गांवों और दूरदराज के इलाकों से शहरों में स्थित प्रसंस्करण संयंत्रों तक दूध ले जाना डेयरी उत्पादकों के लिए हमेशा से एक कठिन परीक्षा रहा है। जब किसान कच्चा दूध लेकर लंबी दूरी तय करते हैं, तो रास्ते की गर्मी और बढ़ते तापमान के कारण दूध के फटने या खट्टा होने की आशंका सबसे अधिक रहती है। कई मर्तबा गुणवत्ता मानकों पर खरा न उतरने के कारण डेयरी कंपनियां पूरा खेप स्वीकार करने से इनकार कर देती हैं, जिससे उत्पादकों को सीधा आर्थिक झटका लगता है। इस जमीनी संकट को हल करने के लिए जहानाबाद सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज के युवा छात्रों ने एक अनूठा तकनीकी मॉडल विकसित किया है। यह एक ऐसा मिल्क चिलिंग कंटेनर है, जो बिना किसी बाहरी बिजली आपूर्ति के दूध को लंबे समय तक ठंडा रखने की क्षमता रखता है।
स्मार्ट इंडिया हैकथॉन से मिली नवाचार की प्रेरणा
इस प्रोजेक्ट को कॉलेज के छात्र ऋतिक राज, सत्यम कुमार और उनके साथी साथियों की टीम ने तैयार किया है। नवाचार की दिशा में कदम बढ़ाने का यह विचार छात्रों के मन में स्मार्ट इंडिया हैकथॉन में हिस्सा लेने के दौरान आया था। प्रतियोगिता के दौरान टीम ने पाया कि साधारण धातु के बर्तनों में दूध भरकर जब उत्पादक लंबी दूरी की यात्रा करते हैं, तो समय बीतने के साथ पात्र के भीतर गर्मी बढ़ती है और दूध की प्राकृतिक गुणवत्ता बिगड़ने लगती है। इसी जमीनी हकीकत को ध्यान में रखते हुए टीम ने एक ऐसे सुरक्षित पात्र के निर्माण पर काम शुरू किया, जो रास्ते भर शीतलता बनाए रख सके।
पीसीएम तकनीक और परियोजना की रूपरेखा
छात्र दल ने अपने इस समग्र नवाचार का नाम 'डेयरी टेक' रखा है। छात्र सत्यम कुमार के अनुसार, इस केन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे काम करने के लिए किसी पावर सॉकेट या बैटरी की जरूरत नहीं पड़ती। इसमें तापमान नियंत्रण के लिए पीसीएम यानी फेज चेंज मटीरियल (Phase Change Material) तकनीक का उपयोग करने की योजना बनाई गई है। यह विशेष सामग्री आसपास की ऊष्मा को सोखकर पात्र के भीतरी हिस्से को ठंडा बनाए रखती है। इस थर्मल संतुलन की मदद से कंटेनर में रखा दूध तय तापमान सीमा के भीतर बना रहता है और कंपनी के संकलन केंद्र तक सुरक्षित पहुंच सकता है।
बाजार मूल्य और साधारण केन से तुलना
परियोजना से जुड़े छात्रों का आकलन है कि वर्तमान में किसान जिन साधारण डिब्बों का उपयोग करते हैं, उनका बाजार मूल्य लगभग ₹8 हजार तक होता है। हालांकि, उन पारंपरिक डिब्बों में शीतलन या तापमान थामे रखने की कोई आंतरिक व्यवस्था नहीं होती। इसके विपरीत, छात्रों की टीम ने अपने तकनीकी रूप से उन्नत मिल्क चिलिंग केन को करीब ₹12 हजार की लागत सीमा में बाजार में उतारने का लक्ष्य तय किया है। छात्रों का मानना है कि थोड़ा सा अंतर होने के बावजूद यह उत्पाद किसानों को रोजाना होने वाले हजारों रुपये के दूध बर्बादी के नुकसान से सुरक्षित रखेगा।
छोटे डेयरी उत्पादकों के लिए नया संबल
इस उपकरण का प्राथमिक लक्ष्य परिवहन श्रृंखला में होने वाले दूध के नुकसान को न्यूनतम स्तर पर लाना है। खासतौर पर वे किसान और दुग्ध संग्रहकर्ता, जो गांवों से दूध इकट्ठा करके सुदूर स्थित बड़ी कंपनियों के प्रोसेसिंग प्लांट तक ले जाते हैं, उनके लिए यह व्यवस्था एक मजबूत ढाल साबित हो सकती है। बिना बिजली दूध को ठंडा रखने की यह व्यवस्था न केवल उत्पादकों का आत्मविश्वास बढ़ाएगी, बल्कि ग्रामीण इलाकों में तकनीकी समाधानों की व्यावहारिक उपयोगिता को भी नई पहचान देगी।



















