पश्चिम एशिया में सुलगती जंग और होर्मुज स्ट्रेट में नाकाबंदी के हालात के बीच भारत और ईरान के रिश्तों की एक अनूठी तस्वीर सामने आई है। ईरान का नौसैनिक जहाज आईआरआईएस लवन पिछले छह महीनों से केरल के कोच्चि बंदरगाह पर ही डेरा डाले हुए है। भू-राजनीतिक मोर्चे पर मचे इस घमासान के बीच भारत ने मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए इस ईरानी युद्धपोत को अपने यहां ठहरने की अनुमति दी थी, जो युद्ध के बदलते घटनाक्रम के कारण अपने वतन नहीं लौट पाया।
युद्ध अभ्यास के बाद स्वदेश लौट रहा था जहाज
ईरानी नौसेना का यह लैंडिंग शिप इसी साल फरवरी के महीने में भारत आया था। इसका मुख्य मकसद विशाखापत्तनम में आयोजित इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू और बहुपक्षीय नौसैनिक अभ्यास मिलन-2026 में शिरकत करना था। इस बड़े रक्षा आयोजन में हिस्सा लेने के बाद जब यह जहाज अपने वतन वापस लौट रहा था, तभी पश्चिम एशिया में स्थितियां पूरी तरह बिगड़ गईं और युद्ध छिड़ गया। इसी5 मार्च को ईरानी नौसेना का एक अन्य फ्लीट सप्लाई वेसल आईआरआईएस बुशहर भी श्रीलंका में शरण लेने के लिए मजबूर हुआ था।
तकनीकी खराबी और मानवीय आधार पर कोच्चि में प्रवेश
अपने तय सफर के दौरान आईआरआईएस लवन के चालकों ने भारत पहुंचने से पहले ही इसमें कुछ तकनीकी दिक्कतें आने की सूचना साझा की थी। इन परेशानियों को देखते हुए भारत ने पूरी तरह मानवीय आधार पर चार मार्च को इस जहाज को कोच्चि बंदरगाह पर लंगर डालने की अनुमति प्रदान की। कोच्चि पहुंचने पर इस युद्धपोत के सभी 183 सदस्यों को भारतीय नौसेना की आधुनिक सुविधाओं के भीतर ठहराया गया था ताकि उन्हें किसी प्रकार की असुविधा का सामना न करना पड़े।
चालक दल के सदस्य अभी भी भारत में मौजूद
शुरुआती दिनों में भारी संख्या में मौजूद कर्मियों में से अब भी पचास से अधिक चालक दल के सदस्य कोच्चि में ही रुके हुए हैं। हालांकि कुछ अन्य सूत्रों और रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया है कि जहाज के सुचारू संचालन और देखभाल के लिए कम से कम दो दर्जन से ज्यादा कर्मी अब भी वहां तैनात हैं। वर्तमान स्थिति यह है कि इस जहाज की सुरक्षा और देखरेख की पूरी जिम्मेदारी अब कोचीन पोर्ट अथॉरिटी को सौंप दी गई है, जो लगातार इसकी निगरानी कर रही है।
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने किया था फैसले का बचाव
इस पूरे घटनाक्रम पर भारत की कूटनीतिक स्थिति स्पष्ट करते हुए विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने सात मार्च को कोच्चि बंदरगाह पर इस जहाज को प्रवेश दिए जाने के फैसले का पुरजोर समर्थन किया था। उन्होंने कहा था कि जब यह जहाज भारत की सरजमीं पर आया था, तब पश्चिम एशिया के हालात बिल्कुल अलग थे और वह केवल एक पूर्व-निर्धारित नौसैनिक अभ्यास में भाग लेने आया था। वापसी के वक्त अचानक बदले घटनाक्रम और गंभीर संकट को देखते हुए जहाज ने भारत से गुहार लगाई थी, जिसे मानवीय मूल्यों के तहत स्वीकार किया गया।





















