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नल्लामाला के जंगलों में ओखली में बिना सहारे टिकता है मूसल, श्रीशैलम के मल्लम्मा कन्नेरु की अनोखी परंपराधर्म
15 अग॰ 2026, 11:54 am (3 घंटे पहले)· 2

नल्लामाला के जंगलों में ओखली में बिना सहारे टिकता है मूसल, श्रीशैलम के मल्लम्मा कन्नेरु की अनोखी परंपरा

श्रीशैलम के घने नल्लामाला जंगलों में स्थित मल्लम्मा कन्नेरु में ओखली पर बिना किसी सहारे के मूसल खड़ा करने की सदियों पुरानी धार्मिक परंपरा श्रद्धालुओं के बीच गहरी आस्था का केंद्र बनी हुई है।

दक्षिण भारत में भगवान शिव के प्रसिद्ध तीर्थ स्थल श्रीशैलम के पास नल्लामाला के घने जंगलों में एक बेहद अनोखा धार्मिक स्थल स्थित है, जिसे मल्लम्मा कन्नेरु के नाम से जाना जाता है। इन दिनों यह पावन स्थल देश भर से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। यहाँ आने वाले शिवभक्त एक अनोखी धार्मिक परंपरा को निभाते हैं, जिसमें ओखली के ठीक बीच में एक भारी मूसल को बिना किसी सहारा या तकनीक के बिल्कुल सीधा खड़ा किया जाता है। माना जाता है कि जो भक्त इस मूसल को संतुलित करने में सफल हो जाता है, उसकी मनोकामनाएं जल्द ही पूरी हो जाती हैं।

14वीं शताब्दी की महान शिव भक्त की पावन गाथा

इस पवित्र स्थान का ऐतिहासिक और धार्मिक संबंध 14वीं शताब्दी की महान शिव भक्त हेमारेड्डी मल्लम्मा से गहराई से जुड़ा हुआ है। आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के रायलसीमा और आसपास के क्षेत्रों में मल्लम्मा की अनन्य भक्ति की लोककथाएं घर-घर में प्रचलित हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब मल्लम्मा भगवान मल्लिकार्जुन स्वामी की कठोर तपस्या में लीन थीं, तब उनकी आंखों से बहे आंसुओं के कारण ही यहाँ जल का एक पवित्र स्रोत प्रकट हुआ था। स्थानीय भाषा में 'कन्नेरु' का शाब्दिक अर्थ 'आंसू' होता है, इसी वजह से इस जगह का नाम मल्लम्मा कन्नेरु पड़ा। श्रद्धालु यहाँ पहुँचकर मल्लम्मा की ऐतिहासिक ओखली और मूसल के सामने नतमस्तक होते हैं और विशेष पूजा-अर्चना करते हैं।

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ओखली में मूसल खड़ा करने का अनूठा अनुष्ठान

मल्लम्मा कन्नेरु आने वाले तीर्थयात्रियों के लिए मूसल को संतुलित करना सिर्फ एक खेल या चुनौती नहीं, बल्कि अत्यंत पवित्र अनुष्ठान है। भक्त अपने मन में अपनी इच्छा और प्रार्थना लेकर भगवान शिव तथा माता मल्लम्मा का ध्यान करते हैं। इसके बाद वे सावधानीपूर्वक मूसल को ओखली के केंद्र में खड़ा करने का प्रयास करते हैं। श्रद्धालुओं का यह दृढ़ विश्वास है कि यदि मूसल बिना किसी भौतिक सहारे के अपने आप सीधा टिका रह जाए, तो इसका अर्थ है कि ईश्वर ने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली है। तेलंगाना के महबूबनगर, नागरकुरनूल, हैदराबाद और रंगारेड्डी जिलों से श्रीशैलम आने वाले श्रद्धालु मल्लिकार्जुन स्वामी के दर्शन के उपरांत मल्लम्मा कन्नेरु जाकर इस अनुष्ठान को पूरा करना अपनी यात्रा का अनिवार्य अंग मानते हैं।

भौतिक विज्ञान का संतुलन या ईश्वर की अटूट कृपा

इस अद्भुत दृश्य को देखने के बाद जहाँ श्रद्धालु इसे माता मल्लम्मा की दिव्य शक्ति मानते हैं, वहीं वैज्ञानिक दृष्टिकोण से इसे भौतिक विज्ञान का एक सुंदर प्रदर्शन कहा जा सकता है। विज्ञान के सिद्धांतों के अनुसार, यह घटना गुरुत्वाकर्षण (ग्रेविटी) और वस्तु के केंद्र संतुलन (सेंटर ऑफ ग्रेविटी) के संतुलन का एक सटीक उदाहरण है। सही कोण और वजन के वितरण से वस्तु स्थिर खड़ी रह सकती है। फिर भी, इस वैज्ञानिक तर्क से परे, हर साल यहाँ पहुँचने वाले हजारों श्रद्धालुओं के लिए यह शुद्ध रूप से आस्था, निष्ठा और भगवान शिव का दिव्य आशीर्वाद ही है।

सवाल-जवाब

श्रीशैलम का मल्लम्मा कन्नेरु कहाँ स्थित है?
मल्लम्मा कन्नेरु तेलंगाना सीमा से सटे दक्षिण भारत के प्रसिद्ध धार्मिक स्थल श्रीशैलम में नल्लामाला के घने जंगलों के बीच स्थित है।
मल्लम्मा कन्नेरु में कौन सी अनोखी धार्मिक परंपरा निभाई जाती है?
यहाँ श्रद्धालु मनोकामना पूर्ति के लिए ओखली के ठीक बीच में मूसल को बिना किसी भौतिक सहारे के बिल्कुल सीधा खड़ा करने का प्रयास करते हैं।
मल्लम्मा कन्नेरु का इतिहास किस महान भक्त से जुड़ा है?
इस पवित्र स्थान का संबंध 14वीं शताब्दी की महान शिव भक्त हेमारेड्डी मल्लम्मा से है, जिनकी कठिन तपस्या के दौरान आंसुओं से जल स्रोत प्रकट होने की मान्यता है।
ओखली में मूसल खड़ा होने के पीछे विज्ञान क्या कहता है?
भौतिक विज्ञान के अनुसार यह घटना गुरुत्वाकर्षण (ग्रेविटी) और वस्तु के केंद्र संतुलन (सेंटर ऑफ ग्रेविटी) के संतुलन का सटीक उदाहरण है।
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