सिनेमा के पर्दे पर दिखाई जाने वाली आक्रामकता और असल जिंदगी के अपराधों के आपसी संबंध को लेकर एक बार फिर सार्वजनिक बहस छिड़ गई है। आंध्र प्रदेश के एक विद्यालय में हुई हिंसक वारदात के बाद सोशल मीडिया मंचों पर फिल्मों के प्रभाव को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। इसी बीच फिल्म निर्देशक राम गोपाल वर्मा ने इस पूरे विमर्श पर अपनी बात रखी है और सिनेमा को समाज में होने वाले अपराधों के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराने की प्रवृत्ति का विरोध किया है। उन्होंने रविवार को अपने सोशल मीडिया हैंडल पर विचार साझा करते हुए कहा कि उग्र दृश्यों वाली फिल्मों के खिलाफ उभरने वाला जनआक्रोश अक्सर गलत दिशा में निर्देशित होता है।
अनंतपुर के विद्यालय में खौफनाक वारदात
इस पूरे विवाद की पृष्ठभूमि में आंध्र प्रदेश के अनंतपुर जिले के रापताडु स्थित एक स्कूल की स्तब्ध करने वाली घटना है। विद्यालय परिसर में दसवीं कक्षा के कमरे के भीतर हेमंत नाम के 21 वर्षीय युवक ने अचानक प्रवेश किया और 15 वर्ष की एक छात्रा पर आरी से हमला बोल दिया। कक्षा में मौजूद अन्य विद्यार्थियों के सामने अचानक हुए इस हमले से अफरा-तफरी मच गई। इस दौरान अपनी सहपाठी को बचाने के लिए आगे आई लक्ष्मी नाम की एक अन्य छात्रा भी हमले की चपेट में आकर जख्मी हो गई।
घटना की सूचना मिलते ही पुलिस ने मामले की पड़ताल शुरू की। प्राथमिक जांच के अनुसार आरोपी युवक लंबे समय से पीड़िता का पीछा कर रहा था। जब छात्रा ने उसके प्रस्तावों को स्वीकार करने से मना कर दिया, तो उसने इस हिंसक वारदात को अंजाम दिया। घायल छात्रा को तत्काल चिकित्सीय सहायता उपलब्ध कराई गई और उसे बेंगलुरु के मणिपाल अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उसका उपचार चल रहा है और डॉक्टरों ने उसकी स्थिति स्थिर बताई है। पुलिस ने कार्रवाई करते हुए आरोपी को धर्मावरम क्षेत्र से हिरासत में ले लिया है।
फिल्मों में दिखाए जाने वाले दृश्यों पर उठे सवाल
स्कूल में घटी इस घटना के बाद इंटरनेट पर कई लोगों ने निर्देशक संदीप रेड्डी वांगा और उनकी चर्चित फिल्म 'एनिमल' को लेकर सवाल उठाने शुरू कर दिए। सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं ने इस बात की ओर ध्यान दिलाया कि फिल्म में अभिनेता रणबीर कपूर का किरदार हाथ में हथियार लेकर सीधे एक स्कूल के क्लासरूम में घुसता है। आलोचकों का तर्क है कि इस तरह के चित्रण से युवाओं के मन में हिंसक आचरण को लेकर एक गलत संदेश जाता है और उसे सामान्य मान लिया जाता है।
ऑनलाइन चर्चाओं में कई लोगों ने चिंता व्यक्त करते हुए लिखा कि जब बड़े पर्दे पर बेतहाशा आक्रामकता को मर्दाना या अल्फा व्यवहार का प्रतीक बनाकर प्रस्तुत किया जाता है, तो इससे मानवीय संवेदनाओं पर विपरीत असर पड़ता है। कुछ उपयोगकर्ताओं ने आदित्य धर की आने वाली परियोजनाओं और ध्रुव राठी द्वारा पहले उठाए गए सवालों का भी संदर्भ दिया और कहा कि मनोरंजन के माध्यमों में नफरत या आक्रामकता का महिमामंडन करने के गंभीर सामाजिक दुष्परिणाम हो सकते हैं। आलोचकों का मानना है कि रचनात्मक स्वतंत्रता के नाम पर युवाओं की मानसिकता को प्रभावित करने वाले दृश्यों पर निर्माताओं को अधिक जिम्मेदारी बरतनी चाहिए।
राम गोपाल वर्मा का तर्क और बचाव
संदीप रेड्डी वांगा की शैली को लेकर हो रही इस व्यापक आलोचना के बीच राम गोपाल वर्मा खुलकर उनके समर्थन में सामने आए। उन्होंने सिनेमा पर लगाए जा रहे इन आरोपों को अतार्किक बताते हुए लिखा कि अपराधों में बढ़ोतरी के लिए फिल्मों को दोषी ठहराना वैसा ही है जैसे समाज में अपहरण की घटनाओं के लिए प्राचीन ग्रंथ रामायण को जिम्मेदार मान लिया जाए। उनका मानना है कि वास्तविक जीवन के अपराध व्यक्तिगत विकृतियों और सामाजिक परिस्थितियों की उपज होते हैं, न कि महज फिल्मों को देखकर किए जाने वाले कृत्य।
राम गोपाल वर्मा पूर्व में भी संदीप रेड्डी वांगा की सिनेमाई दृष्टि और उनके बेबाक निर्देशन के प्रबल समर्थक रहे हैं। दूसरी ओर संदीप रेड्डी वांगा भी कई अवसरों पर राम गोपाल वर्मा को अपना प्रेरणास्रोत और आदर्श बता चुके हैं। इस घटना ने एक बार फिर कला, समाज, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सिनेमाई जिम्मेदारी के बीच की पतली लकीर पर एक व्यापक चर्चा को जन्म दे दिया है।


















