देश के किसी भी हिस्से में सुबह के समय या फिर दोपहर को स्कूल की छुट्टी के वक्त एक बहुत ही आम और चिंताजनक नजारा देखने को मिलता है। छोटे-छोटे मासूम बच्चे अपने कंधों और पीठ पर विशालकाय और भारी-भरकम बस्ते टांगे हुए धीरे-धीरे कदम बढ़ाते नजर आते हैं। कई बार तो इन बच्चों को देखकर ऐसा लगता है कि इनके बस्तों का कुल वजन खुद इन मासूमों के शारीरिक वजन से भी कहीं अधिक है। समाज के तौर पर हम सभी इस विकट समस्या को भली-भांति स्वीकार करते हैं और इसे लेकर समय-समय पर चिंता भी व्यक्त करते हैं। इस विषय पर देश में लंबे समय से गहन विचार-विमर्श हुए हैं, कई महत्वपूर्ण अध्ययन किए गए हैं और अंततः इसे एक व्यापक राष्ट्रीय नीति का रूप भी दिया गया। इस नीति के अंतर्गत स्पष्ट रूप से यह निर्धारित किया गया है कि अलग-अलग कक्षाओं के स्कूली बच्चों के बस्ते का वजन कितना होना चाहिए। ऐसे में सबसे बड़ा और बुनियादी सवाल यह नहीं है कि हम इस समस्या से अनभिज्ञ हैं, बल्कि असली सवाल यह है कि आखिर देश के कोने-कोने में आज भी लाखों बच्चे बस्ते के रूप में इतना भारी बोझ उठाने के लिए विवश क्यों हैं।
देश में स्कूली शिक्षा का विशाल दायरा और बस्तों का भारी भरकम वजन
भारत की स्कूली शिक्षा व्यवस्था दुनिया की सबसे बड़ी प्रणालियों में से एक है, जिसमें लगभग 14.67 लाख स्कूल संचालित हो रहे हैं और इनमें करीब 24.72 करोड़ स्कूली बच्चे अपनी पढ़ाई पूरी कर रहे हैं। इतनी विशाल छात्र संख्या के कारण ही स्कूल बैग के वजन का यह मुद्दा, जो पहली नजर में देखने में अत्यंत सामान्य या छोटा लग सकता है, वास्तव में एक बेहद संवेदनशील और राष्ट्रव्यापी मुद्दा बन जाता है। इस विषय पर हुए सरकारी अध्ययनों और सर्वेक्षणों से यह स्पष्ट रूप से प्रमाणित होता है कि अभिभावक भी इसे किसी भी तरह से कोई मामूली समस्या नहीं मानते हैं। नीति निर्माण के दौरान किए गए विभिन्न विचार-विमर्श सत्रों में अधिकांश माता-पिता ने खुलकर यह स्वीकार किया कि भारी स्कूल बैग उनके बच्चों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए एक बेहद गंभीर और निरंतर बनी रहने वाली समस्या है। इस जन-भागीदारी और अभिभावकों के विचारों ने ही स्कूल बैग नीति 2020 को तैयार करने में एक मार्गदर्शक और अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
इस राष्ट्रीय सर्वेक्षण के दौरान सामने आए तथ्य और आंकड़े बेहद चौंकाने वाले हैं। सर्वेक्षण में यह बात स्पष्ट रूप से स्थापित हुई कि स्कूली बस्तों के भीतर केवल पाठ्यपुस्तकों का ही वजन 500 ग्राम से लेकर 3.5 किलोग्राम तक पहुंच जाता है। इसके अलावा बच्चों द्वारा रोजाना ले जाई जाने वाली कॉपियों या नोटबुक्स का वजन भी 200 ग्राम से लेकर 2.5 किलोग्राम के बीच पाया गया। यदि हम इन किताबों और कॉपियों के वजन के साथ-साथ छात्र के टिफिन बॉक्स, पीने के पानी की भारी बोतल और खुद खाली बैग के अपने बुनियादी वजन को भी जोड़ दें, तो कुल वजन बेहद चिंताजनक स्तर पर पहुंच जाता है। यह सामूहिक बोझ एक छोटे बच्चे की वहन क्षमता से कहीं अधिक हो जाता है।
स्कूल बैग की समस्या के पीछे के मुख्य कारण
इस पूरी परिस्थिति को केवल बस्ते या बैग की समस्या का नाम देना पूरी तरह से न्यायसंगत नहीं होगा। बस्ता तो अपने आप में केवल एक माध्यम या कंटेनर है, जिसमें सामान रखकर ले जाया जाता है। बस्ते के भारी होने के पीछे मुख्य रूप से स्कूल प्रबंधन और दैनिक स्तर पर लिए जाने वाले विभिन्न प्रशासनिक निर्णय जिम्मेदार होते हैं। उदाहरण के तौर पर, स्कूल में एक ही दिन के भीतर कितने अलग-अलग विषय पढ़ाए जाने हैं और उन विषयों के लिए कितनी अलग-अलग कॉपियों की आवश्यकता होगी, यह निर्णय बस्ते का बोझ तय करता है। इसके अतिरिक्त, क्या बच्चों को मुख्य पाठ्यपुस्तकों के साथ-साथ अन्य सहायक पुस्तकें भी लाने को कहा जा रहा है, क्या स्कूल परिसर में स्वच्छ और सुरक्षित पेयजल की समुचित व्यवस्था उपलब्ध है जिससे बच्चों को घर से पानी की भारी बोतलें न लानी पड़ें, और क्या बच्चों के लिए अपनी पुस्तकों को स्कूल में ही सुरक्षित रखने हेतु लॉकर या स्टोरेज की कोई व्यवस्था की गई है, ये सभी कारक मिलकर बस्ते का वजन तय करते हैं। वास्तव में देखा जाए तो बच्चे की पीठ पर लदा यह भारी बैग स्कूल के उस पूरे दिन की गतिविधियों का प्रतीक है, जिसे बेहद खराब और अव्यवहारिक ढंग से व्यवस्थित किया गया है।
बच्चों के शारीरिक स्वास्थ्य पर इसके नकारात्मक प्रभाव
इस गंभीर मसले पर विचार करते समय हमें बच्चों के शारीरिक स्वास्थ्य को सबसे प्रमुखता देनी होगी। हालांकि, हमें इस विषय को लेकर अनावश्यक रूप से अतिरंजनापूर्ण दावों या अतिवादी बयानों से भी बचना चाहिए कि इससे तुरंत बच्चों को कोई अत्यंत घातक या असाध्य बीमारियां हो जाएंगी। लेकिन इसके साथ ही इस बात में भी रत्ती भर का संदेह नहीं है कि भारी बस्ते बच्चों के लिए शारीरिक रूप से असहज और अत्यधिक कष्टदायक होते हैं। इस निरंतर बोझ के कारण बच्चों की कोमल मांसपेशियों में गंभीर खिंचाव पैदा हो सकता है, उनकी रीढ़ की हड्डी पर अनुचित दबाव पड़ सकता है और उनके उठने, बैठने और सामान्य रूप से चलने-फिरने के प्राकृतिक तरीके में भी अनचाहा बदलाव आ सकता है।
इस शारीरिक समस्या के संदर्भ में अमेरिकन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स द्वारा की गई महत्वपूर्ण अनुशंसाओं को समझना बेहद आवश्यक है। उनकी वैज्ञानिक अनुशंसा के अनुसार, किसी भी स्कूली बच्चे के बैग का कुल वजन उसके शरीर के कुल वजन के अधिकतम 15 प्रतिशत से अधिक कभी नहीं होना चाहिए। इसके साथ ही, उन्होंने इस बात पर विशेष बल दिया है कि स्कूल बैग हमेशा दो चौड़े स्ट्रैप्स वाले होने चाहिए और उनकी बनावट ऐसी होनी चाहिए जो बच्चे की पीठ पर वजन के सही संतुलन को समान रूप से बनाए रख सके।
इस अंतरराष्ट्रीय मानक के अनुरूप ही भारत की अपनी राष्ट्रीय नीति में भी इस बात को प्रमुखता से शामिल किया गया है। भारतीय नीति के अनुसार, स्कूल बैग अपने आप में बेहद हल्के होने चाहिए और उनकी शारीरिक बनावट पूरी तरह से आरामदेह होनी चाहिए। यह बिंदु व्यावहारिक स्तर पर बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि बस्ते का बोझ कम करने का अर्थ केवल कॉपियों और किताबों की संख्या को जबरन घटा देना भर नहीं है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना है कि बच्चा जिस बैग का उपयोग कर रहा है, उसकी डिजाइन इतनी वैज्ञानिक हो कि वह वजन को कंधे और पीठ पर समान रूप से वितरित कर सके।
कानूनी इतिहास और राष्ट्रीय नीति की यात्रा
भारत में स्कूल बैग के बढ़ते बोझ को नियंत्रित करने के कानूनी प्रयासों का इतिहास काफी लंबा और उतार-चढ़ाव से भरा रहा है। वर्ष 2006 में देश की संसद के उच्च सदन यानी राज्यसभा में एक महत्वपूर्ण प्राइवेट मेंबर बिल, जिसका शीर्षक चिल्ड्रन स्कूल बैग्स – लिमिटेशन ऑन वेट था, पेश किया गया था। इस ऐतिहासिक विधेयक में बच्चों के स्कूल बैग के अधिकतम वजन की कानूनी सीमा तय करने और इसके साथ ही सभी स्कूलों में अनिवार्य रूप से बच्चों की किताबों व कॉपियों के लिए सुरक्षित स्टोरेज की बुनियादी सुविधाएं प्रदान करने का ठोस प्रस्ताव रखा गया था। हालांकि, संसदीय प्रक्रियाओं के कारण अंततः यह विधेयक कानून का रूप नहीं ले सका और स्वतः ही लैप्स हो गया।
इस प्रयास के लगभग एक दशक बाद, मद्रास हाईकोर्ट ने बच्चों के हितों को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार को एक स्पष्ट निर्देश जारी किया, जिसमें एक सुदृढ़ और व्यापक राष्ट्रीय नीति बनाने की बात कही गई थी। इस न्यायिक आदेश के बाद सरकार द्वारा विषय विशेषज्ञों की एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया गया। इस विशेषज्ञ समिति की गहन अनुशंसाओं और रिपोर्ट के आधार पर आखिरकार शिक्षा मंत्रालय ने नवंबर 2020 में देश की पहली औपचारिक स्कूल बैग नीति जारी की। इस व्यापक नीति को व्यावहारिक रूप से जमीन पर लागू करने की पूरी जिम्मेदारी देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासनों को सौंपी गई थी। इस नीति में सुझाए गए उपाय और सिफारिशें बेहद व्यावहारिक और लागू करने योग्य हैं।
स्कूल बैग नीति 2020 के प्रमुख प्रावधान
नवंबर 2020 में जारी की गई स्कूल बैग नीति में बच्चों की उम्र और उनकी शारीरिक क्षमता को ध्यान में रखकर बेहद स्पष्ट दिशा-निर्देश तय किए गए हैं। इस नीति में कड़े शब्दों में यह व्यवस्था दी गई है कि प्री-प्राइमरी कक्षाओं में पढ़ने वाले नन्हे बच्चों के लिए किसी भी प्रकार के स्कूल बैग की व्यवस्था बिल्कुल नहीं होनी चाहिए। पहली कक्षा से ऊपर की कक्षाओं में अध्ययनरत विद्यार्थियों के लिए नीति में यह स्पष्ट सलाह दी गई है कि उनके स्कूल बैग का अधिकतम वजन उनके कुल शारीरिक वजन के लगभग 10 प्रतिशत की सीमा से अधिक कदापि नहीं होना चाहिए।
इस निर्धारित फॉर्मूले के अनुसार, यदि हम किसी बच्चे के सामान्य शारीरिक वजन को आधार मानें, तो कक्षा 1 और कक्षा 2 के विद्यार्थियों के लिए स्कूल बैग के वजन की संभावित और सुरक्षित सीमा लगभग 1.6 किलोग्राम से लेकर 2.2 किलोग्राम के बीच निर्धारित होती है। जैसे-जैसे बच्चे बड़ी कक्षाओं में प्रवेश करते हैं, यह सीमा उनकी उम्र और शारीरिक वजन के अनुपात में क्रमशः बढ़ती चली जाती है। इसके साथ ही, इस नीति के अंतर्गत स्कूलों से यह विशेष रूप से अपेक्षा की जाती है कि वे समय-समय पर छात्र-छात्राओं के बैग का वजन मापने की प्रक्रिया अपनाएं, कक्षा में मंगाई जाने वाली किताबों और कॉपियों की संख्या को पूरी तरह से तर्कसंगत बनाएं और अपनी दैनिक समय-सारणी को इस प्रकार लचीला व योजनाबद्ध तरीके से तैयार करें कि बच्चों को रोजाना स्कूल ले जाने वाली पठन सामग्री की मात्रा को न्यूनतम स्तर पर लाया जा सके।
विभिन्न राज्यों में नीति को लागू करने के सकारात्मक प्रयास
यद्यपि इस नीति का पूर्ण क्रियान्वयन अभी भी एक चुनौती बना हुआ है, लेकिन देश के कुछ राज्यों और क्षेत्रों से इस दिशा में अत्यंत उत्साहजनक और अनुकरणीय उदाहरण भी सामने आ रहे हैं। इसी क्रम में, पश्चिम बंगाल सरकार ने इसी वर्ष मई के महीने में नए और कड़े प्रशासनिक दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इन निर्देशों के तहत स्कूलों में बस्ते के वजन को बच्चों के शारीरिक वजन के 10 प्रतिशत तक कड़ाई से सीमित करने और सभी स्कूलों में अनिवार्य रूप से वजन मापने की मशीनें स्थापित करके तय वजन सीमा को प्रमुखता से प्रदर्शित करने को कहा गया है।
इस दिशा में चंडीगढ़ प्रशासन ने एक कदम और आगे बढ़कर बेहद सराहनीय कार्य किया है। चंडीगढ़ प्रशासन ने अपने क्षेत्र के सभी सरकारी, सहायता प्राप्त और निजी स्कूलों की औचक व नियमित तिमाही जांच के लिए एक विशेष 5 सदस्यीय निरीक्षण समिति का गठन किया है, जो स्कूलों में जाकर प्रत्यक्ष रूप से बस्तों के वजन की निगरानी करती है।
इस पूरे प्रशासनिक क्रियान्वयन के संबंध में महाराष्ट्र राज्य ने लगभग एक दशक पहले ही यह सफलतापूर्वक सिद्ध कर दिया था कि एक विशाल छात्र आबादी और हजारों स्कूलों के होने के बावजूद इस नीति की प्रभावी निगरानी पूरी तरह से संभव है। वर्ष 2016 में महाराष्ट्र सरकार ने बॉम्बे हाईकोर्ट को सौंपे गए अपने आधिकारिक विवरण में यह महत्वपूर्ण जानकारी दी थी कि राज्य के कुल 2,463 विशेष रूप से तैनात कर्मचारियों ने बेहद कम समय में कुल 17,235 स्कूलों का सघन निरीक्षण किया। इस विशाल अभियान के दौरान कुल 3,94,299 स्कूल बैगों की भौतिक रूप से जांच की गई थी। इस बड़े पैमाने पर की गई जांच में पाया गया कि राज्य में इस नीति का क्रियान्वयन स्तर 87.45 प्रतिशत तक सफल रहा था, जो कि प्रशासनिक प्रतिबद्धता का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
संदीप भूतोड़िया द्वारा उठाई गई राष्ट्रीय कानून की मांग
इस गंभीर विषय पर देश के प्रतिष्ठित सांस्कृतिक व सामाजिक कार्यकर्ता और प्रख्यात लेखक संदीप भूतोड़िया भी लगातार और सक्रिय रूप से अपनी आवाज उठा रहे हैं। उन्होंने इस दिशा में जमीनी स्तर पर कई महत्वपूर्ण पहल की हैं। अपने इसी अभियान के हिस्से के रूप में, उन्होंने हाल ही में देश के केंद्रीय शिक्षा राज्य मंत्री जयंत चौधरी को एक विस्तृत पत्र लिखा है। इस पत्र के माध्यम से संदीप भूतोड़िया ने केंद्रीय मंत्री से यह विशेष अनुरोध किया है कि इस वर्तमान स्कूल बैग नीति को केवल दिशा-निर्देशों तक सीमित न रखकर एक राष्ट्रव्यापी कानूनी स्वरूप या वैधानिक दर्जा प्रदान किया जाना चाहिए, ताकि देश के हर स्कूल के लिए इसका अनुपालन करना अनिवार्य हो जाए और हमारे देश के भविष्य यानी बच्चों को इस अवांछित भारी बोझ से हमेशा के लिए मुक्ति दिलाई जा सके।



















