मेडिकल एंट्रेंस एग्जाम की तैयारी के लिए अब तक कोटा को ही सबसे भरोसेमंद ठिकाना माना जाता रहा है, लेकिन NEET UG 2026 (री-एग्जाम) के नतीजों ने यह तस्वीर बदलनी शुरू कर दी है. उत्तर प्रदेश के कानपुर में स्थित काकादेव इलाका अब मेडिकल कोचिंग के नक्शे पर तेजी से उभर रहा है. इस बदलाव ने यह सवाल भी खड़ा कर दिया है कि देश के आने वाले डॉक्टर आखिर किस माहौल में तैयार हो रहे हैं. शिक्षा जगत से जुड़े लोगों का कहना है कि इसके पीछे छोटी क्लास, हर छात्र पर निजी नजर और कम फीस में अच्छी तैयारी जैसी वजहें हैं. साथ ही हिंदी माध्यम से परीक्षा देने वाले सफल छात्रों की तादाद में भी पिछले सालों के मुकाबले 20 से 25 फीसदी तक की बढ़त दर्ज हुई है.
भीड़भरी क्लास नहीं, छोटा बैच बना संबल
कानपुर के एक निजी कोचिंग संस्थान में सहायक निदेशक के पद पर काम कर रहे आशीष सिंह के मुताबिक, कोई भी प्रतियोगी परीक्षा एक दिन या महीने भर की मेहनत से नहीं निकलती. इसके लिए कम से कम दो साल तक लगातार पढ़ाई, सही रणनीति और रोज के अभ्यास के बिना कामयाबी मुमकिन नहीं है. उन्होंने बताया कि कोटा के कई बड़े संस्थानों में एक ही क्लास में करीब 150 छात्र तक बैठाए जाते हैं, जिस वजह से टीचर के लिए हर बच्चे पर अलग से ध्यान देना आसान नहीं रहता. इसके उलट काकादेव के ज्यादातर सेंटरों ने बैच का आकार जानबूझकर छोटा रखा है, जहां फैकल्टी हर छात्र की पढ़ाई, उसकी कमजोर कड़ियों और आगे की प्रोग्रेस को बारीकी से फॉलो करती है. इसी वजह से सिलेबस समय पर खत्म हो जाता है और परीक्षा से पहले तैयारी की नींव भी मजबूत बनती है, बजाय इसके कि आखिरी महीनों में जल्दबाजी में पूरा कोर्स निपटाया जाए.
भाषा रोड़ा नहीं, मेहनत ही असली कसौटी
री-एग्जाम के नतीजे आने के बाद हिंदी माध्यम के छात्रों के प्रदर्शन को लेकर भी इस बार खूब चर्चा हो रही है. आशीष सिंह इस पर कहते हैं कि किसी भी कॉम्पिटिटिव एग्जाम में सफलता का ताल्लुक भाषा से नहीं, बल्कि छात्र की मेहनत और समझ से होता है. साथ ही उन्होंने यह भी जोड़ा कि पिछले वर्षों की तुलना में इस बार हिंदी माध्यम से परीक्षा देकर सफल होने वाले छात्रों का आंकड़ा करीब 20 से 25 फीसदी तक ऊपर गया है. इसे इस बात के सबूत के तौर पर देखा जा रहा है कि हिंदी माध्यम के छात्र भी अब राष्ट्रीय स्तर की मेडिकल परीक्षाओं में अंग्रेजी माध्यम के छात्रों के बराबर दमदार प्रदर्शन कर रहे हैं.
IIT-JEE की पुरानी पहचान अब NEET तक फैली
एक दौर था जब काकादेव सिर्फ IIT-JEE की तैयारी के लिए मशहूर था, मगर बीते कुछ बरसों में यही इलाका NEET की तैयारी का भी बड़ा अड्डा बन गया है, और अब यहां कानपुर शहर से कहीं दूर-दूर के जिलों से भी छात्र पहुंचने लगे हैं. यहां सिर्फ कानपुर ही नहीं बल्कि कानपुर देहात, कन्नौज, फर्रुखाबाद, इटावा, औरैया, जालौन, झांसी, बांदा, चित्रकूट और फतेहपुर जैसे कई जिलों से छात्र पढ़ने पहुंचते हैं, जो खुद बताता है कि काकादेव का दायरा कितनी दूर तक फैल चुका है. कोचिंग चलाने वालों का कहना है कि यहां छात्रों को पढ़ाई के साथ-साथ रहने खाने की सुविधाएं भी कम बजट में मिल जाती हैं, यही वजह है कि हर गुजरते साल के साथ काकादेव में मेडिकल की तैयारी करने वाले छात्रों की तादाद बढ़ती जा रही है.
कोटा के मुकाबले आधे से भी कम खर्च
जानकारों की मानें तो कोटा में मेडिकल एंट्रेंस की तैयारी पर एक छात्र का सालाना खर्च, कोचिंग फीस से लेकर हॉस्टल तक जोड़ने पर, ढाई से तीन लाख रुपये तक पहुंच जाता है, जबकि काकादेव में इतनी ही अच्छी तैयारी 50 हजार से 80 हजार रुपये के बीच ही करवाई जा रही है, यानी लागत आधे से भी काफी कम. छोटे बैच, निजी मार्गदर्शन, कम फीस और लगातार अच्छे नतीजों ने काकादेव को उत्तर भारत के अहम मेडिकल कोचिंग सेंटर के तौर पर नई पहचान दी है. शिक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक NEET UG 2026 (री-एग्जाम) के नतीजे साफ इशारा कर रहे हैं कि कॉम्पिटिटिव एग्जाम में कामयाबी का रास्ता अब सिर्फ बड़े शहरों और खचाखच भरी क्लासों से होकर नहीं गुजरता, बल्कि अच्छे पढ़ाई के माहौल, छोटे बैच, निजी गाइडेंस और लगातार मेहनत से तय होता है, यही वजह है कि काकादेव अब कोटा के मजबूत और किफायती ऑप्शन के तौर पर तेजी से आगे बढ़ रहा है.




















