राजकुमार संतोषी के निर्देशन में बनी नई पीरियड ड्रामा का यह बंटवारा 1947 रिव्यू स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर दर्शकों की गहरी संवेदनाओं और सिनेमाघरों के माहौल को बयां करता है। भारत और पाकिस्तान के विभाजन की पृष्ठभूमि पर आधारित यह फिल्म 14 अगस्त को देशभर के सिनेमाघरों में प्रदर्शित की गई है। 15 अगस्त के जश्न से ठीक एक दिन पहले 14 अगस्त 1947 की वह दर्दनाक तारीख याद आती है, जब देश का विभाजन हुआ और लाखों परिवारों को अपनी जन्मभूमि, घर-बार और संपत्ति छोड़कर पलायन करना पड़ा था। विभाजन की इसी ऐतिहासिक विभीषिका और मानवीय त्रासदी को फिल्म के माध्यम से पर्दे पर उकेरने का प्रयास किया गया है। देहरादून में लगातार हो रही बारिश और मौसम विभाग के ऑरेंज अलर्ट के कारण सुबह के शो में दर्शकों की संख्या भले ही कम रही हो, लेकिन दोपहर के शो से सिनेमाघरों में दर्शकों की भारी मौजूदगी देखी गई।
ऐतिहासिक तारीख और एडवांस बुकिंग का रिस्पॉन्स
फिल्म की रिलीज के लिए 14 अगस्त की तारीख का चयन काफी अर्थपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि यह वही दिन है जब देश ने विभाजन का दंश झेला था। ऐतिहासिक संदर्भ से जुड़े होने के कारण फिल्म को लेकर दर्शकों के बीच एक विशेष भावनात्मक जुड़ाव देखा जा रहा है। फिल्म का आधिकारिक ट्रेलर सामने आने के बाद से ही इसे लेकर काफी उत्सुकता बनी हुई थी, जिसका सीधा असर अग्रिम टिकट बिक्री पर भी दिखाई दिया। रिलीज के दिन दोपहर 2:30 बजे तक मिली जानकारी के मुताबिक, देशभर के सिनेमाघरों में इस फिल्म को कुल 8,886 शोज़ दिए गए थे। इन शो के लिए एडवांस बुकिंग के माध्यम से करीब 65,391 टिकटें बिक चुकी थीं, जो दर्शकों के बीच इस ऐतिहासिक कहानी को लेकर बने आकर्षण को दर्शाता है।
विभाजन की विभीषिका और दर्शकों के व्यक्तिगत संस्मरण
सिनेमाघरों में फिल्म देखने पहुंचे दर्शकों में कई ऐसे लोग भी शामिल थे, जिनके परिवारों ने विभाजन का दर्द प्रत्यक्ष रूप से झेला है। देहरादून के एक सिनेमाघर में फिल्म देखने आए करनवीर सिंह ने अपने पारिवारिक इतिहास के बारे में बात करते हुए कहा कि उनके पूर्वज विभाजन से पहले पाकिस्तान में निवास करते थे और वहां उनका जेवर का बड़ा कारोबार था। विभाजन के दौरान भड़के दंगों और हिंसा के बीच उन्हें अपना सब कुछ छोड़कर पलायन करना पड़ा। जब उनके दादा देहरादून पहुंचे, तो उनकी जेब में केवल कुछ ही रुपये बचे थे। उन्हीं सीमित पैसों से उन्होंने कठिन परिस्थितियों में जीवन यापन शुरू किया और समय के साथ अपनी आजीविका खड़ी की। बाद में उन्होंने देहरादून के चकराता रोड पर भारतीय सेना के लिए ड्रेस और जूते तैयार करने की दुकान खोली। करनवीर सिंह का मानना है कि ऐसी ऐतिहासिक फिल्में नई पीढ़ी को अपने इतिहास और पूर्वजों के संघर्ष से परिचित कराने के लिए बेहद जरूरी हैं।
सनी देओल की फैन फॉलोइंग और शबाना आजमी का अभिनय
फिल्म देखने आए दर्शकों में बड़े पैमाने पर सनी देओल के प्रशंसक शामिल दिखे। 25 वर्षों से सनी देओल की फिल्में देख रहे इरशाद ने बताया कि जब वे 18 वर्ष के थे, तब से वे उनकी हर फिल्म सिनेमाघर में देखते आ रहे हैं। उन्होंने 'घातक', 'घायल', 'बॉर्डर', 'बॉर्डर 2' और 'गदर' जैसी कई सुपरहिट फिल्मों का जिक्र करते हुए कहा कि सनी देओल का दमदार एक्शन, संवाद अदायगी और देशप्रेम से जुड़े मुद्दे दर्शकों को हमेशा सिनेमाघर तक खींच लाते हैं। फिल्म में शबाना आजमी के अभिनय की भी विशेष सराहना की जा रही है, जिनके किरदार के इर्द-गिर्द पूरी कहानी का भावनात्मक ताना-बाना बुना गया है। फिल्म का एक्शन और भावुक प्रसंग दर्शकों को कहानी से जोड़े रखने में सफल रहते हैं।
स्टार कास्ट का तालमेल और 'आवारापन 2' के साथ बॉक्स ऑफिस मुकाबला
फिल्म में सनी देओल 'सिकंदर मिर्ज़ा' के मुख्य किरदार में नज़र आ रहे हैं। उनके साथ उनके बेटे करण देओल भी ऑनस्क्रीन बेटे की भूमिका निभाते दिखाई दिए हैं, जिससे पिता-पुत्र की जोड़ी को देखना दर्शकों के लिए एक खास अनुभव रहा। इसके अतिरिक्त, शबाना आजमी का संवेदनशील किरदार और अभिमन्यु सिंह का नकारात्मक अभिनय कहानी में गहराई जोड़ता है। इससे पहले सनी देओल और प्रीति जिंटा की जोड़ी फिल्म 'हीरोज' में दर्शकों द्वारा पसंद की गई थी। बॉक्स ऑफिस के मोर्चे पर 14 अगस्त को ही इमरान हाशमी की फिल्म 'आवारापन 2' भी 19 साल बाद रिलीज हुई है, जिससे दोनों फिल्मों के बीच कड़ा मुकाबला देखा जा रहा है। हालांकि, स्वतंत्रता दिवस की छुट्टी और आगामी वीकेंड को देखते हुए उम्मीद जताई जा रही है कि 'बंटवारा 1947' को देखने के लिए बड़ी संख्या में दर्शक सिनेमाघरों का रुख करेंगे।


















