दिल्ली यूनिवर्सिटी (DUSU) में छात्रसंघ चुनाव 2026 के लिए मतदान जारी है और नॉर्थ कैंपस से लेकर साउथ कैंपस तक जबरदस्त जोश और गहमागहमी का माहौल बना हुआ है। चुनाव के इस मौसम में हवा नारों की गूंज और पर्चों की बौछार से भरी हुई है, लेकिन इस बार हवा का रुख और छात्रों का मिजाज पूरी तरह बदला हुआ नजर आ रहा है। पिछले कुछ वर्षों तक जहां यूनिवर्सिटी की राजनीति अटेंडेंस के नियमों, फीस में बढ़ोतरी या कॉलेज फेस्ट के इर्द-गिर्द घूमती रहती थी, वहीं इस बार समीकरण बिल्कुल अलग हैं। आज जब छात्र अपने मताधिकार का इस्तेमाल करने के लिए पोलिंग बूथ पर पहुंच रहे हैं, तो उनके मन में केवल एक ही बुनियादी और गंभीर सवाल गूंज रहा है कि उन्हें पढ़ाई के दौरान रहने के लिए एक सुरक्षित और किफायती कमरा कहां नसीब होगा।
बदलता छात्र मिजाज और हॉस्टल का गहरा संकट
यह बदलाव अचानक या रातों-रात पैदा नहीं हुआ है। देश के कोने-कोने से हर साल लाखों की संख्या में युवा उच्च शिक्षा हासिल करने के लिए दिल्ली यूनिवर्सिटी का रुख करते हैं, लेकिन यूनिवर्सिटी के पास उन्हें अपने परिसर में रखने के लिए पर्याप्त हॉस्टल की सुविधा ही मौजूद नहीं है। ढाई लाख से भी अधिक स्टूडेंट्स की भारी संख्या वाले इस विशाल कैंपस में गिने-चुने हॉस्टल ही बने हुए हैं, जिनमें कुल छात्रों के चार प्रतिशत हिस्से को भी आवास मिल पाना संभव नहीं हो पाता है। नतीजतन, लाखों की तादाद में छात्र प्राइवेट पीजी और महंगे किराए के कमरों में रहने के लिए मजबूर हैं। सत्य निकेतन इलाके में पेश आए एक दर्दनाक पीजी हादसे ने इस लचर व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी, जिसके बाद से अभिभावकों की रातों की नींद उड़ चुकी है और छात्र गहरे सदमे और डर के साए में जीने को विवश हैं। इसीलिए डूसू चुनाव 2026 में हॉस्टल का यह मुद्दा महज एक चुनावी जुमला बनकर नहीं रह गया है, बल्कि यह हर छात्र और परिवार की सबसे बड़ी मांग बन चुका है।
खोखले वादों से आगे बढ़कर असल मुद्दों की तलाश
सालों से दिल्ली यूनिवर्सिटी के चुनावों में नेता लोग बड़ी-बड़ी रैलियों का आयोजन करके और स्टार नाइट के हसीन सपने दिखाकर छात्रों के वोट बटोरते आए हैं। लेकिन इस बार का युवा वोटर पूरी तरह बदल चुका है और आज की जनरेशन जी के स्टूडेंट्स इन पुराने और खोखले वादों के झांसे में आने वाले नहीं हैं। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) और नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (NSUI) जैसे बड़े छात्र संगठनों के उम्मीदवारों का पाला अब ऐसे जागरूक स्टूडेंट्स से पड़ा है जो सुबह कॉलेज में अपनी क्लास अटेंड करने के बाद शाम को पीजी के मकान मालिक के ताने सुनने और आसमान छू रहे किराए का हिसाब लगाने की विवशता झेलते हैं। इस बार के चुनावी घोषणापत्रों में इसी बात की एक दिलचस्प टक्कर देखने को मिली है, जहां एबीवीपी ने अपने मेनिफेस्टो में आवास को मुख्य केंद्र में रखते हुए हर कॉलेज में अलग गर्ल्स हॉस्टल और स्टूडेंट हाउसिंग सेल स्थापित करने का वादा किया है, वहीं एनएसयूआई ने रेंट कंट्रोल पॉलिसी और एक वेरिफाइड पोर्टल का दांव चला है ताकि छात्रों के साथ किसी तरह की ठगी न हो सके। इसके अलावा, चुनाव से ठीक पहले दिल्ली सरकार की ओर से 10,000 नए बेड के हॉस्टल बनाने के ऐलान ने इस चुनावी माहौल को और अधिक गर्मा दिया है।
सुरक्षा और जान की कीमत पर उठ रहे बड़े सवाल
इस बार के चुनावी समीकरणों में अचानक आए इस भूचाल के पीछे सबसे बड़ा ट्रिगर साउथ कैंपस के सत्य निकेतन इलाके में घटित वह भयावह हादसा बना, जिसमें एक बहुमंजिला प्राइवेट पीजी बिल्डिंग अचानक भरभराकर गिर गई थी। इस दिल दहला देने वाली दुर्घटना में कई मासूम छात्रों की अकाल मृत्यु हो गई थी और मलबे के नीचे से जब छात्रों के मदद के लिए फोन आए थे, तब पूरी दिल्ली की रूह कांप उठी थी। मुखर्जी नगर की कोचिंग में आग लगने की घटनाओं से लेकर सत्य निकेतन के मलबे तक, यह बात बिल्कुल साफ हो चुकी है कि दिल्ली में स्टूडेंट्स को शरण देने वाले प्राइवेट पीजी किसी मौत के कुएं से कम साबित नहीं हो रहे हैं। इन कमरों में न तो फायर सेफ्टी के बुनियादी नियमों का पालन होता है और न ही वेंटिलेशन की कोई ढंग की व्यवस्था होती है, और ऊपर से किराया ऐसा वसूला जाता है जो किसी भी आम परिवार की आर्थिक कमर तोड़कर रख दे।
गंभीर प्राथमिकताओं के साथ बदला चुनाव प्रचार
इस बड़े हादसे के बाद से छात्र संगठनों को भी अपनी प्राथमिकताओं को बदलने के लिए मजबूर होना पड़ा है। अब चुनाव प्रचार के दौरान लाउडस्पीकरों पर डीजे की धुन पर नाचने के बजाय पीजी के अनिवार्य सेफ्टी ऑडिट, फायर एनओसी जारी कराने और बेलगाम किराए पर लगाम कसने जैसे गंभीर विषयों पर खुलकर चर्चा हो रही है। दिल्ली यूनिवर्सिटी के छात्र आज सत्ता और संगठन से सीधा सवाल कर रहे हैं कि क्या उनकी जान की कीमत सिर्फ एक वोट देने तक ही सीमित रह गई है। वे चाहते हैं कि नेता लोग भाषणबाजी और वादों के दौर से बाहर निकलकर उनके सिर पर मंडरा रहे आवास और सुरक्षा के इस तलवार का कोई स्थायी समाधान निकालें, ताकि आने वाली पीढ़ियों को इस तरह के हादसों और त्रासदियों का सामना न करना पड़े।

















