तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री और डीएमके प्रमुख एमके स्टालिन ने राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट) को लेकर केंद्र सरकार की तीखी आलोचना की है। उनका स्पष्ट मानना है कि यह मेडिकल प्रवेश परीक्षा अपने बुनियादी उद्देश्यों को हासिल करने में पूरी तरह से विफल रही है और अब इसमें सिर्फ सतही सुधार करने के बजाय इसे पूरी तरह से रद्द कर दिया जाना चाहिए। केंद्र सरकार की शैक्षिक नीतियों पर कड़ा प्रहार करते हुए उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि वर्तमान परिस्थितियां इस बात का स्पष्ट संकेत दे रही हैं कि इस विवादास्पद परीक्षा व्यवस्था को हमेशा के लिए समाप्त करने का यही सबसे सही वक्त है।
बुनियादी लक्ष्यों और उद्देश्यों में पूरी तरह विफलता
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अपना कड़ा रुख स्पष्ट करते हुए, डीएमके नेता ने विस्तार से बताया कि जिन लक्ष्यों को ध्यान में रखकर यह राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा शुरू की गई थी, वह हर एक मोर्चे पर कैसे नाकाम साबित हुई है। मेडिकल टेस्ट की इस केंद्रीय व्यवस्था को पूरे देश में एक समान मानक स्थापित करने के लिए लाया गया था, लेकिन इसने छात्रों के ऊपर मौजूद भारी दबाव को कम करने के बजाय उनकी मुश्किलें और अधिक बढ़ा दी हैं। इसके साथ ही, मेडिकल शिक्षा के क्षेत्र में तेजी से हो रहे व्यवसायीकरण और मुनाफे की होड़ को रोकने में भी यह कदम बिल्कुल बेअसर साबित हुआ है। स्टालिन ने इस बात पर भी प्रकाश डाला कि इस अखिल भारतीय परीक्षा के लागू होने से उम्मीदवारों को मिलने वाली शिक्षा की समग्र गुणवत्ता में कोई भी वास्तविक या जमीनी सुधार देखने को नहीं मिला है।
प्राइवेट कोचिंग का दबदबा और परिवारों पर भारी आर्थिक बोझ
पूर्व मुख्यमंत्री ने शिक्षा के बदलते स्वरूप पर ध्यान दिलाते हुए कहा कि इस परीक्षा प्रणाली का एक सबसे बड़ा और चिंताजनक परिणाम यह हुआ है कि पढ़ाई का मुख्य केंद्र अब स्कूल नहीं रह गए हैं। पारंपरिक स्कूली शिक्षा से ध्यान पूरी तरह भटक कर अब प्राइवेट कोचिंग संस्थानों के महंगे और बड़े कारोबार की तरफ चला गया है। इस भारी ढांचागत बदलाव के कारण मेडिकल कॉलेजों में दाखिले का सपना देख रहे छात्रों और उनके परिवारों पर आर्थिक तथा मानसिक तनाव बहुत ज्यादा बढ़ गया है। इन विशेष कक्षाओं की फीस चुकाने के लिए परिवारों को अपनी जीवन भर की जमापूंजी खर्च करनी पड़ रही है। उन्होंने तर्क दिया कि इस प्रवेश परीक्षा से जुड़ी उलझनें सिर्फ इसकी संचालन प्रक्रिया तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इसकी पूरी व्यवस्था और ढांचे के अंदर ही गहरी कमियां मौजूद हैं। उनका कहना था कि हाल ही में सामने आई घटनाओं ने इस बात को पूरी तरह से साबित कर दिया है कि तमिलनाडु राज्य पिछले कई वर्षों से जो गंभीर चिंताएं जता रहा था, वे बिल्कुल सही और तर्कसंगत थीं।
छात्रों का राष्ट्रव्यापी प्रदर्शन केंद्र सरकार के लिए एक सख्त चेतावनी
छात्रों द्वारा लगातार किए जा रहे मौजूदा विरोध प्रदर्शनों को केंद्र सरकार के लिए एक स्पष्ट और सख्त चेतावनी करार देते हुए, स्टालिन ने यह मांग की कि संघीय सरकार को अब अपने राज्यों के शैक्षिक अधिकारों पर भरोसा करना चाहिए और इस परीक्षा को तुरंत प्रभाव से खत्म कर देना चाहिए। उनकी यह कड़ी टिप्पणी ठीक एक दिन बाद आई है, जब उन्होंने नई दिल्ली स्थित जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे हजारों छात्रों के आंदोलन को अपना खुला समर्थन दिया था। ये छात्र परीक्षा में बड़े पैमाने पर हुई कथित धांधली और पेपर लीक जैसे गंभीर आरोपों के बाद इसमें व्यापक सुधार और अंततः इसे रद्द करने की पुरजोर मांग कर रहे हैं। आंदोलनकारी छात्रों के साथ अपनी पूरी एकजुटता दिखाते हुए, उन्होंने केंद्र सरकार को याद दिलाया कि तमिलनाडु ने शुरुआत में ही यह चेतावनी दे दी थी कि एक केंद्रीय मेडिकल परीक्षा निश्चित रूप से भविष्य में बड़े पैमाने पर अनियमितताओं का रास्ता खोलेगी और मेडिकल शिक्षा के क्षेत्र में सभी को समान अवसर देने के सिद्धांत को पूरी तरह से खत्म कर देगी।
सामाजिक न्याय की रक्षा और डीएमके का ऐतिहासिक रुख
एकल और केंद्रीय परीक्षा मॉडल का कड़ा विरोध करना कोई नई बात नहीं है, बल्कि यह उनकी पार्टी की शुरुआत से ही एक स्थायी और ऐतिहासिक नीति रही है। स्टालिन ने स्पष्ट किया कि डीएमके इस परीक्षा का इसलिए इतनी दृढ़ता से विरोध करती है क्योंकि यह सामाजिक न्याय की मूल अवधारणा और भावना को ही जड़ से कमजोर कर देती है। उन्होंने बताया कि परीक्षा का यह अत्यधिक मानकीकृत ढांचा ग्रामीण और पिछड़े इलाकों से आने वाले, कम सुविधाओं वाले सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के छात्रों के साथ सीधा और स्पष्ट अन्याय करता है। देश भर में हो रहे विरोध प्रदर्शनों का जिक्र करते हुए उन्होंने इस बात पर भारी जोर दिया कि इन आंदोलनों का मुख्य लक्ष्य केवल परीक्षा आयोजित करने की प्रक्रिया में पारदर्शिता या सुधार की मांग करना नहीं होना चाहिए, बल्कि इसे पूरी तरह से जड़ से समाप्त करवाना होना चाहिए। उन्होंने तर्क दिया कि केवल प्रक्रिया में छोटे-मोटे बदलाव कर देने से समस्या का समाधान कभी नहीं होगा। इस बात को मजबूती से दोहराते हुए कि तमिलनाडु अपने लंबे समय से चले आ रहे सैद्धांतिक रुख पर आज भी कायम है, उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि देश भर में परीक्षा प्रणाली की लगातार बिगड़ती विश्वसनीयता को देखते हुए, इसे पूरी तरह से रद्द करना ही एकमात्र सही समाधान है।




















