दो बालिग व्यक्तियों के आपसी सहमति से एक साथ रहने के फैसले पर दिल्ली हाईकोर्ट ने एक बड़ा और प्रगतिशील निर्णय दिया है। अदालत ने साफ तौर पर कहा है कि जब दो वयस्क अपनी इच्छा, जिम्मेदारी और पूरी सहमति से लिव-इन रिलेशनशिप में रहने का विकल्प चुनते हैं, तो उनके इस रिश्ते में परिवार या समाज का कोई भी व्यक्ति अड़चन नहीं पैदा कर सकता। जस्टिस सौरभ बनर्जी की पीठ ने 13 अगस्त को जारी अपने आदेश में रेखांकित किया कि सामाजिक नैतिकता और पूर्वाग्रहों के नाम पर नागरिकों के मौलिक अधिकारों को नहीं छीना जा सकता। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी माता-पिता, रिश्तेदार या मित्र को किसी वयस्क जोड़े के जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता में बाधा डालने अथवा उन्हें धमकी देने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।
लिव-इन संबंधों पर अदालत के तीन प्रमुख सिद्धांत
अपने आदेश के दौरान दिल्ली हाईकोर्ट ने बालिग जोड़ों के अधिकारों और व्यक्तिगत पहचान को लेकर तीन अत्यंत महत्वपूर्ण बातें सामने रखीं
- व्यक्तिगत पहचान और संवैधानिक अधिकार: संविधान द्वारा प्रत्येक नागरिक को दिए गए मौलिक अधिकारों को सामाजिक नैतिकता या रूढ़िवादी पूर्वाग्रहों की बलि नहीं चढ़ाया जा सकता। ऐसा करना किसी व्यक्ति की अपनी पहचान को समाप्त करने के समान है।
- स्वतंत्रता में बाधा डालने का अधिकार किसी को नहीं: जब दो वयस्क अपनी स्वतंत्र मर्जी और जिम्मेदारी के साथ एक साथ रहने का निर्णय लेते हैं, तो परिजनों या अन्य किसी भी तीसरे पक्ष को उनकी स्वतंत्रता में खलल डालने या उनकी जान-माल को खतरे में डालने का अधिकार प्राप्त नहीं है।
- विवाह के समान गरिमा और अधिकार: भले ही लिव-इन में रहने वाले जोड़े ने औपचारिक रूप से धार्मिक या कानूनी रीति-रिवाजों से विवाह न किया हो, फिर भी आपसी सहमति से बने ऐसे रिश्ते की गरिमा और कानूनी अधिकार एक शादीशुदा जोड़े के जीवन के समान ही माने जाएंगे।
कपल को मिली जान से मारने की धमकियां और हाईकोर्ट का रुख
यह पूरा मामला 30 से 35 वर्ष की आयु वर्ग के एक लिव-इन कपल से जुड़ा हुआ है। यह जोड़ा लंबे समय से एक साथ निवास कर रहा था और भविष्य में एक-दूसरे से शादी करने का विचार रखता था। हालांकि, इस रिश्ते को लेकर युवती के पिता और भाई बेहद नाराज थे। परिजनों का विरोध इतना बढ़ गया कि वे दोनों को लगातार शारीरिक हिंसा करने और जान से मारने की धमकियां दे रहे थे। अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित होकर कपल ने सबसे पहले स्थानीय थाना प्रभारी (एसएचओ) से मुलाकात की और सुरक्षा की मांग की।
स्थानीय पुलिस स्टेशन से जब उन्हें कोई सहायता या ठोस कार्रवाई देखने को नहीं मिली, तो अपनी जान और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए इस जोड़े ने दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर की। याचिका पर विचार करते हुए जस्टिस सौरभ बनर्जी की पीठ ने 13 अगस्त को स्पष्ट आदेश जारी किया और संबंधित पुलिस अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे कपल को तुरंत पर्याप्त पुलिस सुरक्षा मुहैया कराएं।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले और घरेलू हिंसा कानून का हवाला
मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस सौरभ बनर्जी ने देश की शीर्ष अदालत के पूर्व फैसलों का संदर्भ दिया। उन्होंने दोहराया कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही कई मामलों में यह स्थापित कर चुका है कि दो बालिग व्यक्तियों को बिना औपचारिक विवाह के भी अपनी मर्जी से एक साथ रहने का पूरा कानूनी अधिकार है। कानून की नजर में अब इस प्रकार के संबंधों को स्पष्ट मान्यता हासिल है।
इसके साथ ही अदालत ने इस बात पर भी जोर दिया कि देश की विधायिका ने भी महिलाओं के अधिकारों को सुरक्षित करने के लिए कड़े प्रावधान किए हैं। उदाहरण के तौर पर घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 जैसी कानूनी धाराओं के माध्यम से ऐसे लिव-इन संबंधों में रह रही महिलाओं के अधिकारों को व्यापक सुरक्षा कवच प्रदान किया गया है।





















