वर्ष 1973 के आने से पहले अमिताभ बच्चन के फिल्मी सफर की गाड़ी काफी मुश्किल दौर से गुजर रही थी। उन्हें इंडस्ट्री में ‘फ्लॉप हीरो’ का ठप्पा मिल चुका था और ऐसा माना जाता है कि एक दर्जन से अधिक फिल्में लगातार असफल होने के बाद वह मुंबई छोड़कर जाने का विचार कर रहे थे। लेकिन जैसे ही साल 1973 की शुरुआत हुई, उनकी किस्मत ने एक ऐसा जबरदस्त पलटा खाया जिसने हिंदी सिनेमा की धारा ही हमेशा के लिए बदल दी। इस एक ही साल ने न केवल अमिताभ के डूबते करियर को संभाला बल्कि आने वाले तीन दशकों तक के लिए बॉलीवुड की पटकथा लिख दी।
जंजीर से मिला एंग्री यंग मैन का खिताब
मई 1973 में निर्देशक प्रकाश मेहरा की फिल्म ‘जंजीर’ सिनेमाघरों में उतरी और इसने बॉक्स ऑफिस पर इतिहास रच दिया। इस मूवी में अमिताभ बच्चन ने पुलिस इंस्पेक्टर विजय खन्ना की दमदार भूमिका निभाई थी। उस समय जब पर्दे पर रोमांटिक नायक हुआ करते थे, आम जनता को उनका यह गुस्सैल, शांत और व्यवस्था के खिलाफ खड़े होने वाला अंदाज बेहद पसंद आया। ‘जंजीर’ ने अमिताभ बच्चन को ‘एंग्री यंग मैन’ की वह हमेशा रहने वाली पहचान दी जो आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी यूएसपी बन गई।
जया बच्चन के साथ ऑन-स्क्रीन और रियल लाइफ केमिस्ट्री
‘जंजीर’ फिल्म में जया बच्चन ने, जो तब जया भादुड़ी के नाम से जानी जाती थीं, ‘माला’ नाम के किरदार को निभाया था। पर्दे पर अमिताभ और जया की जोड़ी ने दर्शकों का भरपूर प्यार बटोरा। जब उस दौर की अन्य शीर्ष अभिनेत्रियां एक फ्लॉप चल रहे एक्टर के साथ काम करने में कतरा रही थीं, तब जया ने यह प्रोजेक्ट साइन किया। यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर ब्लॉकबस्टर साबित हुई और इसी यादगार साल के दौरान दोनों परिणय सूत्र में बंध गए, जिससे इस कामयाबी की मिठास और ज्यादा बढ़ गई।
अभिमान का इमोशनल और म्यूजिकल ड्रामा
‘जंजीर’ की अभूतपूर्व सफलता के ठीक दो महीने बाद, जुलाई 1973 में हृषिकेश मुखर्जी के निर्देशन में बनी फिल्म ‘अभिमान’ रिलीज हुई। यह फिल्म ‘जंजीर’ के एक्शन से बिल्कुल उलट भावनाओं और शानदार संगीत से सराबोर एक पारिवारिक ड्रामा थी। इसमें अमिताभ बच्चन ने सुबीर कुमार नामक एक प्रतिष्ठित गायक का रोल किया, जो अपनी पत्नी, जिसे जया बच्चन ने निभाया था, की बढ़ती लोकप्रियता और शोहरत को बर्दाश्त नहीं कर पाता और ईगो की चपेट में आ जाता है।
एसडी बर्मन का अमर संगीत और क्रिटिक्स की सराहना
‘अभिमान’ में अमिताभ और जया की अदाकारी ने अभिनय का एक अलग ही मानदंड स्थापित किया। इस फिल्म में एसडी बर्मन द्वारा कंपोज किया गया संगीत आज भी श्रोताओं के दिलों में ताजा है। ‘तेरे मेरे मिलन की ये रैना’ और ‘पिया बिना पिया बिना’ जैसे बेहतरीन गानों ने दर्शकों को गहराई तक झकझोर दिया। समीक्षक और आम दर्शक हैरान थे कि कैसे ‘जंजीर’ का वह आक्रामक युवा ‘अभिमान’ में आकर एक संवेदनशील लेकिन अहम् से ग्रसित कलाकार के रूप में खुद को ढाल लेता है।
नमक हराम और राजेश खन्ना के साथ मुकाबला
नवंबर 1973 में हृषिकेश मुखर्जी की एक और शानदार कृति ‘नमक हराम’ ने पर्दा संभाला। इस फिल्म में उस वक्त के निर्विवाद सुपरस्टार राजेश खन्ना और तेजी से उभरते सितारे अमिताभ बच्चन ने एक साथ स्क्रीन साझा की। अमीर-गरीब की खाई, गहरी दोस्ती और ट्रेड यूनियन की राजनीति पर बुनी गई इस कहानी ने लोगों के दिलों को गहराई से छुआ। इसमें अमिताभ के किरदार ‘विक्रम’ का तेवर बेहद आक्रामक और प्रभावशाली था।
रेखा के साथ शुरुआत और एक नए युग का सूत्रपात
‘नमक हराम’ वह फिल्म थी जिसने अमिताभ बच्चन और रेखा के करियर के शुरुआती पन्नों को आपस में जोड़ा। हालांकि यह पूरी कहानी मुख्य रूप से राजेश और अमिताभ की दोस्ती के इर्द-गिर्द घूमती थी, फिर भी दर्शकों ने रेखा के साथ अमिताभ की केमिस्ट्री को हाथों-हाथ लिया। रेखा ने इस मूवी में श्यामा का किरदार निभाया था। आगे चलकर अमिताभ और रेखा की जोड़ी हिंदी सिनेमा की सबसे चर्चित जोड़ियों में शुमार हुई, जिसकी नींव इसी साल यानी 1973 में पड़ी थी। ‘नमक हराम’ का सबसे बड़ा आकर्षण यह रहा कि रिलीज के बाद अमिताभ का किरदार राजेश खन्ना के किरदार पर भारी पड़ गया। इस फिल्म के क्लाइमैक्स और दमदार गुस्सैल अभिनय के लिए अमिताभ बच्चन को बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का फिल्मफेयर पुरस्कार भी मिला। इसी सिनेमाई कलाकृति ने आधिकारिक तौर पर बॉलीवुड में ‘राजेश खराम युग’ के समापन और ‘अमिताभ बच्चन युग’ के भव्य आगाज का एलान कर दिया।
बॉक्स ऑफिस पर रिकॉर्डतोड़ सफलता
साल 1973 में रिलीज हुई इन तीनों फिल्मों का कुल बिजनेस और सक्सेस रेट वाकई अद्भुत था। ‘जंजीर’ ने साल की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्मों में अपना नाम दर्ज कराया, जबकि ‘अभिमान’ और ‘नमक हराम’ भी बॉक्स ऑफिस पर सेमी-हिट और सुपरहिट साबित हुईं। एक ही कैलेंडर ईयर के भीतर तीन एकदम जुदा जॉनर यानी एक्शन, म्यूजिकल ड्रामा और सोशल ड्रामा में लगातार सफलता का स्वाद चखना किसी भी कलाकार के लिए एक सपने के सच होने जैसा था, जिसे अमिताभ बच्चन ने अपनी मेहनत से सच कर दिखाया।



















