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पद्मिनी कोल्हापुरे के इस अमर गाने की धुन तय करने में लगे थे पूरे 7 दिन, जानें लता मंगेशकर के आइकॉनिक गीत का दिलचस्प इतिहासमनोरंजन
30 अग॰ 2026, 4:45 pm (2 घंटे पहले)· 2

पद्मिनी कोल्हापुरे के इस अमर गाने की धुन तय करने में लगे थे पूरे 7 दिन, जानें लता मंगेशकर के आइकॉनिक गीत का दिलचस्प इतिहास

फिल्म प्रेम रोग का सुपरहिट गाना 'ये गलियां ये चौबारा' आज भी लोगों की जुबान पर है। इसे तैयार करने में संगीतकारों को सात दिन लगे थे और इसके पीछे एक अनोखा किस्सा जुड़ा है।

कुछ गीत समय के बंधन से परे होते हैं और पीढ़ियों का सफर तय करते हुए हमेशा के लिए अमर हो जाते हैं। ऐसे ही शाश्वत और कालजयी गीत पर्दे पर काम करने वाले कलाकारों के साथ-साथ उन फिल्मों को भी हमेशा के लिए जीवंत बना देते हैं। आज से चार दशक पहले अभिनेत्री पद्मिनी कोल्हापुरे पर फिल्माया गया एक ऐसा ही गीत आज भी देश के हर कोने में होने वाले शादी-विवाह के आयोजनों, हल्दी और मेहंदी की रस्मों में खास तौर पर गूंजता सुनाई देता है। उस दौर की इस ऐतिहासिक धुन को दिग्गज संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने अपने संगीत से सजाया था, जबकि अपनी जादुई आवाज से इसे हमेशा के लिए अमर बनाने का काम स्वर कोकिला लता मंगेशकर ने किया था। इस लोकप्रिय गीत के बोल प्रसिद्ध गीतकार संतोष आनंद ने रचे थे। इस बात का खुलासा खुद संतोष आनंद ने अपने एक पुराने साक्षात्कार में किया था कि इस धुन को तैयार करने में संगीतकारों को पूरे सात दिन का समय लग गया था।

प्रेम रोग फिल्म का सफर और यादगार संगीत

राज कपूर के निर्देशन और प्रोडक्शन में बनी फिल्म 'प्रेम रोग' एक म्यूजिकल रोमांटिक ड्रामा थी, जो सिनेमाघरों में 30 जुलाई 1982 को रिलीज हुई थी। इस फिल्म में मुख्य भूमिकाएं ऋषि कपूर और पद्मिनी कोल्हापुरे ने निभाई थीं, जबकि इसकी पटकथा जैनेंद्र जैन और कामना चंद्रा ने मिलकर तैयार की थी। फिल्म का संगीत लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने दिया था और इसमें कुल तीन गीतकार संतोष आनंद, पंडित नारायण शर्मा और अमीर कजलबाश शामिल थे। पंडित नारायण शर्मा ने 'भंवरे ने खिलाया फूल फूल को ले गया राजकुमार' लिखा था, तो वहीं अमीर कजलबाश ने 'मेरी किस्मत में तू नहीं शायद' के बोल लिखे थे। हालांकि इस फिल्म का प्रत्येक गीत अपने आप में सुपरहिट साबित हुआ, लेकिन 'ये गलियां ये चौबारा, यहां आना ना दोबारा' की लोकप्रियता सबसे अलग रही।

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गीतकार संतोष आनंद की प्रेरणा और गाने की रचना

करीब 08:47 मिनट लंबे इस लोकप्रिय गीत की धुन को अंतिम रूप देने में लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल को पूरे सात दिन की मेहनत करनी पड़ी थी। गीतकार संतोष आनंद ने एक इंटरव्यू में इस गाने के पीछे की पूरी कहानी साझा करते हुए बताया था कि राज कपूर बेहद गुणी व्यक्ति थे और वे सभी कलाकारों का बहुत सम्मान करते थे। फिल्म 'प्रेम रोग' के सिलसिले में संतोष आनंद मुंबई गए थे, लेकिन वहां से वे बिना बताए फ्लाइट पकड़कर चौबीस घंटे के भीतर ही दिल्ली वापस लौट आए थे। उनके इतनी जल्दी घर वापस लौटने पर उनकी पत्नी बेहद चकित रह गईं। उन्होंने अपनी बेटी शैली के बारे में पूछा, जो उन दिनों काफी छोटी थी और सो रही थी। संतोष आनंद ने अपनी सोती हुई बेटी को गोद में उठाया और उसके बड़े होने तथा उसकी शादी के आने वाले दिनों का सपना देखने लगे। उन्हें फिल्म की पूरी स्थिति और भावना का अंदाजा पहले से ही था।

बेटी के स्नेह से उपजे गीत के बोल

'एक प्यार का नगमा है' जैसे अनगिनत लोकप्रिय गीत रचने वाले संतोष आनंद ने आगे बताया कि अपनी बेटी के विवाह के भावुक क्षणों और विचारों में आकर ही उन्होंने 'ये गलियां ये चौबारा' के शब्दों को पिरोया था। उन्होंने गाना तो लिख लिया था, लेकिन वे राज कपूर को बिना सूचना दिए मुंबई से दिल्ली आ चुके थे, जिसके चलते अगले ही दिन राज कपूर भी शूटिंग बीच में छोड़कर दिल्ली पहुंच गए। इसके बाद राज कपूर ने उन्हें मिलने के लिए होटल में बुलाया, जहां उन्होंने वह गीत उन्हें दिखाया। राज कपूर को वह रचना बेहद पसंद आई और इसके बाद वे सब वापस मुंबई लौटे। वहां पहुंचकर राज कपूर ने संगीतकार लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल को बुलाया और इस गीत की धुन को तैयार करने का सिलसिला शुरू हुआ, जिसमें पूरे सात दिन का समय लगा।

फिल्मफेयर पुरस्कार और अन्य सुपरहिट गाने

संतोष आनंद को इसी फिल्म के एक अन्य गीत 'मोहब्बत है क्या चीज' के लिए सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फिल्मफेयर पुरस्कार भी मिला था। इस गाने के पीछे भी एक दिलचस्प कहानी जुड़ी हुई थी। गीतकार ने अपने साक्षात्कार में जिक्र किया था कि उन दिनों 'मोहब्बत अब तिजारत बन गई है' फिल्म 'अर्पण' का गाना काफी लोकप्रिय था और वे भी उसी से मिलते-जुलते अंदाज में गीत लिखा करते थे। इसी पृष्ठभूमि में उन्होंने 'प्रेम रोग' के लिए यह गाना लिखा था, जिसे लता मंगेशकर और अनवर ने अपनी आवाज दी थी। कुल मिलाकर 'प्रेम रोग' ने उस साल चार फिल्मफेयर पुरस्कार अपने नाम किए थे, जिसमें राज कपूर को सर्वश्रेष्ठ निर्देशक, पद्मिनी कोल्हापुरे को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री और राज कपूर को ही सर्वश्रेष्ठ संपादन का पुरस्कार मिला था।

बॉक्स ऑफिस पर फिल्म का प्रदर्शन और सफलता

सिनेमाघरों में आने से ठीक पहले ऋषि कपूर और पद्मिनी कोल्हापुरे की फिल्म 'जमाने को दिखाना है' बॉक्स ऑफिस पर असफल हो गई थी, जिसके कारण राज कपूर को मजबूरन 'प्रेम रोग' को कम कीमत पर बेचना पड़ा था। इस फिल्म को सिनेमाघरों में 85 प्रतिशत की बंपर ओपनिंग मिली थी। इसका कुल बजट पौने तीन करोड़ रुपये था और इसने 6.5 करोड़ रुपये का नेट कलेक्शन किया था। बॉक्स ऑफिस के आंकड़ों के लिहाज से यह फिल्म एक सुपरहिट साबित हुई और साल 1982 की सबसे अधिक कमाई करने वाली फिल्मों की सूची में दूसरे पायदान पर रही थी। इस सूची में पहले स्थान पर सुभाष घई की फिल्म 'विधाता' थी, और यह भी एक रोचक संयोग था कि अभिनेत्री पद्मिनी कोल्हापुरे उन दोनों ही सुपरहिट फिल्मों में मुख्य नायिका के रूप में नजर आई थीं।

सवाल-जवाब

फिल्म 'प्रेम रोग' कब रिलीज हुई थी?
फिल्म 'प्रेम रोग' 30 जुलाई 1982 को रिलीज हुई थी।
'ये गलियां ये चौबारा' गाने की धुन बनाने में कितने दिन लगे थे?
इस गाने की धुन तैयार करने में संगीतकार लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल को पूरे सात दिन लगे थे।
इस प्रसिद्ध गीत के गीतकार कौन थे?
इस गीत को प्रसिद्ध गीतकार संतोष आनंद ने लिखा था।
फिल्म 'प्रेम रोग' के निर्देशक कौन थे?
फिल्म 'प्रेम रोग' का निर्देशन राज कपूर ने किया था।
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