दिल्ली हाईकोर्ट ने साफ कर दिया है कि जंतर-मंतर पर एक महिला प्रदर्शनकारी को थप्पड़ जड़ने के आरोपों से घिरे एडीसीपी संदीप लांबा को अभी अदालत की निगरानी वाली जांच से बाहर नहीं किया जाएगा. मंगलवार को सुनवाई करते हुए अदालत ने उन्हें जांच से हटाने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी.
क्या है पूरा विवाद
20 जुलाई को दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी के 'चलो संसद' मार्च के दौरान जंतर-मंतर पर जबरदस्त हंगामा हुआ था. इसी हंगामे के बीच एक वीडियो सामने आया, जिसमें एडीसीपी संदीप लांबा एक महिला प्रदर्शनकारी को कथित तौर पर थप्पड़ मारते नजर आए. यह वीडियो देखते ही देखते सोशल मीडिया पर वायरल हो गया और भारी विरोध शुरू हो गया. विरोध इतना तेज था कि अगले ही दिन संदीप लांबा को जंतर-मंतर की प्रदर्शन ड्यूटी से हटा दिया गया.
हाईकोर्ट में क्यों पहुंचा मामला
यह याचिका 68 साल की एक महिला ने दायर की थी, जिसका मामला थप्पड़ कांड से बिल्कुल अलग है. महिला का आरोप है कि पिछले साल रमजान के दौरान दिल्ली पुलिस उन्हें जबरन उनके घर से बाहर निकाल ले गई थी और पूरी रात गैरकानूनी तरीके से हिरासत में रखा था. हाईकोर्ट ने पहले ही इस शिकायत की स्वतंत्र जांच के आदेश दे दिए थे, और यह जांच एडीसीपी संदीप लांबा की निगरानी में चल रही थी. बाद में महिला ने अदालत से गुहार लगाई कि यह जांच संदीप लांबा से लेकर किसी और अधिकारी को सौंप दी जाए. उनकी दलील थी कि जंतर-मंतर के थप्पड़ वाले वीडियो के सामने आने के बाद संदीप लांबा की निष्पक्षता पर से उनका भरोसा उठ गया है.
महिला के वकील का तर्क
महिला के वकील ने अदालत में दलील दी कि एक वर्दीधारी अधिकारी को दिन-दहाड़े एक महिला को थप्पड़ मारते देखा गया, और यही घटना पूरे मामले में पक्षपात की गंभीर आशंका पैदा करती है. याचिकाकर्ता की ओर से यह भी आरोप लगाया गया कि संदीप लांबा ने पहले उनका बयान दर्ज किए बगैर ही जांच बंद करने की कोशिश की थी. इसके बाद अदालत को दखल देकर उन्हें बयान दर्ज करने का निर्देश देना पड़ा था.
जस्टिस गिरीश कठपालिया ने क्या कहा
जस्टिस गिरीश कठपालिया ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि सिर्फ एक वीडियो में किसी महिला को कथित तौर पर थप्पड़ मारते दिखने भर से अधिकारी की छवि को खराब नहीं किया जा सकता. उन्होंने सवाल उठाया कि क्या किसी को उस पल की असली जमीनी हकीकत पता है, यानी उस वक्त हालात असल में कितने बेकाबू थे. अपनी बात को और स्पष्ट करते हुए जस्टिस कठपालिया ने कहा, "अगर भीड़ संसद में घुस जाती, गोलीबारी होती और कई लोगों की जान चली जाती, तब क्या होता?"
कोर्ट बोला, विरोध का अधिकार है, लेकिन सीमा भी है
अदालत ने आगे कहा कि प्रदर्शन करना हर नागरिक का मौलिक अधिकार जरूर है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि संसद जैसे संप्रभुता के केंद्र को नुकसान पहुंचाने की छूट मिल जाए. जस्टिस कठपालिया ने यह भी कहा कि भले ही यह मामला अधिकार के दुरुपयोग का ही क्यों न हो, फिर भी संदीप लांबा को महज इस आधार पर बदनाम नहीं किया जा सकता. अदालत के मुताबिक उन्हें भी किसी और आम नागरिक की तरह निष्पक्ष सुनवाई और निष्पक्ष जांच का पूरा हक है. जस्टिस कठपालिया ने यह टिप्पणी भी की कि अगर आने वाले वक्त में जांच में संदीप लांबा दोषी भी पाए जाते हैं, तब भी यह मान लेना ठीक नहीं होगा कि वह हर मामले में गलत या पक्षपातपूर्ण तरीके से ही काम करेंगे. यानी एक घटना में लगे आरोप के आधार पर किसी अधिकारी की पूरी कार्यशैली पर सवाल नहीं उठाया जा सकता.
क्या रहा कोर्ट का आखिरी फैसला
इन सभी दलीलों को सुनने के बाद हाईकोर्ट ने महिला की याचिका को खारिज कर दिया और संदीप लांबा को उनकी 68 साल की महिला की शिकायत से जुड़ी जांच की निगरानी से नहीं हटाया. इसका मतलब यह हुआ कि रमजान के दौरान हुई कथित गैरकानूनी हिरासत की जांच फिलहाल एडीसीपी संदीप लांबा की निगरानी में ही आगे बढ़ेगी, जबकि जंतर-मंतर थप्पड़ कांड को लेकर उनके खिलाफ अलग से जो सवाल उठे हैं, उन पर अभी अदालत ने कोई राय नहीं दी है.


















