मिर्जापुर: द मूवी में बीना त्रिपाठी के रूप में दोबारा दर्शकों के सामने आ रहीं रसिका दुग्गल ने अपने करियर के सबसे चर्चित किरदार और अभिनय के सफर पर खुलकर राय रखी है। बीना भाभी के रोल को लेकर उनका मानना है कि यह किरदार मूल रूप से हर परिस्थिति में खुद को बचाए रखने वाले एक सर्वाइवर का है। बीना बखूबी जानती है कि उसकी कमजोरियां क्या हैं और किस तरह अपनी इन्हीं कमजोरियों को वक्त आने पर अपने फायदे के लिए औजार बनाना है। फिल्म के जरिए दर्शक यह गहराई से समझ पाएंगे कि बीना भाभी आखिरकार उस मुकाम तक कैसे पहुंचीं। कहानी के आगे बढ़ने के साथ उसके पूरे जीवन, परिस्थितियों और उसके कड़े नजरिए को एक मुकम्मल संदर्भ मिलता है।
स्टीरियोटाइप के दबाव से कैसे बचीं अभिनेत्री
जब एक कलाकार किसी खास रोल में जबरदस्त लोकप्रियता हासिल करता है तो अक्सर उस पर एक ही सांचे में ढलने का खतरा मंडराने लगता है। जब उनसे पूछा गया कि क्या मिर्जापुर, मंटो, दिल्ली क्राइम और शेखर होम जैसे विविध प्रोजेक्ट्स के बावजूद बीना की अपार शोहरत के बाद उन पर टाइपकास्ट होने का कोई दबाव था या उन्होंने जानबूझकर ऐसी छवि से दूरी बनाने की कोशिश की, तो उन्होंने इसका बेहद व्यावहारिक जवाब दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि करियर में रिलीज का समय उनके पक्ष में रहा। मंटो मिर्जापुर से ठीक पहले सामने आई थी, जबकि दिल्ली क्राइम का प्रदर्शन मिर्जापुर के तुरंत बाद हुआ।
इन दोनों ही प्रस्तुतियों में उनका शारीरिक रूप, बाहरी पहनावा और भीतरी चरित्र बीना के व्यक्तित्व से पूरी तरह उलट था। इसी स्वाभाविक भिन्नता की वजह से वे किसी एक तय सांचे में बंधने से सुरक्षित रह सकीं। इन सभी किरदारों में अभिनय की जो व्यापक विविधता थी, उसने उन्हें नए आयाम तलाशने और दर्शकों के सामने अपनी अलग पहचान साबित करने का शानदार अवसर उपलब्ध कराया।
बीना का दायरा और सफिया के किरदार की अहमियत
बीना के किरदार ने उन्हें भारी शोहरत, विशाल दर्शक वर्ग और बॉक्स ऑफिस पर बड़ी सफलता दी। इसके समानांतर वे मंटो में निभाए सफिया के किरदार को भी अपने दिल के बेहद करीब और बेहद महत्वपूर्ण मानती हैं। उनका विश्लेषण है कि मंटो भले ही एक ख्यातिप्राप्त लेखक की जिंदगी पर केंद्रित थी, लेकिन निर्देशक ने लेखक की गाथा कहते हुए उनकी पत्नी के संघर्षों और अस्तित्व को कतई नजरअंदाज नहीं किया।
नंदिता दास जैसी संवेदनशील निर्देशक की यही स्पष्ट सोच थी। उनके साथ काम करने वाले प्रतिभाशाली और संवेदनशील साथी कलाकारों ने भी सफिया को कभी एक दोयम दर्जे का पात्र नहीं समझा। एक समाज के तौर पर अक्सर पुरुषों की दास्तानें याद रह जाती हैं और महिलाओं की कहानियां बिसरा दी जाती हैं, मगर सफिया के हिस्से को परदे पर बहुत नफासत और गरिमा के साथ उकेरा गया।

















