झारखंड की राजधानी रांची स्थित मेदांता अस्पताल के ऑर्थोपेडिक सर्जन डॉक्टर उज्जवल सिन्हा अब तक 800 से अधिक घुटनों का रिप्लेसमेंट ऑपरेशन सफलतापूर्वक पूरा कर चुके हैं. घुटने के गंभीर दर्द से जूझ रहे कई मरीज अक्सर मन में बैठे डर और भ्रांतियों की वजह से सर्जरी कराने से बचते हैं. लंबे समय तक असहनीय दर्द सहने के बावजूद लोग सही समय पर चिकित्सा परामर्श नहीं लेते, जिससे उनकी समस्या और बढ़ जाती है.
95 प्रतिशत से अधिक है सर्जरी की सफलता दर
डॉक्टर उज्जवल सिन्हा के अनुसार उनके द्वारा किए गए ऑपरेशनों में सफलता दर 95% से अधिक दर्ज की गई है. शेष 5% मामलों में मरीजों की अत्यधिक उम्र या फिर ऑपरेशन के बाद के जरूरी नियमों की अनदेखी मुख्य वजह बनती है. कई मरीज यह मान लेते हैं कि केवल शल्य चिकित्सा हो जाने से वे पूरी तरह ठीक हो चुके हैं. यही सोच उनकी रिकवरी में सबसे बड़ी बाधा बन जाती है, क्योंकि असली सुधार प्रक्रिया ऑपरेशन के बाद के अनुशासन पर टिकी होती है.
फिजियोथेरेपी को न समझें गैरजरूरी, यह है दवा समान
शल्य क्रिया के बाद फिजियोथेरेपी को सबसे अहम बताते हुए डॉक्टर सिन्हा ने स्पष्ट किया कि सर्जरी से घुटने का सरफेस और लिगामेंट तो बदल जाता है, लेकिन चलने के लिए आवश्यक ताकत मांसपेशियों से ही आती है. यदि मांसपेशियां कमजोर और ढीली रह जाएं, तो नया घुटना मिलने के बावजूद मरीज सामान्य रूप से नहीं चल पाता. फिजियोथेरेपी कमजोर हो चुकी मांसपेशियों को जरूरी बल प्रदान करती है, ताकि जोड़ सही दिशा और दबाव के साथ काम कर सके. इसीलिए रिप्लेसमेंट के बाद इसे किसी आवश्यक दवा की तरह नियमित रूप से अपनाना बेहद अनिवार्य है.
20 से 25 साल तक आराम से टिकते हैं नए घुटने
घुटने के रिप्लेसमेंट को लेकर यह आम धारणा प्रचलित है कि नया जोड़ केवल 8 से 10 वर्ष ही काम करता है. डॉक्टर उज्जवल ने इस बात को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि उनके कई मरीज ऑपरेशन के बाद 20 से 25 साल तक बिना किसी परेशानी के सामान्य जीवन बिता रहे हैं. मरीजों को सर्जरी के बाद 25 वर्षों तक किसी तरह की चिंता करने की आवश्यकता नहीं होती, बशर्ते वे नियमित रूप से फिजियोथेरेपी करते रहें. उन्होंने यह भी जोड़ा कि यदि इतने लंबे समय बाद कोई समस्या आती भी है, तो आधुनिक चिकित्सा प्रणाली में मौजूद उन्नत उपकरणों और तकनीकों के जरिए दोबारा मरम्मत संभव है, इसलिए घबराने की बिल्कुल जरूरत नहीं है.



















