महिला स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं में ओवेरियन सिस्ट इन दिनों काफी चर्चा में रहती है। यह स्थिति तब बनती है जब अंडाशय के भीतर तरल पदार्थ से भरी छोटी या बड़ी थैली विकसित हो जाती है। चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, 15 से 45 वर्ष की आयु वर्ग की महिलाओं में यह परेशानी सबसे ज्यादा देखने को मिलती है। हालांकि अधिकांश सिस्ट नुकसानदायक नहीं होते और समय के साथ खुद ही समाप्त हो जाते हैं, लेकिन इनके प्रकार, लक्षणों और प्राकृतिक उपचार के तौर-तरीकों को समझना बेहद जरूरी है ताकि वक्त रहते सही कदम उठाए जा सकें।
ओवेरियन सिस्ट बनने के मुख्य कारण
आशा आयुर्वेद क्लीनिक की डॉक्टर चंचल शर्मा बताती हैं कि हर महीने महिला के शरीर में एक अंडा विकसित होता है और ओव्यूलेशन की प्रक्रिया के तहत बाहर आता है। यह पूरी कार्यप्रणाली हार्मोनल संतुलन पर टिकी होती है। यदि किसी वजह से अंडा ओवरी से बाहर नहीं आ पाता या फॉलिकल सैक बंद नहीं हो पाता है, तो उसमें तरल इकट्ठा होने लगता है। यही तरल पदार्थ धीरे-धीरे बढ़कर गांठ का रूप ले लेता है जिसे सिस्ट कहा जाता है।
प्रमुख प्रकार की ओवेरियन सिस्ट
सिस्ट के कई अलग-अलग प्रकार होते हैं जो शरीर में अलग तरह से विकसित होते हैं। फंक्शनल सिस्ट में फॉलिक्युलर और कॉर्पस ल्यूटियम शामिल हैं जो हार्मोन से जुड़े होते हैं और अमूमन ओव्यूलेशन के दौरान बनते हैं। डर्मॉइड सिस्ट को मैच्योर सिस्टिक टेराटोमा भी कहा जाता है जिसमें बाल, त्वचा या दांत जैसे एक्टोडर्मल टिश्यू पाए जा सकते हैं। एंडोमेट्रियोमा ओवेरियन सिस्ट तब बनते हैं जब एंडोमेट्रियोसिस से जुड़े टिश्यू जमा होने लगते हैं। सिस्टाडेनोमा ओवरी की सतह के एपिथेलियम से बनते हैं और इनमें म्यूसिनस या सीरस फ्लूइड भरा हो सकता है। इसके अलावा पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम से पीड़ित महिलाओं में कई छोटे फॉलिकल्स नजर आते हैं जिनमें ओव्यूलेशन की प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाती है।
पहचानने के लिए प्रमुख और गुप्त लक्षण
ओवरी सिस्ट के कई तरह के संकेत हो सकते हैं जिन्हें समय पर पहचानना जरूरी है। सामान्य लक्षणों में पेल्विक एरिया में दर्द रहना, पेट फूलना, पीरियड्स का अनियमित होना, संबंध बनाते समय तकलीफ होना और बार-बार पेशाब जाने की इच्छा होना शामिल है। वहीं गंभीर स्थितियों में अचानक तेज पेल्विक दर्द होना सिस्ट फटने का संकेत हो सकता है। इसके अलावा पेट में तीव्र दर्द के साथ उल्टी या जी मिचलाना ओवेरियन टॉर्शन का लक्षण हो सकता है, जिससे कई बार चक्कर आना या बेहोशी भी आ सकती है। कुछ गुप्त लक्षणों में थकान बने रहना, पाचन से जुड़ी दिक्कतें और स्तनों में कोमलता या दर्द महसूस होना भी शामिल है।
पंचकर्म चिकित्सा और प्राकृतिक उपचार
आयुर्वेद में इस समस्या के समाधान के लिए पंचकर्म चिकित्सा को काफी असरदार माना गया है जो पांच प्रमुख क्रियाओं पर आधारित है। वमन क्रिया के तहत उल्टी की पद्धति के जरिए शरीर से विषाक्त पदार्थों को बाहर निकाला जाता है, जिससे शरीर सक्रिय होता है और अस्थमा जैसी शिकायतों में भी राहत मिलती है। विरेचन प्रक्रिया में जड़ी-बूटियों से बनी औषधियों के माध्यम से मल के रास्ते शरीर के दूषित तत्वों को बाहर किया जाता है। नस्यम प्रक्रिया में नाक के जरिए आयुर्वेदिक ड्रॉप्स डाली जाती हैं जिससे मस्तिष्क के दूषित पदार्थ बाहर आते हैं, जो डिप्रेशन और उससे जुड़े अंडाशय विकारों में काफी फायदेमंद साबित होती है। रक्तमोक्षन प्रक्रिया के द्वारा शरीर के खराब खून को साफ किया जाता है जिससे रक्त संचार बेहतर होता है और नई कोशिकाओं का निर्माण होता है।
बस्ती और योग का महत्व
पंचकर्म के अलावा अनुवासन बस्ती भी एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है जिसमें रोगी को पौष्टिक आहार दिया जाता है। इससे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है और ऊर्जा का स्तर बढ़ता है, क्योंकि कई बार सिस्ट की शुरुआत गलत खानपान से ही होती है। इसके साथ ही, योग क्रियाओं के नियमित अभ्यास से भी अंडाशय की गांठ का सफलतापूर्वक इलाज किया जा सकता है, बशर्ते इसे किसी कुशल विशेषज्ञ की निगरानी में किया जाए। सही तरीके से योग करने पर तीन से चार महीनों के भीतर सकारात्मक परिणाम सामने आने लगते हैं।
घरेलू नुस्खे और खानपान में बदलाव
आयुर्वेदिक दृष्टिकोण से कुछ घरेलू उपायों को अपनाकर भी इस परेशानी में आराम पाया जा सकता है। डाइट में दही को शामिल करने से पेट से जुड़ी तमाम समस्याओं में राहत मिलती है। इसके अलावा अदरक का सेवन करने से सूजन कम होती है और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता का विकास होता है, जिससे सिस्ट को घटाने में काफी सहायता मिलती है।

















