श्रावण मास के दौरान जहां देश भर से लाखों श्रद्धालु उत्तराखंड के प्रसिद्ध केदारनाथ और बद्रीनाथ धाम की कठिन यात्रा पर निकलते हैं, वहीं राजस्थान के सिरोही जिले में स्थित माउंट आबू की अरावली पहाड़ियों में भी एक ऐसा ही पवित्र स्थल स्थापित है। इसे स्थानीय स्तर पर अरावली का 'उत्तराखंड' कहा जाता है। इन दिनों यहां स्थित प्राचीन केदारनाथ और बद्रीनाथ मंदिरों के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं का भारी हुजूम उमड़ रहा है। हर दिन लगभग 500 से 800 भक्त 4 किलोमीटर लंबे बेहद कठिन और पथरीले पैदल मार्ग को पार करके इस पवित्र धाम तक पहुंच रहे हैं।
गुरुशिखर से शुरू होती है कठिन पैदल यात्रा
इस पवित्र तीर्थस्थल तक पहुंचने के लिए कोई भी पक्का सड़क मार्ग या वाहन सेवा उपलब्ध नहीं है। श्रद्धालुओं को अपनी यात्रा राजस्थान की सबसे ऊंची पर्वत चोटी गुरुशिखर से शुरू करनी पड़ती है, जो माउंट आबू से लगभग 12 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। गुरुशिखर पहुंचने के बाद भक्तों को लगभग 4 किलोमीटर की तीखी ढलान और पथरीले संकरे रास्तों से होकर पैदल नीचे उतरना पड़ता है। रास्ते की इस अत्यधिक दुर्गमता और कठिनाई के बावजूद श्रद्धालुओं की श्रद्धा में कोई कमी देखने को नहीं मिलती। पुरुषों के साथ-साथ बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग भी उत्साहपूर्वक इस पैदल यात्रा को पूरा कर रहे हैं। सिरोही जिले के स्थानीय निवासियों के अलावा पाली, जालोर, उदयपुर और पड़ोसी राज्य गुजरात से भी बड़ी संख्या में भक्त यहां दर्शन के लिए पहुंच रहे हैं।
उतराज गांव के पास स्थित प्राचीन गुफा और बद्रीनारायण मंदिर
स्थानीय नागरिक नीरज रावल के अनुसार, ये दोनों प्रमुख मंदिर गुरुशिखर के समीप बसे उतराज गांव के निकट निर्मित हैं। जनमान्यता है कि अरावली की इन पहाड़ियों में स्थित केदारनाथ और बद्रीनाथ धाम के दर्शन करने से श्रद्धालुओं को उत्तराखंड स्थित मूल धामों के दर्शन जितना ही धार्मिक पुण्य प्राप्त होता है। यहां स्थापित केदारनाथ मंदिर के ठीक पास एक अति प्राचीन गुफा विद्यमान है, जिसमें साधु-संत निवास करते हैं और तपस्या करते हैं। इस मंदिर के दर्शन के बाद श्रद्धालु उतराज गांव से होकर आगे बढ़ते हैं और बद्रीनारायण मंदिर पहुंचते हैं। इस मंदिर में भगवान बद्रीनाथ के साथ-साथ भगवान विष्णु की दिव्य और आकर्षक प्रतिमा स्थापित है।
प्रकृति प्रेमियों और ट्रेकर्स के लिए विशेष आकर्षण
मानसून के आगमन के साथ ही अरावली की यह पूरी घाटी प्राकृतिक सौंदर्य से सराबोर हो जाती है। घने बादलों की धुंधली परतें, पहाड़ों से बहते कल-कल झरने और हरी-भरी पर्वत शृंखलाएं इस पूरे क्षेत्र को किसी सुरम्य स्थल में बदल देती हैं। यही कारण है कि धार्मिक श्रद्धालुओं के साथ-साथ प्रकृति प्रेमी और ट्रेकिंग के शौकीन युवा भी मानसून में इस स्थान की ओर खींचे चले आते हैं।
सुरक्षा के कड़े नियम और शाम 5 बजे के बाद पाबंदी
हालांकि, यह पूरा क्षेत्र अत्यंत घने संरक्षित वन क्षेत्र के अंतर्गत आता है। रात के समय इस इलाके में हिंसक जंगली जानवरों की आवाजाही बढ़ जाती है, जिससे श्रद्धालुओं के लिए खतरा पैदा हो सकता है। इसके अलावा घने जंगल और धुंध के कारण शाम के समय रास्ता भटकने की भी प्रबल संभावना रहती है। इन्हीं सुरक्षा कारणों को ध्यान में रखते हुए प्रशासन और वन विभाग द्वारा शाम 5 बजे के बाद इस पैदल मार्ग पर श्रद्धालुओं और पर्यटकों की आवाजाही पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया गया है।


















