सिनेमा जगत में मौसमी चटर्जी, रेखा और हेमा मालिनी जैसी दिग्गज अभिनेत्रियों के साथ काम कर चुके संजीव कुमार ने अपने शानदार अभिनय करियर के दौरान कई यादगार और चुनौतीपूर्ण भूमिकाएं निभाईं। उस दौर में जब मुख्यधारा के अभिनेता खुद को हमेशा पर्दे पर युवा और ऊर्जावान दिखाने के लिए संघर्ष करते थे, तब उन्होंने अपनी अभिनय क्षमता के दम पर एक अलग ही मुकाम हासिल किया। निजी और पेशेवर जीवन दोनों मोर्चों पर धर्मेंद्र जैसे बड़े सुपरस्टार को कड़ी टक्कर देने वाले इस कलाकार ने अपनी अनूठी अभिनय शैली से एक अमिट छाप छोड़ी। जिस समय कोई भी स्थापित नायक पर्दे पर किसी पिता या उम्रदराज व्यक्ति का किरदार निभाने के लिए तैयार नहीं होता था, उस दौर में उन्होंने ढलती उम्र के चरित्रों को सहजता से अपना लिया।
शोले में ठाकुर के किरदार से बनाई अनोखी मिसाल
जब पर्दे पर दिखने वाले नायक केवल जवानी और रोमांस के दायरे में रहना चाहते थे, तब संजीव कुमार ने куль फिल्म शोले में ‘ठाकुर’ का दमदार किरदार निभाकर इतिहास रच दिया। वह बहुत कम उम्र से ही बड़े परदे पर बुजुर्ग या गंभीर भूमिकाएं निभाने से कभी पीछे नहीं हटे और हर बार अपनी कला का लोहा मनवाया। उनकी इस बेबाक पसंद के पीछे दरअसल एक गहरा व्यक्तिगत डर छिपा हुआ था, जो उनके जीवन पर साए की तरह मंडराता रहता था। उनका मूल नाम हरीहर जेठालाल जरीवाला था और उनका जन्म 9 जुलाई 1938 को सूरत शहर में हुआ था। उन्होंने अभिनय की शुरुआत रंगमंच यानी थिएटर से की थी और बाद में विधिवत एक्टिंग स्कूल से प्रशिक्षण प्राप्त किया। फिल्मों में छोटे-मोटे किरदारों से अपने सफर की शुरुआत करने वाले यह कलाकार धीरे-धीरे हिंदी सिनेमा के सबसे सम्मानित और बहुमुखी अभिनेताओं की सूची में शामिल हो गए।
उम्र को कभी अपनी कला की सीमा नहीं बनाया
संजीव कुमार की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि उन्होंने कभी भी अपनी उम्र को अपने अभिनय के आड़े नहीं आने दिया। फिल्म शोले के अलावा आंधी, मौसम, कोशिश, खिलौना और अंगूर जैसी बेहतरीन फिल्मों में उनके काम को आज भी सराहा जाता है। हर फिल्म में उनका अंदाज और मिजाज बिल्कुल जुदा नजर आता था, जो उनकी बहुमुखी प्रतिभा को दर्शाता है। फिल्म नया दिन नई रात में उन्होंने एक साथ नौ अलग-अलग किरदार निभाकर अभिनय की ऐसी अद्भुत रेंज पेश की, जिसे भारतीय सिनेमा के इतिहास के सबसे बड़े और यादगार प्रयोगों में गिना जाता है। अपनी इन्हीं खूबियों के दम पर उन्होंने इंडस्ट्री में एक ऐसा मुकाम बनाया जो आज भी नए कलाकारों के लिए एक मिसाल की तरह है।
परिवार के श्राप और कम उम्र में निधन का सच
एक बार एक इंटरव्यू के दौरान जब संजीव कुमार से यह सवाल पूछा गया कि वह इतनी कम उम्र में भी फिल्मों में हमेशा उम्रदराज भूमिकाएं क्यों चुनते हैं, तो उन्होंने एक चौंकाने वाला खुलासा किया था। उनका ऐसा मानना था कि उनके पूरे परिवार पर एक अजीब सा श्राप है, जिसके प्रभाव के कारण उनके खानदान में कोई भी पुरुष कभी पचास साल की उम्र से ज्यादा नहीं जी पाता है। उन्होंने खुद यह बात कही थी कि वह परदे पर बुजुर्ग किरदार इसलिए निभाते हैं क्योंकि फिल्मों के माध्यम से ही वह बुढ़ापे के अनुभव को जी सकते हैं, क्योंकि उन्हें पूरा यकीन था कि वह खुद कभी बुढ़ापा नहीं देख पाएंगे। उनका यह डर और उनकी वह अजीब भविष्यवाणी आखिरकार सच साबित हुई जब महज सैंतालीस साल की उम्र में दिल का दौरा पड़ने से उनका असामयिक निधन हो गया। अपनी पूरी जिंदगी में वह अकेले रहे और उन्हें कभी किसी का सच्चा प्यार या जीवनसाथी का साथ नसीब नहीं हो सका।



















