दिल्ली के साउथ कैंपस इलाके में घूमने वाला हर छात्र सत्य निकेतन की तंग गलियों, सस्ते पीजी और चहकते कैफे से वाकिफ है, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि यह पूरा इलाका कभी मोती बाग नाम के एक शांत गांव का हिस्सा हुआ करता था. खेतों और गिनी-चुनी झोपड़ियों वाली यह जमीन आज छात्रों के सबसे पसंदीदा ठिकाने में कैसे बदली, इसकी कहानी करीब सात दशक पुरानी है.
मोती बाग गांव से शुरू हुई कहानी
1950 और 1960 के दशक तक यह इलाका बड़े पैमाने पर कृषि भूमि और ग्रामीण आबादी वाला क्षेत्र था. यहां न कोई बाजार था, न कोई कॉलेज, बस खेत-खलिहान और मुट्ठी भर परिवार अपनी जमीन पर खेती करते थे. यही जमीन पुराने मोती बाग गांव का हिस्सा थी, और आज के सत्य निकेतन की नींव इसी गांव की मिट्टी में छिपी है.
शरणार्थियों की बसावट और नया नाम
1947 में आजादी के बाद और उसके बाद के दशकों में जब दिल्ली शहर के तौर पर तेजी से फैलने लगी, तो इस इलाके में कई परिवारों और विस्थापितों को जमीनें और प्लॉट आवंटित किए गए. धीरे-धीरे यह रिहायशी कॉलोनी बसती गई और इसे नया नाम मिला, सत्य निकेतन. उस वक्त शायद ही किसी ने सोचा होगा कि यही कॉलोनी आगे चलकर दिल्ली के सबसे मशहूर छात्र अड्डों में गिनी जाएगी.
1973 में आया वह मोड़ जिसने तस्वीर बदल दी
सत्य निकेतन की असली किस्मत 1973 में खुली, जब दिल्ली विश्वविद्यालय ने साउथ कैंपस की स्थापना की. बेनिटो हुआरेज़ मार्ग पर एक के बाद एक नामी कॉलेज खुलने लगे, श्री वेंकटेश्वर कॉलेज, एआरएसडी कॉलेज, मोतीलाल नेहरू कॉलेज और जीसस एंड मैरी कॉलेज यानी जेएमसी. इन कॉलेजों में दाखिला लेने देश भर से आने वाले छात्रों की तादाद बढ़ने लगी, और सड़क के ठीक पार बसा सत्य निकेतन उनके लिए रहने और खाने-पीने का सबसे नजदीकी और सबसे सस्ता ठिकाना बन गया, एक हैसियत जो आज तक बरकरार है.
छोटे मकानों से पीजी और हॉस्टल तक का सफर
1980 और 1990 के दशक में स्थानीय निवासियों ने छात्रों की बढ़ती भीड़ को भुनाना शुरू किया. 60 से 65 गज के छोटे-छोटे मकान देखते ही देखते 4 से 5 मंजिला इमारतों में तब्दील होने लगे. इन इमारतों में हॉस्टल और पीजी बनाकर किराए पर चढ़ाए गए, जिससे मकान मालिकों की कमाई बढ़ी और छात्रों को कैंपस के करीब सस्ता ठिकाना मिल गया, वह भी बिना शहर के दूसरे छोर से रोज सफर किए. यही दौर था जब सत्य निकेतन की पहचान एक शांत रिहायशी इलाके से हटकर एक पक्के छात्र-बसेरे जैसी बनने लगी.
मोमोज, शेक्स और कैफे कल्चर का उभार
साल 2000 के बाद सत्य निकेतन ने एक नई पहचान बनाई, दिल्ली के कैफे हब की. यहां किफायती दामों पर मिलने वाले पास्ता, मोमोज, शेक्स और चाइनीज खाने वाले छोटे-छोटे कैफे पूरे साउथ कैंपस के छात्रों के अड्डे बन गए, और यहां आने वालों की भीड़ सिर्फ आस-पास के कॉलेजों तक सीमित नहीं रही. गलियां अब सिर्फ किताबों और क्लास की बातों से नहीं, बल्कि खाने-पीने की खुशबू, बर्तनों की खनक और देर रात तक चलने वाली रौनक से गुलजार रहने लगीं.
तरक्की के पीछे छिपा अवैध निर्माण का खतरा
सत्य निकेतन के इस तेज व्यावसायिक विकास का एक बेहद चिंताजनक पहलू भी है. 100 से 200 गज के छोटे प्लॉटों पर ज्यादा से ज्यादा कमरे निकालने की होड़ में बिना मजबूत नींव और बिना नगर निगम यानी एमसीडी से नक्शा पास कराए 4 से 5 मंजिला इमारतें खड़ी कर दी गईं. किराए की कमाई बढ़ाने की इस दौड़ में सेफ्टी नॉर्म्स, फायर सेफ्टी के नियम और स्ट्रक्चरल स्टेबिलिटी को लगभग पूरी तरह नजरअंदाज किया गया. नतीजा यह हुआ कि हाल के दिनों में यहां पुरानी और जर्जर हो चुकी इमारतों के ढहने जैसे दर्दनाक हादसे सामने आए हैं, जो इस इलाके की चमकती चकाचौंध और भीड़ भरे कैफे के पीछे छिपे खतरे की गवाही देते हैं.
आज का सत्य निकेतन: चमक और चुनौती साथ-साथ
आज सत्य निकेतन को दिल्ली के सबसे किफायती और जिंदादिल छात्र इलाकों में गिना जाता है, जहां हर गली में कोई न कोई पीजी, हॉस्टल या कैफे मौजूद है. लेकिन इसी चमक-दमक के पीछे दशकों से चली आ रही अनियोजित और अवैध निर्माण की कहानी भी उतनी ही असल है. एक तरफ यह इलाका छात्रों को कॉलेज के पास किफायती ठिकाना और जिंदादिल माहौल देता है, तो दूसरी तरफ बिना नक्शे और बिना सुरक्षा जांच के बनी इमारतें बीच-बीच में खतरे की घंटी बजाती रहती हैं.





















