भारतीय मनोरंजन जगत में अपने सशक्त अभिनय और यादगार किरदारों के जरिए खास मुकाम हासिल करने वाली अभिनेत्री सुधा चंद्रन एक बार फिर बिल्कुल नए अवतार में दर्शकों से रूबरू होने जा रही हैं। लंबे समय तक छोटे पर्दे पर रौबदार और ग्रे शेड वाले किरदारों से दर्शकों को बांधने के बाद, वह अब डिजिटल प्लेटफॉर्म के उभरते फॉर्मेट माइक्रो-ड्रामा की दुनिया में कदम रख चुकी हैं। उनके नए प्रोजेक्ट का नाम 'हिसाब बराबर' है, जिसमें वह आशा नाम की एक बेहद सादगी पसंद, संघर्षशील और स्वाभिमानी मां की भूमिका में दिखाई देंगी।
कहानी का मुख्य ताना-बाना एक ऐसी मां के इर्द-गिर्द बुना गया है, जिसने अपने बेटे को एक बेहतर भविष्य देने के लिए अपनी पूरी जिंदगी न्योछावर कर दी। वर्षों की कड़ी मेहनत, अनगिनत रातों का जागरण और हर संभव त्याग के बाद जब उसका बेटा बड़ा होकर देश के सबसे बड़े और प्रभावशाली उद्योगपतियों की कतार में खड़ा हो जाता है, तो रिश्तों की तस्वीर बदल जाती है। कामयाबी के नशे में चूर बेटा और उसका समाज मां के साधारण रहन-सहन और पहनावे के आधार पर उसे कम आंकने लगता है। अपनी ही संतान और उसके रसूखदार माहौल से मिलने वाले तिरस्कार के बीच, आशा अपने आत्मसम्मान से कोई समझौता नहीं करती। यह शो त्याग, ममता, सामाजिक पूर्वाग्रह और आत्मसम्मान के गहरे द्वंद्व को सामने लाता है।
टेलीविजन और सिनेमा से कितना अलग है माइक्रो-ड्रामा का अनुभव
पारंपरिक धारावाहिकों, फिल्मों और डिजिटल वेब स्पेस में लंबा सफर तय करने के बाद माइक्रो-ड्रामा के मंच पर काम करने को लेकर सुधा चंद्रन ने इस माध्यम की बारीकियों पर चर्चा की। उन्होंने स्पष्ट किया कि टेलीविजन और माइक्रो-ड्रामा के बीच काम करने की गति और तकनीकी सटीकता सबसे बड़ा अंतर पैदा करती है। टीवी सीरियलों में किसी भी कलाकार को एक चरित्र के भीतर लंबे समय तक रमे रहने, महीनों तक उसके विभिन्न आयामों को धीरे-धीरे तलाशने और दर्शकों के बीच स्थापित करने की पूरी छूट मिलती है। इसी तरह बड़े पर्दे के सिनेमा में भी हर सीन की बुनावट और किरदार के भावनात्मक विकास के लिए निर्देशक के पास पर्याप्त समय होता है।
इसके विपरीत, माइक्रो-ड्रामा में कहानी कहने का दायरा बहुत संकुचित लेकिन बेहद तेज रफ्तार होता है। इस फॉर्मेट में हर दृश्य, हर संवाद और चेहरे के हर भाव को बेहद सधा हुआ और प्रभावकारी होना पड़ता है। कलाकार के पास अपनी बात रखने, भावनात्मक गहराइयों को छूने और दर्शकों के दिल में उतरने के लिए चंद पलों का समय होता है। कहानी में कोई भी अतिरिक्त या ढीला तत्व बर्दाश्त नहीं किया जा सकता, क्योंकि समय की पाबंदी इसे बेहद चुनौतीपूर्ण और साथ ही रोमांचकारी बना देती है।
अपनी मां के साथ के रिश्ते ने दी किरदार को भावनात्मक गहराई
'हिसाब बराबर' की आशा अपने बच्चे के उज्ज्वल कल के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा देती है। इस किरदार की रूह में उतरने के लिए सुधा चंद्रन ने अपनी निजी जिंदगी और अपनी मां के साथ के अटूट रिश्ते से प्रेरणा ली। उनका कहना है कि जब कोई भी कलाकार किसी किरदार के भावनात्मक मर्म को छूने की कोशिश करता है, तो उसके व्यक्तिगत जीवन के खट्टे-मीठे अनुभव अनजाने में ही उसके काम में शामिल हो जाते हैं।
उनकी मां ने उनके जीवन में जो बेपनाह योगदान दिया, उसने उन्हें हमेशा कठिन से कठिन परिस्थितियों में चट्टान की तरह डटे रहने का हौसला दिया। निस्वार्थ प्रेम, असीम त्याग और विकट हालातों से लड़ने का हुनर उन्होंने अपनी मां से ही सीखा है। आशा के किरदार में भी यही भावनाएं कूट-कूट कर भरी हैं, जो अपने बच्चे की खुशियों के लिए हंसते-हंसते हर दर्द सह लेती है। सुधा चंद्रन ने बताया कि मां के साथ बिताए गए उन भावनात्मक पलों और यादों ने उन्हें पर्दे पर आशा के भीतर छिपे दर्द, उसकी अगाध ममता और उसके स्वाभिमान को पूरी प्रामाणिकता के साथ साकार करने में काफी मदद पहुंचाई।
हैसियत और पहनावे के आधार पर जज किए जाने का असल जिंदगी में सामना
शो की पटकथा में आशा को उसकी साधारण वेशभूषा और सामान्य आर्थिक स्थिति के आधार पर समाज द्वारा कमतर आंका जाता है। वास्तविक जीवन में भी सुधा चंद्रन को कई मौकों पर लोगों के पूर्वाग्रहों और जजमेंटल रवैये का सामना करना पड़ा है। उन्होंने इस बात को स्वीकार किया कि उनके करियर और निजी जिंदगी में कई ऐसे दौर आए जब लोगों ने उनकी क्षमता पर सवाल उठाए।
उन्होंने अपनी प्रसिद्ध फिल्म 'मयूरी' के दिनों को याद करते हुए साझा किया कि विकट परिस्थितियां कभी किसी इंसान का आने वाला कल तय नहीं कर सकतीं। नेशनल अवॉर्ड हासिल करने जैसी बड़ी उपलब्धि के बाद भी उनके करियर में एक ऐसा मुश्किल वक्त आया था, जब सालों तक उनके हाथ में कोई काम नहीं था। ऐसे समय में अक्सर बाहरी दुनिया किसी व्यक्ति को उसकी वर्तमान स्थिति, ढलती उम्र या पहले से बनी छवि के तराजू में तौलने लगती है। सुधा चंद्रन का मानना है कि किसी भी कलाकार या महिला का सफर उसकी उम्र या तात्कालिक हालातों की वजह से सीमित नहीं किया जाना चाहिए। जब उन्होंने बाद में 'रमोला सिकंद' का बोल्ड और निगेटिव किरदार निभाया, तो पूरी इंडस्ट्री और दर्शकों का उन्हें देखने का दृष्टिकोण एकाएक बदल गया।
सकारात्मक से लेकर खौफनाक किरदारों तक, हर सांचे में ढलने का हुनर
टीवी के दर्शक सुधा चंद्रन को 'रमोला सिकंद' जैसे प्रभावशाली, तीखे और दबंग खलनायिका के किरदार के लिए आज भी याद करते हैं। ऐसे में 'हिसाब बराबर' में एक सीधी-साधी, अपमान की शिकार लेकिन स्वाभिमानी मां की भूमिका निभाना उनके अभिनय की विविधता को दर्शाता है। जब उनसे पूछा गया कि वह इतने विपरीत स्वभाव वाले किरदारों को इतनी सहजता से कैसे संभाल लेती हैं, तो उन्होंने बताया कि एक कलाकार के रूप में उन्होंने कभी खुद को किसी तयशुदा फॉर्मूले या सीमित दायरे में कैद नहीं किया।
अगर वह 'मयूरी' की अपार सफलता के बाद खुद को सिर्फ उसी तरह की भावनात्मक और सकारात्मक भूमिकाओं तक सीमित कर लेतीं, तो शायद उनका करियर इतना लंबा और विविधतापूर्ण नहीं हो पाता। उन्होंने अपने करियर में भावनात्मक, सकारात्मक, खलनायकी और कॉमेडी जैसे हर मिजाज के किरदारों को अपनाया। 'मयूरी' के बाद जब उन्होंने 'रमोला सिकंद' का रूप धरा, तो वह लोगों की उम्मीदों से बिल्कुल परे था। इसके बाद उन्होंने 'नागिन' सीरियल में 'यामिनी' के अनोखे और नाटकीय अंदाज को पेश किया। अब 'हिसाब बराबर' में आशा के रूप में वह एक बेहद लाचार, लेकिन भीतर से मजबूत और स्वाभिमानी मां के रूप में नई मिसाल पेश कर रही हैं। उनका स्पष्ट मानना है कि बदलाव और नया रूप तभी स्वाभाविक लगता है जब कोई कलाकार हमेशा सीखने और खुद को नया आयाम देने के लिए पूरी तरह खुला रहे।
बदलते दौर में नए फॉर्मेट्स को अपनाना क्यों है जरूरी
आज के डिजिटल युग में स्थापित कलाकारों द्वारा माइक्रो-ड्रामा जैसे नए फॉर्मेट्स को अपनाने के सवाल पर सुधा चंद्रन ने जोर देकर कहा कि समय की मांग के साथ खुद को बदलना और नए माध्यमों का स्वागत करना हर कलाकार के अस्तित्व के लिए अनिवार्य है। मौजूदा दौर में दर्शकों के पास मनोरंजन के बेशुमार विकल्प मौजूद हैं, इसलिए कहानी कहने की कला को भी पहले से कहीं अधिक चुस्त, पैना और सीधा होना चाहिए।
उनका यह भी मानना है कि जिस दिन कोई कलाकार यह मान लेता है कि उसने सब कुछ सीख लिया है और उसे किसी नई चीज की जरूरत नहीं है, उसी दिन उसकी रचनात्मक तरक्की का रास्ता बंद हो जाता है। नई पीढ़ी के साथ कदमताल मिलाने और उभरते हुए डिजिटल फॉर्मेट्स के साथ काम करने से ही कोई भी कलाकार हर दौर में प्रासंगिक बना रह सकता है।



















