तेजी से बदलती इस डिजिटल दुनिया में हर गुजरते पल के साथ नई जानकारी हमारे सामने आ रही है। एक टैब से दूसरे टैब पर कूदना या सोशल मीडिया पर रील्स स्क्रॉल करना आज की जीवनशैली का हिस्सा बन चुका है। हमें ऐसा महसूस होता है कि हम बेहद उत्पादक कार्य कर रहे हैं, लेकिन वास्तव में हमारे मस्तिष्क को उस प्रचुर डेटा को प्रोसेस करके संग्रहित करने का पर्याप्त अवसर ही नहीं मिल पाता है। बार-बार आने वाले नोटिफिकेशन्स और डिजिटल भटकाव के कारण मनुष्य की एकाग्रता लगातार घटती जा रही है।
लर्निंग और मेमोरी पर लंबे समय से शोध कर रही हारवर्ड समर स्कूल की न्यूरोसाइंस प्रोफेसर ट्रेसी टोकुहामा-एस्पिनोसा का कहना है कि शैक्षणिक सफलता का संबंध किताबों के साथ केवल लंबे समय तक बैठे रहने से नहीं है। असली महत्वपूर्ण बात यह है कि आप किस तरीके से अध्ययन कर रहे हैं। यानी पूरा ध्यान इस बात पर होना चाहिए कि हम सीखने की प्रक्रिया को कैसे अंजाम दे रहे हैं, न कि इस बात पर कि हमने कितने घंटे पुस्तकें खुली रखीं।
प्रोफेसर ट्रेसी के अनुसार सीखने की पूरी प्रक्रिया को मुख्य रूप से दो भागों में विभाजित किया जा सकता है। पहला चरण यह तय करता है कि आप किसी नई जानकारी को अपने लिए कितना सार्थक बनाते हैं और उसे मस्तिष्क के भीतर किस प्रकार समाहित करते हैं। दूसरा चरण इस बात से जुड़ा है कि आवश्यकता पड़ने पर आप उस जानकारी को किसी नए संदर्भ में बाहर कैसे निकालते हैं। उनका यह भी मानना है कि पढ़ाई का वास्तविक पैमाना यही है कि आप सीखी हुई बातों को कक्षा की चार दीवारों से बाहर निकालकर वास्तविक जीवन में कहां और किस तरह उपयोग कर पा रहे हैं।
डिजिटल युग के इस भटकाव और भूलने की प्रवृत्ति से निपटने के लिए हारवर्ड यूनिवर्सिटी ने पांच ऐसे वैज्ञानिक तरीके सुझाए हैं जो स्मरण शक्ति को अत्यधिक मजबूत बना सकते हैं। इनमें से सबसे पहला और सबसे अधिक प्रभावी तरीका स्पेस्ड रिपीटेशन यानी समयांतर पर पुनरावृत्ति है। इसका अर्थ यह होता है कि एक ही पृष्ठ को लगातार पांच बार पढ़ने के बजाय, उस सामग्री को अलग-अलग समयान्तरालों पर दोबारा देखा जाए। हर बार जब आप अंतराल के बाद रिवीजन करते हैं, तो मस्तिष्क के न्यूरल पाथवे मजबूत होते जाते हैं और सूचनाएं लंबे समय तक सुरक्षित रहती हैं।
दूसरा महत्वपूर्ण तरीका खुद का परीक्षण करना यानी खुद का टेस्ट लेना है। केवल पैराग्राफ दर पैराग्राफ रटने की आदत डालने के बजाय छोटे-छोटे क्विज़ लें, स्वयं से कठिन प्रश्न पूछें या फिर अपना खुद का टेस्ट पेपर तैयार करें। ऐसा करने से मस्तिष्क पर सकारात्मक दबाव पड़ता है और वह डेटा को रीकॉल करने यानी ढूंढने की दिशा में प्रशिक्षित होता है। परीक्षा के किसी भी बाहरी दबाव के बिना की जाने वाली यह छोटी सी अभ्यास प्रक्रिया याददाश्त को बहुत तेजी से पुख्ता करती है।
स्मरण शक्ति को धार देने का तीसरा और सबसे अचूक तरीका दूसरों को पढ़ाना या सिखाना है। यदि आप किसी पेचीदा कॉन्सेप्ट को अपनी सरल भाषा में किसी अन्य व्यक्ति को समझाने में सफल हो जाते हैं, तो यह मान लेना चाहिए कि वह विषय आपको पूरी तरह से समझ आ चुका है। आप चाहें तो अपने किसी सहपाठी को पढ़ा सकते हैं या फिर अपने कमरे में अकेले रहकर जोर-जोर से बोलकर उसका रिवीजन कर सकते हैं। जब हम किसी को पढ़ाते हैं, तो हमारा मस्तिष्क विचारों को बेहद स्पष्ट रूप से व्यवस्थित करता है, जिससे वह ज्ञान हमेशा के लिए मानस पटल पर अंकित हो जाता है।
चौथा नियम स्मार्ट तरीके से नोट्स तैयार करना है। पारंपरिक रूप से किताबों की पंक्तियों को ज्यों का त्यों उतारने के बजाय माइंड मैपिंग, आउटलाइन्स या कॉरनेल नोट्स जैसी आधुनिक तकनीकों का उपयोग करना चाहिए। आपके नोट्स ऐसे होने चाहिए जो आपके दिमाग को अलग-अलग तर्कों और तथ्यों के बीच आपसी संबंध खोजने में मदद कर सकें। पांचवां और अंतिम नियम फीडबैक को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाना है। अपनी गलतियों से डरने या संकोच करने के बजाय इस बात का विश्लेषण करें कि चूक कहां हुई और अगली बार अपनी रणनीति में आवश्यक बदलाव करें।
अंत में हारवर्ड का यह स्पष्ट दृष्टिकोण है कि सीखने का कोई एक निश्चित तरीका हर व्यक्ति के लिए समान रूप से सही नहीं हो सकता है। किसी को पूर्ण शांति पसंद होती है, तो कोई व्यक्ति चलते-फिरते या थोड़े बहुत शोर-शराब के माहौल के बीच भी बेहतर ढंग से एकाग्र हो पाता है। इसलिए सबसे बड़ी आवश्यकता स्वयं को गहराई से समझने की है। एआई के इस अति-आधुनिक दौर में, जहां हर प्रकार की जानकारी एक क्लिक की दूरी पर उपलब्ध है, अपनी व्यक्तिगत क्षमता और सीखने के सही तौर-तरीकों को पहचानना ही आज का सबसे बड़ा कौशल बन चुका है।



















