सिनेमा की दुनिया जितनी चकाचौंध से भरी दिखती है, कलाकारों के लिए उसका शुरुआती रास्ता अक्सर उतना ही पथरीला होता है। आज अभिनय के दम पर अपनी एक अलग पहचान कायम कर चुकीं विद्या बालन के सफर में भी एक ऐसा दौर आया था, जब उन्हें लगातार नाकामी और खारिज किए जाने की मार झेलनी पड़ी थी। करियर के उस नाजुक मोड़ पर कुछ अनचाहे हालातों के चलते उन्हें अपशकुन मान लिया गया और बिना काम देखे ही एक के बाद एक कई प्रोजेक्ट्स से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था। उस कड़वे अनुभव ने उन्हें लंबे अरसे तक गैर-हिंदी सिनेमा से दूर रखा। मगर अब वक्त का पहिया ऐसा घूमा है कि वही अभिनेत्री तमिल सिनेमा के सबसे बड़े चेहरे रजनीकांत के सामने एक खूंखार और ताकतवर किरदार में ताल ठोक रही हैं।
शुरुआती दिनों का अंधविश्वास और लगातर रिजेक्शन का दर्द
अभिनय की दुनिया में कदम रखते हुए विद्या बालन ने दक्षिण भारतीय सिनेमा का रुख किया था, लेकिन वहां किस्मत ने उनका साथ नहीं दिया। मलयालम भाषा की फिल्म 'चक्रम' में उन्हें दिग्गज अभिनेता मोहनलाल के साथ काम करने का मौका मिला था। इस बड़े प्रोजेक्ट को लेकर उम्मीदें बहुत ज्यादा थीं, मगर किसी वजह से यह फिल्म निर्माण के बीच में ही बंद हो गई। फिल्म के रुकते ही फिल्म जगत के कुछ हलकों में बेबुनियाद अंधविश्वास जोर पकड़ने लगा। लोगों ने इस असफलता का ठीकरा अभिनेत्री के सिर फोड़ दिया और उन्हें फिल्मों के लिए 'पनौती' व 'मनहूस' तक कहा जाने लगा। निर्माताओं को लगने लगा कि उनके जुड़ने से फिल्में सफल नहीं हो पाएंगी।
इस निराधार सोच का खामियाजा उन्हें भारी नुकसान के साथ चुकाना पड़ा। लगभग एक दर्जन से ज्यादा प्रोजेक्ट्स ऐसे रहे, जिनमें चयन होने के बावजूद उन्हें अचानक बाहर कर दिया गया। तमिल सिनेमा के गलियारों में भी उन्हें इसी तरह के कड़वे अनुभवों से गुजरना पड़ा। अभिनेता आर माधवन के साथ बनने वाली फिल्म 'रन' और श्रीकांत के साथ 'मनसेल्लम' जैसे प्रोजेक्ट्स उनके हाथ से फिसल गए। कई मौकों पर तो सेट पर शूटिंग शुरू होने से चंद रोज पहले ही निर्माताओं ने उनकी जगह दूसरी अभिनेत्रियों को साइन कर लिया। इस लगातार अपमान और रिजेक्शन ने उन्हें मानसिक तौर पर भीतर से तोड़ दिया था। इसी डर और झिझक की वजह से उन्होंने लंबे वक्त तक हिंदी सिनेमा के दायरे से बाहर कदम रखने का विचार ही छोड़ दिया था। हालांकि उम्र और अनुभव के साथ अब उनका मानना है कि वह सब केवल वक्त और विपरीत परिस्थितियों का दौर था।
'परिणीता' की सीधी-सादी ललिता से 'जेलर 2' की कांथा तक
साल 2005 में प्रदर्शित हुई फिल्म 'परिणीता' से विद्या बालन ने हिंदी सिनेमा में धमाकेदार दस्तक दी और दर्शकों के साथ-साथ समीक्षकों का दिल जीत लिया। इसके बाद उन्होंने एक से बढ़कर एक संजीदा किरदार निभाए। अब निर्देशक नेल्सन दिलीपकुमार की एक्शन थ्रिलर फिल्म 'जेलर 2' के जरिए वे तमिल सिनेमा में अपनी धमाकेदार पारी खेल रही हैं। इस फिल्म में वे 'कांथा' नाम की एक खतरनाक महिला का रोल निभा रही हैं, जो कहानी में मुख्य विरोधी पक्ष का सबसे मजबूत चेहरा है। परदे पर सुपरस्टार रजनीकांत के साथ आमना-सामना होना उनके करियर का एक बेहद खास पड़ाव बन गया है।
इससे पहले भी विद्या बालन को रजनीकांत की एक फिल्म में काम करने का प्रस्ताव मिला था। उस समय उनकी किसी दूसरी फिल्म की शूटिंग की तारीखों का टकराव हो रहा था, जिसकी वजह से वे उस प्रोजेक्ट का हिस्सा नहीं बन सकी थीं। जब निर्देशक नेल्सन दिलीपकुमार ने 'जेलर 2' की कहानी और कांथा का किरदार उनके सामने रखा, तो उन्होंने बिना किसी देरी के इसे स्वीकार कर लिया। रजनीकांत के साथ परदा साझा करने का अवसर उनके इस प्रोजेक्ट से जुड़ने की सबसे बड़ी प्रेरणा बना।
सुपरस्टार के सामने सिगरेट का धुआं और कांपते हाथ
'जेलर 2' में विद्या बालन का सीधा मुकाबला रजनीकांत के मशहूर किरदार 'मुथुवेल पांडियन' से देखने को मिलता है। प्रचार वीडियो में वे रजनीकांत के चेहरे के ठीक सामने सिगरेट का धुआं उड़ाते हुए बेहद आक्रामक अंदाज में नजर आती हैं। लेकिन परदे पर जितने आत्मविश्वास के साथ यह दृश्य दिखता है, कैमरे के पीछे उसे फिल्माना अभिनेत्री के लिए उतना ही चुनौतीपूर्ण था। निर्देशक मिलन लुथरिया की चर्चित फिल्म 'द डर्टी पिक्चर' के करीब 15 साल बाद उन्होंने किसी फिल्म के लिए पहली बार हाथ में सिगरेट उठाई थी।
उस लम्हे को साझा करते हुए अभिनेत्री ने बताया कि उन्हें लगता था कि सिगरेट पीना भी साइकिल चलाने जैसा हुनर है, जिसे इंसान एक बार सीखने के बाद कभी नहीं भूलता। मगर सेट पर जैसे ही निकोटीन का असर उनके शरीर पर पड़ा, उन्हें असहजता महसूस होने लगी। पहले ही टेक के दौरान, जब सामने खुद सुपरस्टार रजनीकांत खड़े थे, घबराहट और निकोटीन के प्रभाव से उनके हाथ बुरी तरह कांपने लगे। उस स्थिति में वे बेहद असहज और शर्मिंदा महसूस कर रही थीं, लेकिन रजनीकांत ने बेहद सौम्य और सहयोगी रवैया दिखाते हुए उनका हौसला बढ़ाया। इसके बाद अगले दिन उन्होंने सेट के एक कोने में बैठकर संवादों की तरह सिगरेट पकड़ने और पीने का कड़ा अभ्यास किया, ताकि दृश्य के दौरान हाथ न कांपें।
सकारात्मक किरदारों की एकरसता और ग्रे शेड्स का रोमांच
विद्या बालन का साफ मानना है कि परदे पर केवल भली, सीधी और आदर्शवादी लड़की की भूमिकाएं करते रहना किसी भी कलाकार के लिए बेहद उबाऊ हो जाता है। यही कारण है कि वे अब नकारात्मक और जटिल इंसानी स्वभाव वाले ग्रे किरदारों की तरफ आकर्षित हो रही हैं। 'जेलर 2' में कांथा का क्रूर अवतार निभाने से कुछ ही महीने पहले उन्होंने अभिनेता रितेश देशमुख की मराठी ऐतिहासिक एक्शन फिल्म 'राजा शिवाजी' में 'बड़ी बेगम' का चालबाज और कुटिल किरदार निभाया था। नकारात्मक और दबंग किरदारों में उतरना उन्हें अभिनय की दृष्टि से एक नया रोमांच दे रहा है।
कुदरत के चक्र पर अटूट विश्वास और आने वाले बड़े प्रोजेक्ट्स
अपने जीवन और करियर के उतार-चढ़ाव को देखने के बाद विद्या बालन मानती हैं कि प्रकृति हर चीज के लिए एक सही समय तय करती है। 'जेलर 2' के बाद वे निर्देशक आर बाल्की के निर्देशन में बन रही अपनी पहली एकल मुख्य भूमिका वाली तमिल फिल्म के काम में जुटी हुई हैं। यह सहयोग साल 2009 की लोकप्रिय फिल्म 'पा' के 17 साल बाद और 'मिशन मंगल' के 7 साल बाद देखने को मिल रहा है। इसके अतिरिक्त वे हिंदी सिनेमा में भी एक बड़े प्रोजेक्ट का हिस्सा बनने जा रही हैं, जहां वे अभिनेता अक्षय कुमार और निर्देशक अनीस बज्मी के साथ एक बिना नाम वाली कॉमेडी फिल्म में नजर आएंगी। रिजेक्शन से शुरू हुआ उनका यह सफर साबित करता है कि लगन के आगे अंधविश्वास की दीवारें कभी टिक नहीं सकतीं।


















