देश में बीते दिनों जिस तरह नीट परीक्षा का पेपर लीक हुआ और CBSE के ऑन-स्क्रीन मार्किंग सिस्टम में खामियां सामने आईं, उसने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या हमारे डिजिटल सिस्टम वाकई सुरक्षित हैं? जैसे-जैसे पढ़ाई, परीक्षा और रोजमर्रा के काम ऑनलाइन होते जा रहे हैं, वैसे-वैसे साइबर हमलों का जोखिम भी बढ़ता जा रहा है। इसी चुनौती का जवाब देने के लिए IIT कानपुर ने एक नई पहल की है—साइबर सुरक्षा पर केंद्रित 4 साल का एक विशेष कोर्स, जिसमें दाखिले का तरीका भी बाकी संस्थानों से बिल्कुल अलग रखा गया है।
परीक्षा की जगह हैकाथॉन से चुने जाएंगे छात्र
इस कोर्स की सबसे खास बात इसका प्रवेश तरीका है। यहां छात्रों को किसी पारंपरिक प्रवेश परीक्षा के नंबरों के आधार पर नहीं, बल्कि एक हैकाथॉन में उनके प्रदर्शन के आधार पर चुना जाएगा। रिपोर्ट्स के अनुसार, इस हैकाथॉन में छात्रों के सामने ऐसे काम रखे जाएंगे जिनमें उन्हें किसी साइबर सिस्टम की कमजोरियों को पहचानना और उन्हें चुनौती देना होगा। जो छात्र इस इम्तिहान में खरे उतरेंगे, उन्हें ही IIT कानपुर में दाखिला मिलेगा। यानी यहां रट्टा मारने वाले नहीं, बल्कि असल में सिस्टम की कमजोरियां ढूंढ निकालने वाले दिमाग की कद्र होगी।
दो हिस्सों में बंटी है पूरी पढ़ाई
कोर्स का पूरा ढांचा दो हिस्सों में बांटा गया है। शुरुआती 2 साल में छात्रों को साइबर सुरक्षा की बुनियादी और गहरी पढ़ाई कराई जाएगी, और उन्हें असल जिंदगी में सामने आने वाली साइबर समस्याओं से रूबरू कराया जाएगा। किताबी ज्ञान के साथ-साथ इस दौरान उन्हें प्रैक्टिकल ट्रेनिंग भी दी जाएगी ताकि वे सिर्फ सिद्धांत न पढ़ें बल्कि उसे करके भी देखें। इसके बाद के अगले 2 साल पूरी तरह व्यावहारिक अनुभव पर केंद्रित होंगे—इस दौरान छात्रों को नेशनल सिक्योरिटी से जुड़े कामों में हाथ आजमाने का मौका मिलेगा, जहां वे असली साइबर खतरों से निपटना सीखेंगे और साथ ही उनसे बचाव के नए तरीके भी ईजाद करेंगे।
क्यों शुरू किया गया यह कोर्स
IIT कानपुर के डायरेक्टर मणींद्र अग्रवाल इस कदम के पीछे की सोच को साफ करते हैं। उनके मुताबिक, आज लगभग हर काम ऑनलाइन हो चुका है और इसी के साथ साइबर हमले भी आम बात बन गए हैं। ऐसे माहौल में देश को बड़ी तादाद में साइबर विशेषज्ञों और एथिकल हैकर्स की जरूरत है, और इसी कमी को पूरा करने के मकसद से यह नया कोर्स शुरू किया गया है।
निसर्ग अधिकारी की मिसाल
इसी कड़ी में एक दिलचस्प मामला भी सामने आया है। CBSE के ऑन-स्क्रीन मार्किंग सिस्टम की खामी को उजागर करने वाले छात्र निसर्ग अधिकारी को IIT कानपुर के साइबर सिक्योरिटी इनोवेशन सेंटर में नौकरी दी गई है। इसे साइबर सुरक्षा के क्षेत्र में असली प्रतिभा को पहचानने और उसे आगे बढ़ाने की एक बड़ी मिसाल के तौर पर देखा जा रहा है—जहां डिग्री से ज्यादा हुनर को अहमियत मिल रही है।
इस मुहिम में अकेला नहीं है IIT कानपुर
साइबर सुरक्षा और डिजिटल फॉरेंसिक के मोर्चे पर देश में IIT कानपुर अकेला काम नहीं कर रहा। नेशनल फॉरेंसिक साइंसेज यूनिवर्सिटी भी इस दिशा में अहम भूमिका निभा रही है। यहां साइबर अपराधों की जांच, डिजिटल सबूतों को पहचानने और आधुनिक तकनीकों पर लगातार काम होता है। इस संस्थान में पुलिसकर्मियों, सरकारी अधिकारियों और सुरक्षा विशेषज्ञों को प्रशिक्षण दिया जाता है। इसका दायरा सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है—यहां लगभग 70 देशों से लोग प्रशिक्षण लेने पहुंचते हैं। इसका मकसद साइबर सुरक्षा के माहिर तैयार करना और इस क्षेत्र में शोध को इतना मजबूत बनाना है कि आने वाले वक्त की साइबर चुनौतियों का बेहतर ढंग से सामना किया जा सके।













