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दो बालिगों के सहमति से साथ रहने पर परिजन नहीं बना सकते दबाव, दिल्ली हाईकोर्ट का अहम फैसलादिल्ली
20 अग॰ 2026, 7:01 pm (2 घंटे पहले)· 2

दो बालिगों के सहमति से साथ रहने पर परिजन नहीं बना सकते दबाव, दिल्ली हाईकोर्ट का अहम फैसला

दिल्ली हाईकोर्ट ने 13 अगस्त के आदेश में स्पष्ट किया कि सहमति से लिव-इन में रह रहे बालिग जोड़े के रिश्ते में समाज या परिजन बाधा नहीं डाल सकते और उन्हें विवाह के समान अधिकार प्राप्त हैं।

दो बालिग व्यक्तियों के आपसी सहमति से एक साथ रहने के फैसले पर दिल्ली हाईकोर्ट ने एक बड़ा और प्रगतिशील निर्णय दिया है। अदालत ने साफ तौर पर कहा है कि जब दो वयस्क अपनी इच्छा, जिम्मेदारी और पूरी सहमति से लिव-इन रिलेशनशिप में रहने का विकल्प चुनते हैं, तो उनके इस रिश्ते में परिवार या समाज का कोई भी व्यक्ति अड़चन नहीं पैदा कर सकता। जस्टिस सौरभ बनर्जी की पीठ ने 13 अगस्त को जारी अपने आदेश में रेखांकित किया कि सामाजिक नैतिकता और पूर्वाग्रहों के नाम पर नागरिकों के मौलिक अधिकारों को नहीं छीना जा सकता। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी माता-पिता, रिश्तेदार या मित्र को किसी वयस्क जोड़े के जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता में बाधा डालने अथवा उन्हें धमकी देने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।

लिव-इन संबंधों पर अदालत के तीन प्रमुख सिद्धांत

अपने आदेश के दौरान दिल्ली हाईकोर्ट ने बालिग जोड़ों के अधिकारों और व्यक्तिगत पहचान को लेकर तीन अत्यंत महत्वपूर्ण बातें सामने रखीं

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  • व्यक्तिगत पहचान और संवैधानिक अधिकार: संविधान द्वारा प्रत्येक नागरिक को दिए गए मौलिक अधिकारों को सामाजिक नैतिकता या रूढ़िवादी पूर्वाग्रहों की बलि नहीं चढ़ाया जा सकता। ऐसा करना किसी व्यक्ति की अपनी पहचान को समाप्त करने के समान है।
  • स्वतंत्रता में बाधा डालने का अधिकार किसी को नहीं: जब दो वयस्क अपनी स्वतंत्र मर्जी और जिम्मेदारी के साथ एक साथ रहने का निर्णय लेते हैं, तो परिजनों या अन्य किसी भी तीसरे पक्ष को उनकी स्वतंत्रता में खलल डालने या उनकी जान-माल को खतरे में डालने का अधिकार प्राप्त नहीं है।
  • विवाह के समान गरिमा और अधिकार: भले ही लिव-इन में रहने वाले जोड़े ने औपचारिक रूप से धार्मिक या कानूनी रीति-रिवाजों से विवाह न किया हो, फिर भी आपसी सहमति से बने ऐसे रिश्ते की गरिमा और कानूनी अधिकार एक शादीशुदा जोड़े के जीवन के समान ही माने जाएंगे।

कपल को मिली जान से मारने की धमकियां और हाईकोर्ट का रुख

यह पूरा मामला 30 से 35 वर्ष की आयु वर्ग के एक लिव-इन कपल से जुड़ा हुआ है। यह जोड़ा लंबे समय से एक साथ निवास कर रहा था और भविष्य में एक-दूसरे से शादी करने का विचार रखता था। हालांकि, इस रिश्ते को लेकर युवती के पिता और भाई बेहद नाराज थे। परिजनों का विरोध इतना बढ़ गया कि वे दोनों को लगातार शारीरिक हिंसा करने और जान से मारने की धमकियां दे रहे थे। अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित होकर कपल ने सबसे पहले स्थानीय थाना प्रभारी (एसएचओ) से मुलाकात की और सुरक्षा की मांग की।

स्थानीय पुलिस स्टेशन से जब उन्हें कोई सहायता या ठोस कार्रवाई देखने को नहीं मिली, तो अपनी जान और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए इस जोड़े ने दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर की। याचिका पर विचार करते हुए जस्टिस सौरभ बनर्जी की पीठ ने 13 अगस्त को स्पष्ट आदेश जारी किया और संबंधित पुलिस अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे कपल को तुरंत पर्याप्त पुलिस सुरक्षा मुहैया कराएं।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले और घरेलू हिंसा कानून का हवाला

मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस सौरभ बनर्जी ने देश की शीर्ष अदालत के पूर्व फैसलों का संदर्भ दिया। उन्होंने दोहराया कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही कई मामलों में यह स्थापित कर चुका है कि दो बालिग व्यक्तियों को बिना औपचारिक विवाह के भी अपनी मर्जी से एक साथ रहने का पूरा कानूनी अधिकार है। कानून की नजर में अब इस प्रकार के संबंधों को स्पष्ट मान्यता हासिल है।

इसके साथ ही अदालत ने इस बात पर भी जोर दिया कि देश की विधायिका ने भी महिलाओं के अधिकारों को सुरक्षित करने के लिए कड़े प्रावधान किए हैं। उदाहरण के तौर पर घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 जैसी कानूनी धाराओं के माध्यम से ऐसे लिव-इन संबंधों में रह रही महिलाओं के अधिकारों को व्यापक सुरक्षा कवच प्रदान किया गया है।

सवाल-जवाब

दिल्ली हाईकोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप पर क्या अहम फैसला दिया है?
अदालत ने स्पष्ट किया है कि दो बालिगों की आपसी मर्जी से साथ रहने के फैसले में परिवार या समाज का कोई व्यक्ति बाधा नहीं डाल सकता और यह रिश्ता विवाह के समान अधिकार रखता है।
यह मामला किस कपल से संबंधित था और उन्हें क्या धमकियां मिल रही थीं?
यह याचिका 30 से 35 वर्ष की आयु के एक लिव-इन कपल ने दायर की थी, जिन्हें लड़की के पिता और भाई की तरफ से हिंसा और जान से मारने की लगातार धमकियां मिल रही थीं।
पुलिस के पास जाने पर कपल को राहत क्यों नहीं मिली?
कपल ने सबसे पहले स्थानीय थाना प्रभारी से सुरक्षा की गुहार लगाई थी, लेकिन पुलिस द्वारा कार्रवाई न किए जाने पर उन्हें हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा।
जस्टिस सौरभ बनर्जी की पीठ ने इस मामले में क्या आदेश पारित किया?
जस्टिस सौरभ बनर्जी की पीठ ने 13 अगस्त को अपने आदेश में कपल को तुरंत पुलिस सुरक्षा प्रदान करने के कड़े निर्देश दिए।
अदालत ने लिव-इन रिलेशनशिप को महिलाओं के कानूनी अधिकारों से कैसे जोड़ा?
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों और घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 का हवाला देते हुए बताया कि विधायिका ने ऐसे रिश्तों में महिलाओं के अधिकारों को कानूनी सुरक्षा दी है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Rohan Verma@rohan-verma·1 घंटे पहले

दिल्ली उच्च न्यायालय का यह फैसला न केवल व्यक्तिगत स्वतंत्रता को रेखांकित करता है, बल्कि यह प्रशासनिक और पुलिस तंत्र की उस कार्यशैली पर भी बड़ा सवाल खड़ा करता है जो अक्सर अंतर-साम्प्रदायिक या परिवार के दबाव वाले मामलों में शुरुआती मदद से कतराती है। उत्तर प्रदेश और अन्य हिंदी बेल्ट के राज्यों में भी इस तरह के मामलों में अक्सर स्थानीय पुलिस स्तर पर लापरवाही देखी जाती है। अदालत के इस स्पष्ट निर्देश के बाद अब पुलिस थानों को बालिग जोड़ों की सुरक्षा याचिकाओं पर अधिक गंभीरता से विचार करना होगा, जिससे जमीनी स्तर पर मनमाने सामाजिक हस्तक्षेप और अपराधों पर लगाम कसने में मदद मिलेगी।

Karan Malhotra@karan-malhotra·1 घंटे पहले

रोहन के विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए, यह मामला कानून-व्यवस्था और जमीनी पुलिसिंग की संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़े करता है। जब बालिग जोड़ों को स्थानीय स्तर पर एसएचओ से सुरक्षा नहीं मिलती, तो न्याय प्रणाली पर दबाव बढ़ता है। इस फैसले के बाद, पुलिस थानों के लिए अनिवार्य होना चाहिए कि वे ऐसे धमकी के मामलों में बिना किसी सामाजिक पूर्वाग्रह के तत्काल एक्शन लें, तभी इस तरह के आपराधिक मामलों और अवैध दबावों पर प्रभावी रोक लगेगी।

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