बिहार के सांस्कृतिक परिदृश्य में लोक कलाओं और पारंपरिक संगीत का विशेष स्थान रहा है। मिथिला और मगध के विशाल सांस्कृतिक क्षेत्रों में रचा-बसा 'रसनचौकी' ऐसा ही एक प्राचीन लोक वाद्ययंत्र समूह है, जिसे स्थानीय जनमानस में 'पंचबजना' के नाम से भी पुकारा जाता है। इस पारंपरिक बैंड की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें पांच अलग-अलग देशी वाद्ययंत्रों को एक ही सुर और ताल में बेहद लयबद्ध तरीके से बजाया जाता है। यह संगीत केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि मानव जीवन के विभिन्न पड़ावों और संवेदनाओं को स्वर देने वाली एक अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर है।
पौराणिक उत्पत्ति और माता सीता के विवाह से संबंध
इस ऐतिहासिक वाद्ययंत्र समूह की उत्पत्ति पड़ोसी देश नेपाल से मानी जाती है। पौराणिक मान्यताओं और मौखिक इतिहास में इसका उल्लेख बहुत गहराई से मिलता है। राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित वरिष्ठ वाद्ययंत्र कलाकार महेंद्र राम (भटसिमरी) बताते हैं कि इस विशेष वाद्य समूह 'पंचबजना' को इतिहास में पहली बार माता सीता और भगवान श्री राम के शुभ विवाह उत्सव के दौरान बजाया गया था। जनकपुर और मिथिला की उस पावन भूमि पर गूंजी यह मधुर ध्वनि समय के साथ परंपरा का रूप ले गई। तब से लेकर आज तक इस प्राचीन कला को गुरु-शिष्य परंपरा के जरिए एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक सिखाकर जीवित रखा गया है।
किन पांच वाद्ययंत्रों के मेल से बनता है पंचबजना?
रसनचौकी या पंचबजना की सुरीली गूंज पांच विशिष्ट वाद्ययंत्रों के परस्पर तालमेल पर निर्भर करती है। जब कलाकार इन पांचों यंत्रों पर एक साथ संगत करते हैं, तो एक अद्भुत ध्वनि उत्पन्न होती है
- ढोल: यह इस समूह का मुख्य ताल वाद्य है, जो अपनी जोरदार थाप से पूरे संगीत का आधार तैयार करता है।
- तबली: यह छोटे ढोल के आकार का एक पारंपरिक यंत्र है, जिसका उपयोग संगीत की निरंतर लय और गति को बनाए रखने के लिए किया जाता है।
- खुरदक: यह भी एक पारंपरिक ताल वाद्य है, जो मुख्य थाप के साथ बारीक बीट्स और पूरक ताल देने का काम करता है।
- कारा या झाल: धातु से बना यह वाद्ययंत्र आपस में टकराकर तीव्र गूंज और खनकती हुई ताल उत्पन्न करता है, जिससे संगीत में निखार आता है।
- शहनाई: यह हवा के दबाव से बजने वाला एक प्रमुख फूंक वाद्ययंत्र है, जो पूरे समूह को मुख्य धुन और मधुर सुर प्रदान करता है।
जीवन चक्र का संगीतमय साथी: जन्म से लेकर अंतिम यात्रा तक
पंचबजना की सबसे अनोखी बात यह है कि यह मनुष्य के संपूर्ण जीवन चक्र से जुड़ा हुआ है। मिथिला और मगध के समाज में जन्म के उल्लास से लेकर मुंडन, जनेऊ और विवाह जैसे सभी मांगलिक तथा शुभ अवसरों पर इसका उपयोग स्वागत और आह्वान संगीत के रूप में किया जाता है। घर के दरवाजे पर रसनचौकी की गूंज को बेहद शुभ माना जाता है। हालांकि, इसकी भूमिका केवल खुशी के पलों तक सीमित नहीं है। समाज में किसी महान, सम्मानित या प्रतिष्ठित व्यक्ति के निधन पर शोक प्रकट करने के लिए भी कलाकार इसकी विशेष करुण धुनें बजाते हैं। इस प्रकार यह वाद्य समूह शिशु के जन्म की किलकारी से लेकर जीवन की अंतिम यात्रा तक की हर भावना को अभिव्यक्त करता है।
आधुनिकता की चुनौती और धरोहर सहेजने की पहल
आज के आधुनिक युग में नए-नए इलेक्ट्रॉनिक वाद्ययंत्रों और डीजे के बढ़ते चलन के कारण यह प्राचीन लोक कला धीरे-धीरे हासिए पर चली गई है और विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गई है। शादी-ब्याह और अन्य समारोहों में आधुनिक लाउडस्पीकर और डिजिटल गानों के इस्तेमाल से पारंपरिक पंचबजना कलाकारों के सामने आजीविका और पहचान का संकट खड़ा हो गया है। हालांकि, इस अमूल्य धरोहर को बचाने के लिए सरकारी स्तर पर प्रयास भी शुरू हुए हैं। हाल ही में केंद्र सरकार और राष्ट्रपति की ओर से ऐसे प्राचीन वाद्ययंत्रों के गुणी कलाकारों को राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया है, ताकि इस विलुप्त होती सांस्कृतिक विरासत को नया जीवन और समाज में सम्मान दिया जा सके।



















