सिनेमा जगत में अपनी यथार्थवादी कहानियों और सशक्त अभिनय के लिए पहचाने जाने वाले फिल्मकार तिग्मांशु धूलिया ने भारतीय स्क्रीन पर उत्तर भारत के चित्रण को लेकर गहरी चिंता जाहिर की है। उनकी अपनी रचनात्मक यात्रा अक्सर उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और उत्तरी राज्यों के विभिन्न अंचलों के इर्द-गिर्द बुनी रही है। अपनी आने वाली फिल्म 'घमासान' को लेकर चर्चा करते हुए उन्होंने दो-टूक शब्दों में कहा कि मौजूदा दौर की फिल्मों और वेब सीरीज में इस विशाल भूभाग को एक ही तरह के फूहड़ स्टीरियोटाइप में समेटने की प्रवृत्ति बढ़ गई है।
उत्तर भारत की विविधता को नजरअंदाज करने की प्रवृत्ति
तिग्मांशु धूलिया के अनुसार उत्तर भारत कोई एक जैसी संरचना वाला इलाका नहीं है, बल्कि यह एक बेहद विस्तृत और बहुआयामी क्षेत्र है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि पूरे क्षेत्र के सभी राज्यों को किसी एक तयशुदा चश्मे से नहीं देखा जा सकता। अपनी बात को तार्किक रूप से रखते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य प्रदेश सामाजिक, सांस्कृतिक और भाषाई स्तर पर एक-दूसरे से पूरी तरह जुदा हैं। इन राज्यों के अलग-अलग शहर, कस्बे और देहाती अंचल भी अपने आप में अनोखी विशिष्टताएं समेटे हुए हैं, जिन्हें एक ही रंग में रंग देना रचनात्मक आलस्य है।
कहानियों में लोकेशन की भूमिका और हॉलीवुड से सीख
अपनी फिल्मों की निर्माण प्रक्रिया का जिक्र करते हुए तिग्मांशु धूलिया ने बताया कि उनके प्रोजेक्ट्स में लोकेशन कभी भी केवल इत्तेफाक या कामचलाऊ पृष्ठभूमि नहीं होतीं। वे इसे कहानी का एक सजीव पात्र मानते हैं। उन्होंने रेखांकित किया कि तथाकथित हिंदी हार्टलैंड या हिंदी पट्टी कोई एकलौता सांचा नहीं है। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान के रीति-रिवाज, जीवनशैली और परिवेश एक-दूसरे से भिन्न हैं, और राज्यों की अपनी आंतरिक क्षेत्रीय विशेषताएं भी बेहद सूक्ष्म हैं।
इस नजरिए को मजबूत करने के लिए वे अंतरराष्ट्रीय सिनेमा के तौर-तरीकों का हवाला देते हैं। फिल्मकार का कहना है कि वे हॉलीवुड फिल्मों के शिल्प से गहराई से प्रभावित हैं, जहां शूटिंग की लोकेशंस पटकथा को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाती हैं। तिग्मांशु धूलिया की फिल्मों में भूगोल, स्थानीय भाषा की मिठास और तेवर, सामाजिक ताना-बाना और जमीनी माहौल सीधे कथानक की आत्मा से जुड़े रहते हैं।
सस्ते अपराध और हिंसा के दायरे में समेटने पर एतराज
तिग्मांशु धूलिया ने इस बात पर कड़ा विरोध दर्ज कराया कि किस तरह चुनिंदा परियोजनाओं में पूरे हिंदी भाषी अंचल को एक समान खांचे में पेश कर दिया जाता है। उनका मानना है कि लगातार ऐसा उथला चित्रण देखने से आम दर्शकों के मन में पूरे इलाके को लेकर एक नकारात्मक और भ्रामक धारणा घर कर जाती है। कई रचनात्मक प्रोजेक्ट्स पूरी हिंदी पट्टी को केवल अनियंत्रित अपराध, बंदूकबाजी और अंधाधुंध हिंसा के दायरे में ही कैद करके रख देते हैं, जबकि असल जिंदगी इससे काफी अलग और विविध है।
मिर्जापुर की अतिशयोक्ति पर उठाए तीखे सवाल
पंकज त्रिपाठी, अली फजल, दिव्येंदु और रसिका दुग्गल जैसे कलाकारों के अभिनय से चर्चित हुई लोकप्रिय प्रस्तुति 'मिर्जापुर' पर भी तिग्मांशु धूलिया ने खुलकर सवाल खड़े किए। उन्होंने तर्क दिया कि इस प्रोजेक्ट में घटनाओं और माहौल को जरूरत से ज्यादा बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया है, जिसका जमीनी सच्चाई से कोई सीधा वास्ता नहीं बैठता।
अपनी बात पर जोर देते हुए तिग्मांशु धूलिया ने कहा कि वे मिर्जापुर के बारे में बात नहीं कर सकते क्योंकि वहां बहुत कुछ बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया है जो वास्तविकता से परे है। उन्होंने आगे जोड़ा कि स्क्रीन पर कट्टे और असला-बारूद बनते दिखाए जा रहे हैं, लेकिन असलियत ऐसी नहीं है। उनका मानना है कि मनोरंजन के नाम पर यथार्थ को इस कदर विकृत करना दर्शकों को भ्रमित करता है।



















