पौराणिक गाथाओं पर आधारित सिनेमा तैयार करना फिल्म निर्माताओं के लिए हमेशा बेहद संवेदनशील और चुनौतीपूर्ण डगर रहा है। इस विधा की कहानियों में न सिर्फ तकनीकी और रचनात्मक जोखिम जुड़े होते हैं, बल्कि दर्शकों की गहरी धार्मिक आस्था का भी पूरा सम्मान करना पड़ता है। इसी परिप्रेक्ष्य में हाल ही में अपनी परियोजना की जबरदस्त कामयाबी के बाद चर्चा में आईं फिल्म निर्माता अनुप्रिया नागर ने धार्मिक किरदारों की तैयारी और उनकी पवित्रता पर अपने विचार साझा किए हैं। उनका मानना है कि किसी आध्यात्मिक पात्र को जीवंत करने के लिए केवल बाहरी आदतों या भोजन में फेरबदल कर लेना काफी नहीं होता, बल्कि किरदार के साथ आत्मा का गहरा तार जुड़ना चाहिए।
बॉक्स ऑफिस पर हनुमान अंश की अप्रत्याशित यात्रा
सिनेमाघरों में आने से पहले कम चर्चा में रहने वाली फिल्म हनुमान अंश ने दर्शकों के बीच पहुंचते ही धारणाओं को पूरी तरह उलट कर रख दिया। शुरुआत में कइयों को लगा था कि यह प्रोजेक्ट टिकट खिड़की पर दम तोड़ देगा, लेकिन प्रदर्शन के दो हफ्ते गुजरते ही इसने दर्शकों की पसंद पर कब्जा जमा लिया। महज 2 करोड़ रुपये के सीमित बजट में तैयार हुई इस रचना ने दुनियाभर के सिनेमाघरों से 350 करोड़ रुपये का विशाल संग्रह हासिल कर लिया। रिलीज के 47वें दिन भी यह फिल्म सिनेमाघरों में अपनी मौजूदगी दर्ज कराते हुए कमाई के सिलसिले को आगे बढ़ा रही है, जिसने छोटे स्तर पर बनी भक्ति फिल्मों के लिए सफलता का नया मानक तय किया है।
पात्र के साथ आंतरिक जुड़ाव की अनिवार्यता
एक बातचीत के दौरान अनुप्रिया नागर ने आगामी बहुचर्चित फिल्म रामायण, उससे जुड़ी प्रतिक्रियाओं और अभिनेता रणबीर कपूर की तैयारी के तौर-तरीकों पर चर्चा की। शूटिंग के सिलसिले में अभिनेता द्वारा मांसाहार का त्याग करने की चर्चाओं पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने कहा कि पर्दे पर भगवान या संत का रूप धरने के लिए केवल प्लेट से भोजन बदलना पर्याप्त कदम नहीं है। उनके अनुसार, खान-पान में संयम बरतने से कहीं अधिक जरूरी यह है कि कलाकार उस किरदार की आध्यात्मिक गरिमा को अपने भीतर उतारे और उससे एक आत्मिक संबंध कायम करे।
अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए उन्होंने अपनी ही फिल्म का उदाहरण सामने रखा। हनुमान अंश में शोभिनव ने महाराज जी की भूमिका अदा की थी और उन्होंने उस चरित्र को इस कदर आत्मसात किया कि लोग आज भी उन्हें उसी आदर और नजरिए से देखते हैं। अनुप्रिया का मानना है कि यही संजीदगी रामायण जैसी विशाल गाथा के पूरे दल और कलाकारों में दिखाई देनी चाहिए, ताकि परदे पर आस्था की प्रामाणिकता स्पष्ट रूप से झलक सके।
स्टारडम और भव्यता के पार सिनेमाई बारीकियां
सिद्धार्थ कनन को दिए एक साक्षात्कार में अनुप्रिया नागर ने बताया कि इस प्रकार के विषय पर काम करते समय निर्माण के प्रत्येक पहलू पर सूक्ष्मता और निष्ठा से ध्यान देना पड़ता है। उनका कहना है कि हर फिल्म निर्माता को अपनी कृति श्रेष्ठ और मास्टरपीस प्रतीत होती है, और उन्हें भी अपनी परियोजना को लेकर ऐसा ही महसूस हुआ था। हालांकि, उन्होंने इस बात पर बल दिया कि केवल एक उम्दा कहानी, नामचीन कलाकार या विख्यात निर्देशक का नाम जुड़ जाने से कोई फिल्म अपने आप सफल नहीं हो जाती। पौराणिक आख्यानों को पर्दे पर उतारने के लिए बाहरी भव्यता की तुलना में निष्ठा, आस्था का आदर और गहन आंतरिक समर्पण सबसे निर्णायक भूमिका निभाते हैं।


















