतु बदलेंगे चाल, वृषभ सिंह और धनु राशि वालों को मिलेगा बड़ा लाभरूस ने भारत को दिया Su-57E फाइटर जेट और R-77M मिसाइल का मेगा ऑफरसिंह राशि में बनेगा बुधादित्य राजयोग: 22 अगस्त 2026 से सूर्य और बुध की युति चमकाएगी 4 राशियों का भाग्यतेलंगाना का रहस्यमयी भीमलिंगेश्वर मंदिर, जहाँ विशाल शिवलिंग को बाहों में नहीं भर पाता कोई इंसानचाय पत्ती और कलौंजी से घर पर बनाएं नेचुरल हेयर डाई, सफेद बालों से मिलेगा छुटकाराअसम में कोयला और बालू सिंडिकेट के खिलाफ कांग्रेस छेड़ेगी बड़ा राज्यव्यापी आंदोलनएनडीए परीक्षा के बचे दिनों में ऐसे करें तैयारी, इन रणनीतियों से मिलेगी सफलतायूजीसी-नेट की तीन परीक्षाएं रद्द होने पर राहुल गांधी का केंद्र पर हमला, बोले- यह शिक्षा व्यवस्था नहीं बल्कि छात्रों को निचोड़ने वाली मशीन हैउत्तराखंड में मनाया जा रहा है खास घ्यू त्यार, घी खाने से जुड़ी है अनोखी मान्यताईंधन नीति पर अरविंद केजरीवाल का तंज, बोले क्या मुख्य आर्थिक सलाहकार को हटा देंगे प्रधानमंत्री
पति की मौत के बाद खुद संभाला राज सिंहासन, 50 लड़ाइयां लड़ने वालीं महारानी दुर्गावती को गोंड समाज आज भी पूजता है देवी मानकरकल्चर
3 जुल॰ 2026, 8:43 am (45 दिन पहले)· 2

पति की मौत के बाद खुद संभाला राज सिंहासन, 50 लड़ाइयां लड़ने वालीं महारानी दुर्गावती को गोंड समाज आज भी पूजता है देवी मानकर

उत्तर प्रदेश के बांदा में जन्मीं महारानी वीरांगना दुर्गावती ने पति की मौत के बाद खुद अपने राज्य की गद्दी संभाली और शासक के रूप में करीब 50 लड़ाइयां लड़ीं, आखिरी लड़ाई में हार मानने की बजाय उन्होंने खुद अपने खंजर से वीरगति को गले लगाया, जिसके बाद गोंड समाज आज भी उन्हें देवी मानकर पूजता है।

इतिहास में ऐसी बहुत कम महिलाएं मिलती हैं जिन्हें उनका समाज आज भी अपनी देवी मानकर पूजता है। महारानी वीरांगना दुर्गावती देवी ऐसी ही एक शख्सियत हैं, जो अपने समाज के लिए लड़ाई लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुई थीं और इसके बाद उनका समाज उन्हें देवी के रूप में पूजने लगा। आइए जानते हैं कि आखिर कौन थीं महारानी वीरांगना दुर्गावती और क्यों गोंड समाज उन्हें आज भी देवी मानता है।

पप्पू गोंड बताते हैं कि महारानी वीरांगना दुर्गावती उन्हीं के समाज यानी गोंड समाज से आती हैं। उनका जन्म 5 अक्टूबर को उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में हुआ था। बड़ी होने पर उनका विवाह मध्य प्रदेश के जबलपुर में दलपत से हुआ, जो उस दौर में मुगल शासन के अधीन वहां के राजा हुआ करते थे। दोनों का साथ करीब 12 से 14 साल तक रहा और इस दौरान उनके एक पुत्र भी हुआ। लेकिन इसी बीच उनके पति का निधन हो गया और महारानी का यह साथ छूट गया।

ये भी पढ़ें

पति के निधन के बाद खुद संभाली सत्ता, लड़ीं करीब 50 लड़ाइयां

पति की मौत के बाद महारानी वीरांगना दुर्गावती ने हिम्मत नहीं हारी और खुद अपने साम्राज्य की गद्दी संभाल ली। उस दौर में एक महिला होते हुए भी उन्होंने शासक के तौर पर राज-काज चलाया और करीब 50 लड़ाइयों का नेतृत्व किया। यह उनके साहस और नेतृत्व क्षमता को दिखाता है कि पति के जाने के बाद भी उन्होंने अपने राज्य की जिम्मेदारी अकेले उठाई।

आसिफ खान से आखिरी लड़ाई में हार की बजाय चुनी वीरगति

24 जून 1664 ईस्वी में आसिफ खान के साथ हुई आखिरी लड़ाई में भी महारानी वीरांगना दुर्गावती ने हिम्मत नहीं हारी। हालात उनके खिलाफ होते चले गए, लेकिन उन्होंने हार स्वीकार करना गंवारा नहीं समझा। बजाय आसिफ खान के हाथ लगने के, उन्होंने खुद अपने खंजर से खुद को मारकर अपनी मौत को कबूल कर लिया और वीरगति को प्राप्त हो गईं। उनका यह बलिदान ही आगे चलकर उनके समाज के लिए उन्हें देवी का दर्जा दिला गया। कहा जाता है कि गोंड समाज उन्हीं का वंशज है, और यही वजह है कि आज उनकी पूजा बहुत भव्य तरीके से की जाती है तथा जगह-जगह उनके मंदिरों की स्थापना की जा रही है।

मध्य प्रदेश में उनके नाम पर म्यूजियम और रेलवे स्टेशन

आज के समय में मध्य प्रदेश में महारानी वीरांगना दुर्गावती के नाम पर जगह-जगह म्यूजियम बनाए गए हैं। इतना ही नहीं, उन्हीं के नाम पर एक रेलवे स्टेशन भी है। सरकार की ओर से समय-समय पर उनसे जुड़े स्मृति चिन्हों का अनावरण भी किया जाता रहा है। इसी कड़ी में उत्तर प्रदेश के मऊ जनपद के देवास इलाके में भी उनके मंदिर का अनावरण किया गया है।

हर साल 24 जून को धूमधाम से मनाया जाता है बलिदान दिवस

महारानी वीरांगना दुर्गावती के बलिदान की याद में हर साल 24 जून को बलिदान दिवस मनाया जाता है, जो पूरी धूमधाम के साथ मनाया जाता है। इस साल भी मऊ में हजारों की संख्या में लोग इकट्ठा हुए और उनका बलिदान दिवस मनाया। यह परंपरा बरसों से चली आ रही है, क्योंकि गोंड समाज खुद को महारानी वीरांगना दुर्गावती का वंशज मानता है और उन्हें अपनी देवी मानकर उनकी पूजा-अर्चना करता है।

सवाल-जवाब

महारानी वीरांगना दुर्गावती का जन्म कब और कहां हुआ था?
उनका जन्म 5 अक्टूबर को उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में हुआ था।
उनका विवाह किससे हुआ था?
उनका विवाह मध्य प्रदेश के जबलपुर में दलपत से हुआ, जो उस दौर में मुगल शासन के अधीन वहां के राजा हुआ करते थे।
पति की मौत के बाद उन्होंने क्या किया?
पति के निधन के बाद उन्होंने खुद अपने साम्राज्य की गद्दी संभाली और शासक के तौर पर करीब 50 लड़ाइयां लड़ीं।
उनकी मृत्यु कैसे हुई?
24 जून 1664 ईस्वी में आसिफ खान से आखिरी लड़ाई में हार स्वीकार न करते हुए उन्होंने खुद अपने खंजर से खुद को मारकर वीरगति प्राप्त की।
गोंड समाज उन्हें देवी क्यों मानता है?
गोंड समाज खुद को उनका वंशज मानता है और उनके बलिदान की वजह से उन्हें अपनी देवी के रूप में पूजता है।
24 जून को क्या मनाया जाता है?
24 जून को उनका बलिदान दिवस पूरी धूमधाम से मनाया जाता है, जिसमें हर साल हजारों लोग शामिल होते हैं।
उनके नाम पर आज क्या-क्या मौजूद है?
मध्य प्रदेश में उनके नाम पर म्यूजियम और एक रेलवे स्टेशन बना है, और उत्तर प्रदेश के मऊ जिले के देवास में उनका मंदिर भी बनाया गया है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 0

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं — पहली टिप्पणी आपकी हो!

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR