वैवाहिक रिश्तों में गंभीर संकट और घरेलू हिंसा का सामना कर रही महिलाओं के समर्थन में दिल्ली हाई कोर्ट ने एक बेहद मानवीय और दूरगामी टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट रूप से रेखांकित किया है कि जब कोई विवाहित बेटी अपने ससुराल में लगातार प्रताड़ना या मारपीट की शिकायत करे, तो मायके वालों को उसे चुपचाप सहने या समझौते का दबाव बनाने के बजाय तुरंत उसका ढाल बनना चाहिए। बेटी अगर वैवाहिक प्रताड़ना से तंग आकर माता-पिता के घर वापस लौटती है, तो इसे परिवार के लिए किसी भी सूरत में सामाजिक शर्म या हीनता का विषय नहीं समझा जाना चाहिए।
जस्टिस मधु जैन की पीठ ने वैवाहिक विवादों के संवेदनशील पहलुओं पर विचार करते हुए कहा कि एक बेटी की गरिमा और उसकी शारीरिक सुरक्षा हमेशा किसी भी विवाह को जबरन बनाए रखने से कहीं अधिक महत्वपूर्ण होती है। अदालत ने परिवारों को आगाह किया कि उन्हें अपनी बेटी की मदद के लिए किसी ऐसी दर्दनाक अनहोनी का इंतजार नहीं करना चाहिए, जिसकी भरपाई बाद में कभी न की जा सके। इसके साथ ही अदालत ने यह संतुलन भी साधा कि पति के परिवारजनों पर बिना पुख्ता साक्ष्यों के केवल रिश्तेदारी के आधार पर सामान्य आरोप लगाकर आपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जाना चाहिए।
अनीसिया बत्रा सुसाइड मामले में आठ साल बाद आया फैसला
यह महत्वपूर्ण फैसला जर्मनी की एक अंतरराष्ट्रीय विमानन कंपनी में कार्यरत 39 वर्षीय एयर होस्टेस अनीसिया बत्रा की मौत से जुड़े आठ साल पुराने मामले की सुनवाई के दौरान आया। अनीसिया ने 13 जुलाई 2018 को दक्षिण दिल्ली के पंचशील पार्क इलाके में कथित तौर पर खुदकुशी कर ली थी। घटना के बाद मयंक सिंघवी अपनी पत्नी अनीसिया को तत्काल पास के एक अस्पताल ले गया था, जहां डॉक्टरों ने जांच के बाद उसे मृत घोषित कर दिया था।
मृतका के परिजनों ने पति मयंक सिंघवी और उसके ससुराल पक्ष पर गंभीर प्रताड़ना, मारपीट और दहेज के लिए परेशान करने का आरोप लगाया था। मामले की कानूनी प्रक्रिया के तहत दिसंबर 2019 में सेशन कोर्ट ने मयंक के माता-पिता को दहेज हत्या और क्रूरता के आरोपों से मुक्त करने का आदेश दिया था। इस आदेश के खिलाफ दायर तीन अलग-अलग पुनरीक्षण याचिकाओं पर विस्तार से विचार करने के बाद जस्टिस मधु जैन ने पति मयंक सिंघवी को भी क्रूरता और आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोपों से पूरी तरह बरी कर दिया, साथ ही उसके माता-पिता को राहत देने वाले पूर्व आदेश को बरकरार रखा।
मायके वालों को सामाजिक डर छोड़कर बेटी का सहारा बनना चाहिए
अदालत ने भारतीय सामाजिक व्यवस्था में अक्सर बेटियों पर बनाए जाने वाले वैवाहिक समझौते के दबाव का गहराई से विश्लेषण किया। अदालत ने अपने आदेश में रेखांकित किया कि सामाजिक अस्वीकृति या लोकलाज के डर से माता-पिता को अपनी ही बेटी को एक सुरक्षित छत देने में हिचकिचाना नहीं चाहिए। अगर कोई महिला अपने वैवाहिक जीवन में बार-बार हिंसा का सामना कर रही है, तो उसकी पीड़ा को नजरअंदाज करना या उसे केवल स्थिति से तालमेल बिठाने की सलाह देना स्थिति को और गंभीर बना देता है।
अदालत ने टिप्पणी की, "शादी बचाने को उसकी सुरक्षा एवं गरिमा से अधिक महत्व नहीं दिया जा सकता और उसका साथ देने के लिए किसी ऐसी त्रासदी का इंतजार नहीं करना चाहिए, जिसकी भरपाई न हो सके।"
फैसले में यह भी कहा गया कि माता-पिता को यह समझना होगा कि उनके घर के दरवाजे बेटी के लिए हमेशा खुले रहने चाहिए। जब परिवार वक्त रहते हस्तक्षेप नहीं करता और बेटी को उसी हिंसक माहौल में धकेलता रहता है, तो इसके गंभीर और जानलेवा परिणाम सामने आते हैं। अदालत के अनुसार, परिवार का संबल ही किसी प्रताड़ित महिला को जीवन का सबसे बड़ा सहारा दे सकता है।
पति के रिश्तेदारों को बिना ठोस साक्ष्य के फंसाने पर चिंता
अदालत ने जहां एक तरफ पीड़ित महिलाओं को कानूनन पूरा संरक्षण देने की आवश्यकता दोहराई, वहीं दूसरी ओर वैवाहिक विवादों में पति के समूचे परिवार को लपेटने की बढ़ती कानूनी प्रवृत्ति पर गंभीर चिंता जताई। जस्टिस मधु जैन ने कहा कि जब भी कोई वैवाहिक मनमुटाव बढ़ता है, तो दूर-दराज के रिश्तेदारों और ससुराल वालों पर सामान्य एवं अस्पष्ट आरोप मढ़ दिए जाते हैं।
फैसले में बताया गया कि एक आपराधिक मुकदमे की मार केवल अदालत की चारदीवारी और तारीखों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि इससे निर्दोष व्यक्तियों का सामाजिक सम्मान, नौकरी, आजीविका और पारिवारिक ताना-बाना पूरी तरह बिखर जाता है। इसलिए कानून की यह दोहरी जिम्मेदारी है कि वह जहां वास्तविक पीड़िता को न्याय दिलाए, वहीं केवल रिश्तेदार होने की वजह से किसी भी व्यक्ति को अनावश्यक कानूनी और आपराधिक प्रताड़ना से पूरी तरह सुरक्षित रखे।
आत्महत्या के लिए उकसाने के अपराध की कानूनी सीमाएं
अदालत ने भारतीय दंड संहिता के तहत आत्महत्या के लिए उकसाने के कानूनी पहलुओं को भी स्पष्ट किया। कोर्ट ने निर्धारित किया कि दो लोगों के बीच आपसी वैवाहिक कलह, घरेलू तनाव, मानसिक अशांति या लगातार बिगड़ते रिश्ते अपने आप में तब तक आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध नहीं माने जा सकते, जब तक कि आरोपी की तरफ से कोई सक्रिय, स्पष्ट और जानबूझकर की गई प्रत्यक्ष भूमिका साबित न हो।
अदालत ने यह भी साफ किया कि यदि कोई व्यक्ति जान देने से पहले कोई संदेश या पत्र छोड़कर अपने इस कदम के लिए किसी अन्य पक्ष को जिम्मेदार ठहराता है, तो भी महज उस संदेश के आधार पर कानूनन आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध सिद्ध नहीं हो जाता। किसी भी व्यक्ति को दोषी ठहराने के लिए घटना के पीछे की स्पष्ट मंशा और प्रत्यक्ष उकसावे के ठोस कानूनी सबूतों का होना अनिवार्य है। इन सभी कानूनी मापदंडों का परीक्षण करने के बाद अदालत ने तीनों याचिकाओं का निपटारा करते हुए आरोपियों को राहत प्रदान की।























