नई दिल्ली में आयोजित विपक्षी इंडिया ब्लॉक की एक हालिया रैली के दौरान सामने आई एक तस्वीर ने वामपंथी राजनीति के भीतर हलचल पैदा कर दी है। इस तस्वीर में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) यानी सीपीआईएम के महासचिव एमए बेबी, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से बेहद आत्मीय अंदाज में उनके कान में कुछ कहते दिख रहे हैं, जबकि तृणमूल कांग्रेस प्रमुख मुस्कुराते हुए उनकी बात सुन रही हैं। शीर्ष नेतृत्व के स्तर पर भारतीय जनता पार्टी को चुनौती देने के लिए बन रही इस तरह की केमिस्ट्री भले ही राष्ट्रीय राजनीति में सामान्य लगे, लेकिन पार्टी की राज्य इकाइयों और जमीनी कार्यकर्ताओं के स्तर पर इसे लेकर भारी असहजता और मतभेद उभर आए हैं।
पश्चिम बंगाल का पुराना सियासी टकराव
पश्चिम बंगाल की राजनीति के संदर्भ में इस तस्वीर का दिखना कभी लगभग अकल्पनीय माना जाता था। ममता बनर्जी की पूरी राजनीति का मुख्य आधार ही राज्य में दशकों पुराने वामपंथी शासन को उखाड़ फेंकना रहा है। वर्ष 2011 में वाम मोर्चे के 34 साल पुराने गढ़ को ध्वस्त करके उन्होंने सत्ता हासिल की थी। यह सफलता उन्हें कांग्रेस छोड़ने के करीब 13 साल बाद मिली थी, जब उन्होंने कांग्रेस पार्टी की वामपंथ के प्रति रणनीति और इरादों पर सवाल उठाते हुए अपना अलग रास्ता चुना था। अब उसी तृणमूल कांग्रेस और वामपंथियों के शीर्ष नेताओं के बीच ऐसी गर्मजोशी दिखना वाम मोर्चे के एक बड़े हिस्से के लिए पचा पाना आसान नहीं है।
दुश्मन का दुश्मन दोस्त या पहचान का संकट
इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में यह बड़ा रणनीतिक सवाल है कि क्या वामपंथी दल पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ कड़ा संघर्ष जारी रखते हुए राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा से मुकाबला कर सकते हैं। कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर एक तबका यह मानता है कि मौजूदा राजनीतिक हालात में भाजपा को रोकने के लिए 'दुश्मन के दुश्मन' से हाथ मिलाना जरूरी हो गया है, भले ही वे दल राज्य स्तर पर उनके सीधे राजनीतिक विरोधी हों। इस विचार के पैरोकार याद दिलाते हैं कि सीपीआईएम की सर्वोच्च नीति निर्धारण संस्था ने भी सांप्रदायिक ताकतों को रोकने के लिए पहले कांग्रेस को समर्थन देने के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी।
इस सोच से सहमति रखने वालों का यह भी विश्लेषण है कि जब वामपंथियों ने कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन यानी यूपीए से अपना समर्थन वापस लिया था, तभी से चुनावी राजनीति में उनके जनाधार में लगातार गिरावट आनी शुरू हुई थी। उनके अनुसार, व्यापक गठबंधन में बने रहने से ही वामपंथी ताकतें मुख्यधारा की राष्ट्रीय राजनीति में अपनी प्रासंगिकता बचा सकती हैं।
फैसले का पुरजोर विरोध और कार्यकर्ताओं का दर्द
हालांकि, पार्टी के भीतर इस पूरी समझ का कड़ा विरोध करने वाला खेमा भी काफी मजबूत है। विरोध करने वाले नेताओं का तर्क है कि जब पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की ताकत अपने चरम पर थी, तब वामपंथियों ने कांग्रेस के साथ चुनावी तालमेल करके देख लिया था, लेकिन वह प्रयोग तृणमूल को सत्ता से हटाने में पूरी तरह नाकाम साबित हुआ था। इसके अलावा राज्य इकाई के नेताओं का हमेशा से यह रुख रहा है कि भाजपा और तृणमूल कांग्रेस वास्तव में एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
बंगाल में पार्टी नेताओं का मानना है कि तृणमूल कांग्रेस के साथ किसी भी प्रकार की नरमी या समझौते की छवि बनते ही वामपंथ की अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान खत्म होने लगेगी। इसका सबसे बुरा असर उन जमीनी कार्यकर्ताओं पर पड़ेगा जो दशकों से राज्य में तृणमूल के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं। पार्टी के कार्यकर्ता लंबे समय से यह आरोप लगाते रहे हैं कि ममता बनर्जी के शासनकाल में उनके समर्थकों को राजनीतिक हिंसा और प्रताड़ना का सामना करना पड़ा है। ऐसे में नेताओं की यह निकटता कार्यकर्ताओं के बीच भारी भ्रम और हताशा पैदा कर सकती है।
केरल का अंतर्विरोध और प्रकाश करात की रणनीति
वामपंथ के लिए यह पहेली केवल पश्चिम बंगाल तक सीमित नहीं है, बल्कि दक्षिण भारत में भी इसके गहरे अंतर्विरोध हैं। केरल में वाम मोर्चा और कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन के बीच आमने-सामने का सीधा चुनावी मुकाबला है। पार्टी के कई अंदरूनी हलकों में यह चर्चा चल रही है कि मौजूदा नेतृत्व द्वारा अपनाया जा रहा यह रुख पूर्व महासचिव प्रकाश करात की पुरानी सैद्धांतिक लाइन से एक बड़ा भटकाव है। प्रकाश करात के दौर में पार्टी ने कांग्रेस और क्षेत्रीय क्षत्रपों के साथ समझौते की एक सख्त सीमा तय की थी ताकि पार्टी की स्वतंत्र पहचान न खोए।
संसद में घटती ताकत और रणनीतिक विवशता
सीपीआईएम प्रमुख के पद पर आने के बाद से एमए बेबी ने भाजपा विरोधी मोर्चे को एकजुट करने पर लगातार जोर दिया है। इंडिया ब्लॉक की बैठकों और मंचों पर ममता बनर्जी के साथ उनका संवाद लगातार सहज और दोस्ताना रहा है। इस समय संसद के भीतर सीपीआईएम की सीटों की संख्या ऐतिहासिक रूप से अपने न्यूनतम स्तर पर पहुंच चुकी है, जबकि भाजपा एक विशाल राजनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित है। इस कमजोर चुनावी स्थिति के कारण पार्टी के कुछ रणनीतिकारों को लगता है कि विपक्ष की एकता अब केवल एक विकल्प नहीं बल्कि अस्तित्व बचाने की अनिवार्य शर्त बन गई है। इसके विपरीत, पार्टी के निष्ठावान कैडर को डर है कि शीर्ष नेताओं की इन तस्वीरों और संवादों से जनता में यह गलत संदेश चला जाएगा कि वाम दल तृणमूल के खिलाफ अपनी लड़ाई में ढीले पड़ रहे हैं।


















