इतिहास में ऐसी बहुत कम महिलाएं मिलती हैं जिन्हें उनका समाज आज भी अपनी देवी मानकर पूजता है। महारानी वीरांगना दुर्गावती देवी ऐसी ही एक शख्सियत हैं, जो अपने समाज के लिए लड़ाई लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुई थीं और इसके बाद उनका समाज उन्हें देवी के रूप में पूजने लगा। आइए जानते हैं कि आखिर कौन थीं महारानी वीरांगना दुर्गावती और क्यों गोंड समाज उन्हें आज भी देवी मानता है।
पप्पू गोंड बताते हैं कि महारानी वीरांगना दुर्गावती उन्हीं के समाज यानी गोंड समाज से आती हैं। उनका जन्म 5 अक्टूबर को उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में हुआ था। बड़ी होने पर उनका विवाह मध्य प्रदेश के जबलपुर में दलपत से हुआ, जो उस दौर में मुगल शासन के अधीन वहां के राजा हुआ करते थे। दोनों का साथ करीब 12 से 14 साल तक रहा और इस दौरान उनके एक पुत्र भी हुआ। लेकिन इसी बीच उनके पति का निधन हो गया और महारानी का यह साथ छूट गया।
पति के निधन के बाद खुद संभाली सत्ता, लड़ीं करीब 50 लड़ाइयां
पति की मौत के बाद महारानी वीरांगना दुर्गावती ने हिम्मत नहीं हारी और खुद अपने साम्राज्य की गद्दी संभाल ली। उस दौर में एक महिला होते हुए भी उन्होंने शासक के तौर पर राज-काज चलाया और करीब 50 लड़ाइयों का नेतृत्व किया। यह उनके साहस और नेतृत्व क्षमता को दिखाता है कि पति के जाने के बाद भी उन्होंने अपने राज्य की जिम्मेदारी अकेले उठाई।
आसिफ खान से आखिरी लड़ाई में हार की बजाय चुनी वीरगति
24 जून 1664 ईस्वी में आसिफ खान के साथ हुई आखिरी लड़ाई में भी महारानी वीरांगना दुर्गावती ने हिम्मत नहीं हारी। हालात उनके खिलाफ होते चले गए, लेकिन उन्होंने हार स्वीकार करना गंवारा नहीं समझा। बजाय आसिफ खान के हाथ लगने के, उन्होंने खुद अपने खंजर से खुद को मारकर अपनी मौत को कबूल कर लिया और वीरगति को प्राप्त हो गईं। उनका यह बलिदान ही आगे चलकर उनके समाज के लिए उन्हें देवी का दर्जा दिला गया। कहा जाता है कि गोंड समाज उन्हीं का वंशज है, और यही वजह है कि आज उनकी पूजा बहुत भव्य तरीके से की जाती है तथा जगह-जगह उनके मंदिरों की स्थापना की जा रही है।
मध्य प्रदेश में उनके नाम पर म्यूजियम और रेलवे स्टेशन
आज के समय में मध्य प्रदेश में महारानी वीरांगना दुर्गावती के नाम पर जगह-जगह म्यूजियम बनाए गए हैं। इतना ही नहीं, उन्हीं के नाम पर एक रेलवे स्टेशन भी है। सरकार की ओर से समय-समय पर उनसे जुड़े स्मृति चिन्हों का अनावरण भी किया जाता रहा है। इसी कड़ी में उत्तर प्रदेश के मऊ जनपद के देवास इलाके में भी उनके मंदिर का अनावरण किया गया है।
हर साल 24 जून को धूमधाम से मनाया जाता है बलिदान दिवस
महारानी वीरांगना दुर्गावती के बलिदान की याद में हर साल 24 जून को बलिदान दिवस मनाया जाता है, जो पूरी धूमधाम के साथ मनाया जाता है। इस साल भी मऊ में हजारों की संख्या में लोग इकट्ठा हुए और उनका बलिदान दिवस मनाया। यह परंपरा बरसों से चली आ रही है, क्योंकि गोंड समाज खुद को महारानी वीरांगना दुर्गावती का वंशज मानता है और उन्हें अपनी देवी मानकर उनकी पूजा-अर्चना करता है।













