राजधानी दिल्ली में अनधिकृत निर्माण और अवैध रूप से चल रहे पीजी तथा हॉस्टलों के खिलाफ इन दिनों व्यापक स्तर पर अभियान चलाया जा रहा है। अधिकारियों द्वारा शहर भर में सभी पीजी और हॉस्टल परिसरों की बारिकी से जांच की जा रही है और उनके दस्तावेजों को खंगाला जा रहा है। इस कड़ी कार्रवाई के तहत नगर निगम के सभी 12 जोन्स में कुल 34 अवैध इमारतों को ध्वस्त किया जा चुका है, 12 इमारतों को सील किया गया है और नियमों का उल्लंघन करने वाले 22 मकान मालिकों को औपचारिक नोटिस भी जारी किए गए हैं। जो भी निर्माण कार्य दिल्ली मास्टर प्लान और बिल्डिंग बायलॉज के प्रावधानों के विपरीत किए गए हैं, उनके खिलाफ सख्त कदम उठाए जा रहे हैं। प्रशासन ने ऐसे 1,243 मकानों की पहचान की है जहां वर्तमान में पीजी संचालित हो रहे हैं और जिनमें लगभग 24,000 लोग निवास कर रहे हैं।
दिल्ली में शैक्षणिक संस्थानों का बड़ा केंद्र होने के कारण देश भर से युवा पढ़ाई के लिए पहुंचते हैं। शहर में कुल 29 विश्वविद्यालय संचालित होते हैं और सैकड़ों कोचिंग संस्थान भी यहां मौजूद हैं। अकेले दिल्ली विश्वविद्यालय के अंतर्गत ही 91 कॉलेज आते हैं, लेकिन इनमें से मात्र 20 कॉलेजों के पास ही अपने हॉस्टल की सुविधा उपलब्ध है। शेष 71 कॉलेजों में पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं को अपने रहने के लिए निजी तौर पर आवास की व्यवस्था करनी पड़ती है। एक अनुमान के मुताबिक हर साल लगभग 7 लाख छात्र पढ़ाई के सिलसिले में दिल्ली आते हैं, जबकि इसके मुकाबले कॉलेजों के हॉस्टल में कुल सीटों की संख्या मात्र 11,500 ही है। ऐसे में यह गंभीर सवाल खड़ा होता है कि बाकी के छात्र आखिर कहां ठहरें, कहां निवास करें और अपनी पढ़ाई सुचारू रूप से कैसे जारी रखें।
ब्रिटेन के आवासीय कानूनों से सीखने की जरूरत
विदेशों की व्यवस्था का अध्ययन करते हुए ब्रिटेन में छात्रों के लिए उपलब्ध निजी आवास प्रणाली को देखा जा सकता है, जो वहां के हाउसिंग एक्ट 2004 के तहत नियंत्रित होती है। इस कानून के अंतर्गत सुरक्षा मानकों, टेनेंसी रेग्यूलेशंस और कोड्स ऑफ प्रैक्टिस जैसे कड़े नियम निर्धारित किए गए हैं। छात्रों के लिए उपलब्ध सभी प्राइवेट अकॉमडेशन इन्हीं कानूनी प्रावधानों के दायरे में संचालित होते हैं। प्रत्येक कमरे के साथ साझा किचन और वॉशिंग मशीन की सुविधा होना अनिवार्य है, और इन व्यवस्थाओं के लिए भी स्थानीय काउंसिल्स के कड़े मानकों का पूरी तरह पालन करना पड़ता है।
अग्निश सुरक्षा और आपातकालीन निकास मार्गों को लेकर वहां किसी भी प्रकार की लापरवाही या समझौता बर्दाश्त नहीं किया जाता है। ऐसी प्रत्येक आवासीय संपत्ति में हर मंजिल पर काम करने वाली स्मोक अलार्म यूनिट और कार्बन मोनोऑक्साइड डिटेक्टर्स का होना कानूनी रूप से जरूरी है। इसके अलावा कमरों में जो भी फर्नीचर उपलब्ध कराया जाता है, उसका फायर रेसिस्टेंट होना भी आवश्यक है। मकान मालिकों को हर साल गैस सेफ्टी सर्टिफिकेट प्रस्तुत करना होता है और यह सुनिश्चित करना पड़ता है कि परिसर में रखे सभी इलेक्ट्रिकल अप्लायंसेज पूरी तरह सुरक्षित हैं। ब्रिटेन में अधिकांश विश्वविद्यालय और कॉलेज छात्रों को सुरक्षित आवास दिलाने में सक्रिय रूप से सहायता करते हैं, और छात्र भी केवल उन्हीं स्थानों पर निवास करते हैं जिन्हें विशेष रूप से इस कानून के तहत निर्मित किया गया है।
हमारे देश में भी कानूनों और नियमों की कोई कमी नहीं है, किंतु विडंबना यह है कि वे केवल फाइलों तक ही सीमित रहकर रह जाते हैं। हमने नियम तो बना दिए हैं, लेकिन ज़मीन पर उनका पालन कराने वाला कोई नहीं दिखता है। अब उपयुक्त अवसर आ गया है कि इन सभी नियमों को पूरी सख्ती के साथ लागू किया जाए ताकि इस गंभीर आवासीय समस्या को जड़ से समाप्त किया जा सके।
पूरा वंदे मातरम्: कांग्रेस में इतनी बेचैनी क्यों?
कांग्रेस पार्टी पर आरोप है कि वह INDI अलायंस की अन्य घटक पार्टियों पर यह दबाव बना रही है कि वे भी संपूर्ण वंदे मातरम् के गायन का विरोध करें। बीते 7 सितंबर को श्रीनगर में आयोजित अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के उद्घाटन समारोह के दौरान पूरा वंदे मातरम् गाया गया था, जिस अवसर पर जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और फारूक अब्दुल्ला दोनों ही सम्मान में खड़े रहे। इस घटनाक्रम से कांग्रेस पार्टी असहज हो गई। कांग्रेस के महासचिव के. सी. वेणुगोपाल ने नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला और मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला से आग्रह किया है कि वे पूरा वंदे मातरम् न गाएं और केवल दो अंतरों का ही उच्चारण करें, क्योंकि स्वाधीनता सेनानियों ने केवल दो अंतरों को ही राष्ट्रगीत का हिस्सा माना था।
कांग्रेस की इस प्रकार की नसीहत को नेशनल कॉन्फ्रेंस ने स्वीकार करने से इंकार कर दिया। नेशनल कॉन्फ्रेंस के विधायक तनवीर सादिक ने दो टूक शब्दों में कहा कि उनकी पार्टी उस कानून का पूरी तरह पालन करेगी जिसे देश की संसद ने विधिवत पारित किया है। इस पूरे घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष नितिन नवीन ने राहुल गांधी पर सीधा हमला बोला और उन्हें मियां राहुल कहकर संबोधित किया। नितिन नवीन ने कहा कि मियां राहुल को भारत की समृद्ध संस्कृति और महान स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास का कोई ज्ञान नहीं है, और इसी वजह से वे केवल अपने राजनीतिक फायदों के लिए वंदे मातरम् का विरोध कर रहे हैं। यदि डॉ. फारूक अब्दुल्ला और उमर अब्दुल्ला पूरा राष्ट्रगीत गा सकते हैं, तो इसमें कांग्रेस के अन्य नेताओं को क्या आपत्ति हो सकती है?
जहां तक वर्ष 1937 के कांग्रेस के प्रस्ताव का विषय है, उस कालखंड में भारत अखंड था और पाकिस्तान का विभाजन नहीं हुआ था। जिन लोगों को संपूर्ण वंदे मातरम् गाने को लेकर आपत्ति थी, वे उस समय पाकिस्तान चले गए थे। कांग्रेस पार्टी के ही एक सूत्र ने स्पष्ट किया कि मूल समस्या कांग्रेस का वह पुराना प्रस्ताव नहीं है, बल्कि असली वजह केरल की राजनीतिक स्थिति है। केरल में कांग्रेस ने मुस्लिम लीग के साथ गठबंधन करके सरकार बनाई हुई है और वहां अपने मुस्लिम वोट बैंक को सुरक्षित रखने के लिए कांग्रेस पूरी तरह मुस्लिम लीग पर निर्भर बनी हुई है। इसके अलावा कांग्रेस के भीतर यह धारणा बैठ गई है कि पूरा वंदे मातरम् गाने से विशेष समुदाय की भावनाएं आहत हो सकती हैं और वे नाराज हो सकते हैं। यही मुख्य कारण है कि जब फारूक अब्दुल्ला और उमर अब्दुल्ला ने पूरा राष्ट्रगीत गाया, तो कांग्रेस पार्टी को राजनीतिक परेशानी का सामना करना पड़ा और नितिन नवीन के बयानों ने इस मामले में रही-सही कसर भी पूरी कर दी।
ईरान से युद्ध: ट्रम्प कब रुकेंगे?
मध्य पूर्व में अमेरिका और ईरान के बीच चल रहा सैन्य संघर्ष एक बार फिर बेहद खतरनाक मोड़ पर पहुंच गया है। अमेरिकी सशस्त्र बलों ने स्ट्रेट ऑफ होर्मूज क्षेत्र में कार्रवाई करते हुए ईरान के 5 तेल टैंकरों को समुद्र में डुबो दिया है। इस आक्रामकता के जवाब में ईरानी सेना ने अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाते हुए 50 मिसाइलें दाग दी हैं। इस भीषण युद्ध की वजह से स्ट्रेट ऑफ होर्मूज एक बार फिर पूरी तरह से अवरुद्ध हो गया है और आवाजाही ठप पड़ी है। होर्मूज जलडमरूमध्य में इस समय कुल 467 जहाज फंसे हुए हैं, जिनमें 162 कार्गो शिप, 42 तेल टैंकर, 51 फिशिंग शिप, 26 पैसेंजर शिप और 62 अन्य जलपोत शामिल हैं।
इस भू-राजनीतिक तनाव के परिणामस्वरूप अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें आसमान छूते हुए 100 डॉलर प्रति बैरल के आंकड़े को पार कर चुकी हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का इस संबंध में कहना है कि तेल की कीमतों में यह तेजी आगामी नवंबर महीने में अमेरिका में होने वाले चुनावों की समाप्ति तक जारी रहेगी और उसके बाद ही क्रूड ऑयल के भाव में गिरावट आएगी। ट्रंप को पूरी उम्मीद है कि इसके बाद ईरान की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ेगा और वह घुटने टेकने को मजबूर होगा। हालांकि पेट्रोलियम उत्पादों के दाम बढ़ने से पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। इस स्थिति के चलते संयुक्त अरब अमीरात (UAE) का दुनिया का सबसे बड़ा कमर्शियल हब बनने का सपना भी अधर में लटक गया है। ईरान के साथ इस युद्ध के कारण अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की लोकप्रियता रेटिंग में भी खासी गिरावट दर्ज की गई है। दुनिया भर के देश यही चाहते हैं कि ट्रंप वास्तविक जमीनी स्थिति को समझें और इस विनाशकारी युद्ध को यथाशीघ्र समाप्त करें।
इस पूरे मुद्दे पर अधिक जानकारी के लिए आप आज की बात, रजत शर्मा के साथ का वीडियो देख सकते हैं।


















