फिल्म इंडस्ट्री में तीन दशक का लंबा सफर तय करने वाले अरशद वारसी ने हाल ही में इंडस्ट्री के सबसे चर्चित मुद्दों में से एक नेपोटिज्म पर खुलकर अपनी राय रखी है। साल 1996 में फिल्म ‘तेरे मेरे सपने’ से अपने अभिनय सफर की शुरुआत करने वाले अरशद वारसी ने ‘मुन्नाभाई एमबीबीएस’ में सर्किट और ‘असुर’ में धनंजय राजपूत जैसे यादगार किरदार निभाए हैं। एक फिल्मी बैकग्राउंड से न होने के बावजूद उन्होंने इंडस्ट्री में अपनी एक अलग जगह बनाई है और उनका मानना है कि इन तमाम चर्चाओं से उन्हें व्यक्तिगत तौर पर कोई खास फर्क नहीं पड़ता है।
कंगना रनौत को दिया बहस की शुरुआत का श्रेय
एक हालिया इंटरव्यू में बातचीत के दौरान अरशद वारसी ने बताया कि उन्हें नेपोटिज्म की बहस से न तो ज्यादा परेशानी होती है और न ही इससे कोई विशेष फर्क पड़ता है। उन्होंने कहा कि जब उन्होंने सिनेमा जगत में कदम रखा था, उस दौर में नेपोटिज्म को लेकर इतनी बातें नहीं होती थीं। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस शब्द और इस पूरे मुद्दे को मुख्यधारा की बहसों में लाने में अभिनेत्री कंगना रनौत ने एक बहुत बड़ी भूमिका निभाई है। उनके इस कदम के बाद ही फिल्म इंडस्ट्री में परिवारवाद को लेकर चर्चाएं तेज हुईं और यह हर जगह का एक बड़ा मुद्दा बन गया।
मौका मिलने और इंडस्ट्री में टिकने में अंतर
जब इंटरव्यू के दौरान अरशद वारसी से उनके शुरुआती दिनों के माहौल के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि किसी को आसानी से मौका मिलना और लंबे समय तक फिल्मों में टिके रहना दो बिल्कुल अलग बातें हैं। उनका मानना है कि फिल्मी परिवार से होने की वजह से किसी को पहली फिल्म या अवसर तो जल्दी मिल सकता है, लेकिन मैदान में टिके रहने के लिए सिर्फ और सिर्फ टैलेंट यानी हुनर की जरूरत होती है। किसी को आसानी से लॉन्च मिल जाने का यह कतई मतलब नहीं है कि उसकी सफलता की गारंटी भी मिल गई है।
आउटसाइडर्स और स्टार किड्स के संघर्ष पर बात करते हुए अरशद वारसी ने कहा कि हर कलाकार का अपना अलग संघर्ष होता है। कलाकारों के बच्चों के कंधों पर भी एक अलग तरह का दबाव रहता है। उन्हें लगातार अपने माता-पिता की सफलता से तुलना का सामना करना पड़ता है और अपनी काबिलियत साबित करने के लिए कई कड़े पैमानों पर खरा उतरना पड़ता है।
कॉफी विद करण के मंच से शुरू हुई थी चर्चा
अरशद वारसी ने जिस वाक्य और बयान का जिक्र किया, उसकी शुरुआत फिल्ममेकर करण जौहर के मशहूर चैट शो ‘कॉफी विद करण’ से हुई थी। अभिनेत्री कंगना रनौत ने इसी लोकप्रिय टॉक शो में शिरकत करते हुए करण जौहर को नेपोटिज्म का फ्लैग बियरर यानी ध्वजवाहक करार दिया था। इस एक तीखे बयान के बाद ही हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में परिवारवाद को लेकर एक लंबी और तीखी बहस छिड़ गई थी, जो आज भी समय-समय पर चर्चा का विषय बनी रहती है।



















