बिहार की राजधानी पटना के करीब स्थित एक ऐसा प्राचीन और रहस्यमयी धार्मिक स्थल इन दिनों खासा चर्चा में है, जिसकी गिनती सदियों पुरानी मान्यताओं में होती है। स्थानीय लोग इस मंदिर को करीब चार सौ साल पुराना मानते हैं, जो घने जंगलों के बीच अपनी खास पहचान बनाए हुए है। इस पावन स्थान से जुड़ी अनगिनत लोककथाएं और डरावनी किंवदंतियां इसे अन्य पारंपरिक तीर्थ स्थलों से बिल्कुल अलग खड़ा करती हैं। मान्यता यह है कि सूरज ढलने के बाद इस जंगली इलाके की तरफ जाने की कोई हिम्मत नहीं जुटा पाता है। अब इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और स्थानीय रहस्यों ने फिल्म जगत का भी ध्यान खींच लिया है, जिसके चलते इस पर आधारित एक बड़ी बॉलीवुड फिल्म का ताना-बाना बुना गया है। अभिनेता सिद्धार्थ मल्होत्रा और अभिनेत्री तमन्ना भाटिया की मुख्य भूमिका वाली आने वाली फिल्म ‘The Vvaan: Force of the Forrest’ की पूरी पटकथा इसी तरह की अनकही कहानियों और जंगलों के परिवेश से प्रेरित बताई जाती है।
जंगल और जीवों की रक्षक के रूप में पूजा
क्षेत्रीय मान्यताओं के अनुसार, वन देवी को इस पूरे जंगल और वहां निवास करने वाले समस्त जीव-जंतुओं की संरक्षिका माना जाता है। यहां पूजा-अर्चना किसी पारंपरिक मानव मूर्ति के रूप में नहीं की जाती, बल्कि एक पवित्र पिंड को देवी का स्वरूप मानकर पूजा जाता है। गुजरे वक्त में इस पूरे भूभाग पर घना जंगल फैला हुआ था और आसपास दूर-दूर तक किसी भी तरह की इंसानी आबादी का नामोनिशान नहीं था। इसी भौगोलिक स्थिति के कारण यहां विराजी शक्ति का नाम वन देवी पड़ गया। तब से लेकर आज तक इस स्थान के बारे में तमाम तरह की कथाएं बुजुर्गों द्वारा नई पीढ़ी को सुनाई जाती रही हैं। ऐसा कहा जाता है कि जैसे ही शाम ढलती है, इस पूरे क्षेत्र का वातावरण पूरी तरह बदल जाता है और घोर अंधकार छाने के बाद कोई भी व्यक्ति मंदिर की सीमा पार कर अंदर जाने का जोखिम नहीं उठाता।
शाम ढलते ही क्यों लग जाते हैं कपाट
स्थानीय जानकारों का कहना है कि गोधूलि बेला होते ही मंदिर के मुख्य द्वार पूरी तरह से बंद कर दिए जाते हैं और यहां सेवा देने वाले पुजारी भी सुरक्षित स्थान पर लौट जाते हैं। रात के वक्त इस मंदिर परिसर या इसके आसपास के वन क्षेत्र में किसी भी इंसान के रुकने पर पूरी तरह पाबंदी होती है। ग्रामीणों का दृढ़ विश्वास है कि सूर्यास्त के ठीक बाद वन देवी स्वयं इस जंगल में विचरण करती हैं। लोगों की यही गहरी आस्था इस नई सिनेमाई कहानी का सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ बनी है। फिल्म में अभिनेता सिद्धार्थ मल्होत्रा का किरदार इसी वर्जित क्षेत्र के भीतर कदम रख देता है, जिसके बाद परदे पर डर, अनसुने रहस्यों और अलौकिक ताकतों से सामना होने का सिलसिला शुरू हो जाता है।
प्रचलित किंवदंतियां और चमत्कारी घटनाएं
इस ऐतिहासिक मंदिर के इर्द-गिर्द कई तरह की रोमांचक कहानियां सदियों से तैर रही हैं। इनमें संकट के समय अपने भक्तों की रक्षा करने से लेकर रात के सन्नाटे में जंगल के भीतर अजीबोगरीब आवाजें या घटनाएं महसूस होने तक के किस्से शामिल हैं। फिल्मी पर्दे पर उतारने से पहले इस प्रोजेक्ट से जुड़े निर्माताओं ने खुद इस स्थान का दौरा किया था। उन्होंने यहां आकर देवी के दर्शन किए और स्थानीय निवासियों के अलावा मंदिर के पुजारियों तथा साधु-संतों से लंबी बातचीत कर इस जगह के धार्मिक महत्व की पूरी जानकारी जुटाई थी।
भक्त विद्यानंद मिश्रा से जुड़ा पौराणिक प्रसंग
इस मंदिर के इतिहास के तार एक अत्यंत प्रसिद्ध लोककथा से जुड़े हैं जो विद्यानंद मिश्रा नाम के एक निष्ठावान भक्त के इर्द-गिर्द घूमती है। कथाओं के अनुसार, वह मिर्जापुर के प्रसिद्ध मां विन्ध्यवासिनी धाम के परम भक्त हुआ करते थे और नियमित रूप से वहां दर्शन के लिए जाया करते थे। जैसे-जैसे समय का पहिया आगे बढ़ा और उनकी उम्र बढ़ती गई, इतनी लंबी यात्रा तय करके देवी के दर्शन करना उनके लिए शारीरिक रूप से कठिन हो गया। हालांकि इन सब कठिनाइयों के बावजूद मां के प्रति उनकी अटूट श्रद्धा में कोई कमी नहीं आई। एक रात मां विंध्यवासिनी ने अपनी इस अनन्य भक्त को सपने में दर्शन दिए और उन्हें अपनी पिंड का एक छोटा हिस्सा स्थानीय जंगल में ही स्थापित करने का स्पष्ट निर्देश दिया। इसके बाद उस भक्त ने अमहरा, राघोपुर और कंचनपुर गांवों की सीमा के पास इस पवित्र पिंड की स्थापना की। जानकारों का कहना है कि उस दौर में वहां सिर्फ जंगल ही जंगल हुआ करता था, जिसके चलते इस रूप को वन देवी के नाम से पुकारा जाने लगा।
सिनेमा के कारण बढ़ी सैलानियों की संख्या
इस बहुप्रतिक्षित फिल्म की घोषणा होने के बाद से इस प्राचीन मंदिर और इससे जुड़ी कहानियों को जानने के लिए लोगों की उत्सुकता काफी बढ़ गई है। नतीजा यह है कि अब पहले के मुकाबले कहीं अधिक संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक यहां पहुंच रहे हैं। हालांकि जानकारों का मानना है कि किसी भी फिल्मी कहानी और वास्तविक लोककथा को पूरी तरह एक समान मान लेना उचित नहीं होगा। यही वजह है कि पटना के पास स्थित यह रहस्यमयी मंदिर आज के समय में धार्मिक आस्था के साथ-साथ लोक-विश्वास और फिल्म जगत के आकर्षण का एक अनूठा केंद्र बन चुका है।
कहां और किस जगह पर स्थित है यह स्थल
वन देवी का यह प्राचीन मंदिर बिहार के बिहटा कस्बे के ठीक पास स्थित है। यह पवित्र स्थान राज्य की राजधानी पटना से लगभग 35 किलोमीटर पश्चिम दिशा में पड़ता है, जहां अमहरा, राघोपुर और कंचनपुर गांवों की सीमाएं आपस में मिलती हैं। यह किसी भव्य या विशाल मंदिर की तरह नहीं है, बल्कि दूर-दूर तक फैले जंगल और ग्रामीण परिवेश के बीच स्थापित एक छोटा सा पावन धार्मिक स्थल है। अपनी खास बनावट और शांत परिवेश के कारण यह मंदिर आने वाले हर व्यक्ति का ध्यान अपनी ओर खींच लेता है।



















