झारखंड के पलामू जिले में खेती के पारंपरिक तौर-तरीकों के बीच आधुनिक कृषि यंत्रों का उपयोग किसानों के लिए अतिरिक्त कमाई का बड़ा जरिया बन रहा है। जिले के सलखनी गांव निवासी किसान सूर्यदेव विश्वकर्मा ने आधुनिक तकनीक को अपनाकर इस बदलाव की मिसाल पेश की है। उन्होंने यूट्यूब पर खेती से जुड़े वीडियो देखकर धान की फसल काटने वाली रीपर मशीन के बारे में जानकारी जुटाई और फिर इसे राजस्थान से अपने गांव मंगवाया। आज यह डीजल संचालित मशीन न केवल उनकी फसल कटाई को आसान बना रही है, बल्कि गांव और आसपास के क्षेत्रों में किराये पर कटाई की सेवा देकर उनकी नियमित आमदनी का मजबूत आधार भी बन चुकी है।
मजदूरों की किल्लत से निजात और समय की बचत
फसल पककर तैयार होने के बाद कटाई के पीक सीजन में किसानों को सबसे बड़ी परेशानी खेतिहर मजदूरों की कमी की होती है। समय पर मजदूर न मिलने या मजदूरी की ऊंची दरों के कारण फसल खेत में ही खराब होने का जोखिम बना रहता है। ऐसी परिस्थितियों में यह रीपर मशीन स्थानीय किसानों के लिए बेहद मददगार साबित हो रही है। सूर्यदेव विश्वकर्मा के अनुसार, यह मशीन महज एक से डेढ़ घंटे में एक एकड़ खेत की धान की कटाई आसानी से निपटा देती है। खेत की भौगोलिक स्थिति और स्थानीय बीघा की माप के आधार पर इस मशीन से एक दिन में करीब 10 बीघे तक की कटाई संभव हो जाती है। इससे किसानों का बहुमूल्य समय बचता है और हाथ से कटाई की तुलना में मजदूरी का भारी खर्च भी काफी घट जाता है।
प्रति घंटे 600 रुपये तक शुल्क और रोज की कमाई का गणित
अपनी रीपर मशीन से दूसरे किसानों के खेतों में धान काटने के लिए सूर्यदेव विश्वकर्मा 500 से 600 रुपये प्रति घंटे का शुल्क लेते हैं। कटाई के सामान्य दिनों में यह मशीन औसतन चार से पांच घंटे काम करती है। इस कार्यप्रणाली से वे प्रतिदिन लगभग 2,000 से 3,000 रुपये तक की सकल आय अर्जित कर रहे हैं। हालांकि, इस कमाई में से ईंधन और रखरखाव की लागत भी जुड़ी होती है। मशीन को चलाने में प्रति घंटे लगभग 1 से 1.5 लीटर डीजल की खपत होती है। डीजल का खर्च, मशीन का नियमित रख-रखाव और अन्य परिचालन लागतों को घटाने के बाद उनका शुद्ध मुनाफा निकलता है। डीजल खपत का सटीक हिसाब रखने से उन्हें अपनी सेवा दर तय करने और मशीन के संचालन खर्च का बेहतर प्रबंधन करने में काफी सहूलियत मिलती है।
डिजिटल जानकारी से मिला रास्ता और भविष्य का खाका
सूर्यदेव विश्वकर्मा को इस आधुनिक कृषि उपकरण को खरीदने की प्रेरणा इंटरनेट और यूट्यूब के माध्यम से मिली थी। ऑनलाइन वीडियो देखकर उन्होंने रीपर मशीन की कार्यक्षमता और इसके व्यावहारिक फायदों को समझा और फिर सीधे राजस्थान से इसे ऑर्डर करके मंगवाया। इस प्रयोग की सफलता के बाद अब वे अपने गांव में अन्य आधुनिक कृषि उपकरणों को भी उपलब्ध कराने की तैयारी कर रहे हैं। उनकी इस दूरगामी योजना से जहां उनकी अपनी आय के स्रोतों में विस्तार होगा, वहीं सलखनी और निकटवर्ती गांवों के किसानों को भी आधुनिक मशीनों की सुलभ सेवाएं अपने ही इलाके में मिल सकेंगी।
ग्रामीण युवाओं और किसानों के लिए आत्मनिर्भरता की राह
सलखनी गांव के इस किसान का यह सफल प्रयास दर्शाता है कि इंटरनेट पर उपलब्ध उपयोगी जानकारियों का सही दिशा में इस्तेमाल ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नए अवसर पैदा कर सकता है। परंपरागत खेती करने वाले किसान अब केवल अपनी उपज बेचने पर निर्भर रहने के बजाय आधुनिक कृषि उपकरणों के जरिये कस्टम हायरिंग सेवा देकर एक सफल उद्यमी बन सकते हैं। धान कटाई के व्यस्त दिनों में रीपर मशीन किसानों की मेहनत, समय और धन की बचत करने वाला एक व्यावहारिक और आत्मनिर्भर समाधान बनकर सामने आया है।



















