जालोर जिले की आहोर नगर पालिका क्षेत्र में स्थित लगभग 100 करोड़ रुपये मूल्य की सरकारी जमीन से जुड़े बड़े विवाद में राजस्थान हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने इस मामले में पूर्व में दिए गए आदेशों के क्रियान्वयन पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है। इसके साथ ही विवादित भूमि के बेचान और नामांतरण (म्यूटेशन) से जुड़ी तमाम प्रक्रियाओं को आगामी सुनवाई तक पूरी तरह से स्थगित कर दिया है। हाईकोर्ट ने बिना किसी सक्षम स्वीकृति के सरकारी भूमि को किसी निजी व्यक्ति के नाम नामांकित किए जाने और अदालत में सरकारी पक्ष द्वारा की गई कमजोर पैरवी पर कड़ी नाराजगी व्यक्त की है। इस पूरे प्रकरण में जवाबदेही तय करने के उद्देश्य से अदालत ने तहसीलदार, तत्कालीन आहोर सरपंच तथा सरकारी वकील समेत कई प्रमुख जिम्मेदारों को व्यक्तिगत रूप से तलब किया है।
सरकारी जमीन की अवैध रजिस्ट्री और हाईकोर्ट का सख्त रुख
आहोर नगर पालिका की इस बहुमूल्य सार्वजनिक संपत्ति को कथित तौर पर बिना किसी सक्षम प्रशासनिक अनुमति या अधिकारिक मंजूरी के निजी स्वामित्व में दर्ज करा दिया गया था। मामले की सुनवाई के दौरान अदालत के सामने यह बात आई कि सरकारी जमीन के संरक्षण के लिए जिम्मेदार तंत्र ने अदालत में प्रभावी ढंग से पक्ष नहीं रखा। सरकारी वकीलों द्वारा मामले की उचित पैरवी न किए जाने को बेहद गंभीर मानते हुए हाईकोर्ट ने कड़ा संज्ञान लिया। सार्वजनिक भूमि को सुरक्षित रखने में लापरवाही और ढिलाई के आरोपों को देखते हुए अदालत ने बार काउंसिल के साथ ही संबंधित सरकारी अधिवक्ताओं को नोटिस जारी कर स्पष्टीकरण मांगा है।
3 नवंबर 2025 के आदेश के अमल पर लगी रोक
उच्च न्यायालय ने इस विवाद में 3 नवंबर 2025 को पारित किए गए अपने पूर्व आदेश के क्रियान्वयन पर अगली सुनवाई तक पूरी तरह रोक लगा दी है। कोर्ट के इस स्पष्ट निर्देश के बाद अब इस 100 करोड़ रुपये की जमीन पर किसी भी प्रकार का बेचान, खरीद-फरोख्त, हस्तांतरण या राजस्व रिकॉर्ड में नामांतरण नहीं किया जा सकेगा। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, अदालत के इस कदम से इस कीमती सरकारी संपत्ति को निजी हाथों में जाने से फिलहाल पूरी तरह से बचा लिया गया है। अगली सुनवाई तक जमीन की स्थिति यथावत बनी रहेगी और किसी भी तरह का नया कानूनी दावा मान्य नहीं होगा।
शिवसेना यूबीटी के जिला प्रमुख ने पेश किए थे दस्तावेज
आहोर के इस चर्चित भूमि प्रकरण में मोड़ तब आया जब शिवसेना यूबीटी के जिला प्रमुख और सामाजिक कार्यकर्ता रूप राजपुरोहित ने राजस्थान हाईकोर्ट के समक्ष मामले से जुड़े महत्वपूर्ण कागजात और तथ्य प्रस्तुत किए। प्रस्तुत किए गए दस्तावेजों का अध्ययन करने के बाद अदालत ने मामले की गंभीरता को समझा और त्वरित कार्रवाई करते हुए संबंधित अधिकारियों एवं अन्य पक्षों को अदालत में तलब करने का आदेश जारी किया। रूप राजपुरोहित की इस पहल के बाद ही सरकारी तंत्र की कथित लापरवाही और अवैध रजिस्ट्री का सच अदालत के सामने आ सका।
प्रेस कॉन्फ्रेंस में उठाई प्रशासनिक जवाबदेही की मांग
उच्च न्यायालय के निर्देशों के बाद शिवसेना यूबीटी के जिला प्रमुख रूप राजपुरोहित ने एक पत्रकार वार्ता का आयोजन कर पूरे घटनाक्रम की जानकारी सार्वजनिक की। उन्होंने कहा कि किसी भी क्षेत्र में सार्वजनिक एवं सरकारी भूमि की सुरक्षा की सीधी जिम्मेदारी स्थानीय प्रशासन और राज्य सरकार की होती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि इस मामले में नियमों का उल्लंघन कर किसी निजी व्यक्ति को लाभ पहुंचाने की कोशिश की गई है, तो जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। रूप राजपुरोहित ने हाईकोर्ट के इस हस्तक्षेप को सार्वजनिक संपत्तियों की सुरक्षा की दिशा में एक बेहद जरूरी और सराहनीय कदम बताया। अब सभी की नजरें मामले की अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां सभी तलब किए गए पक्ष अपना जवाब दाखिल करेंगे।



















