वाराणसी की सदियों पुरानी पारंपरिक गुलाबी मीनाकारी कला अब केवल स्थानीय बाजारों तक सीमित नहीं है, बल्कि त्योहारों के सीजन में वैश्विक स्तर पर अपनी खास पहचान बना रही है। आगामी रक्षाबंधन के पर्व को देखते हुए इस अनूठी कला से बनाई जाने वाली राखियों की मांग में जबरदस्त उछाल देखा जा रहा है। अमेरिका और कनाडा समेत कई अन्य विदेशी देशों से भी हुनरमंद कारीगरों के पास भारी संख्या में ऑर्डर पहुंच रहे हैं, जिससे इस पुश्तैनी काम से जुड़े स्थानीय कलाकारों को रोजगार के नए और बेहतर अवसर मिल रहे हैं।
गुलाबी मीनाकारी के जाने-माने कारीगर रोहन विश्वकर्मा ने इस बारे में जानकारी देते हुए बताया कि इस साल के रक्षाबंधन पर्व के लिए विशेष तौर पर कई नवीन डिजाइनों को अंतिम रूप दिया गया है। इन खास राखियों को शुद्ध चांदी के बेस पर पूरी तरह से हाथों के जरिए गुलाबी मीनाकारी का काम करके गढ़ा गया है। इन उत्पादों में प्राचीन पारंपरिक कला के साथ-साथ आधुनिक फैशन और ट्रेंड का एक बेहतरीन संयोजन देखने को मिलता है, ताकि लोग इन्हें केवल एक दिन के त्योहार के बाद भी आसानी से उपयोग कर सकें।
रोहन विश्वकर्मा ने आगे बताया कि इस बार कई ऐसी राखियां भी डिजाइन की गई हैं जिन्हें त्योहार बीत जाने के बाद एक स्टाइलिश ब्रेसलेट के रूप में कलाई पर पहना जा सकता है। यही मुख्य वजह है कि इन राखियों को केवल एक बार के इस्तेमाल तक सीमित रखने के बजाय लंबे समय तक उपयोग में लाया जा सकता है। चांदी के इस्तेमाल और इस पर की जाने वाली बारीक मीनाकारी के काम के कारण बाजार में इनका एक विशिष्ट स्थान है। इन विशेष राखियों की खुदरा कीमत करीब 500 रुपये से शुरू होकर 2,000 रुपये तक तय की गई है, जो मुख्य रूप से डिजाइन, चांदी के कुल वजन और नक्काशी के काम पर निर्भर करती है।
रक्षाबंधन के इन तमाम विदेशी और घरेलू ऑर्डर्स को समय पर पूरा करने के लिए पिछले करीब एक महीने से 10 से अधिक कारीगर दिन-रात लगातार मेहनत कर रहे हैं। राखियों में ग्राहकों की पसंद के मुताबिक विभिन्न प्रकार के आकर्षक रंग, खूबसूरत पैटर्न और अनोखे डिजाइन उकेरे जा रहे हैं। खासकर विदेशी खरीदारों की पसंद और उनकी प्राथमिकताओं को ध्यान में रखते हुए भी नए पैटर्न तैयार किए जा रहे हैं। मीनाकारी का यह पूरा काम अत्यधिक बारीकी और भारी धैर्य की मांग करता है। चांदी के ढांचे पर नक्काशी करने के बाद उसमें रंग भरने और उसकी शानदार फिनिशिंग देने का पूरा काम अपने हाथों से ही किया जाता है, और यही पूरी तरह हस्तनिर्मित प्रक्रिया इन कलाकृतियों को बेहद खास बनाती है।
उल्लेखनीय है कि गुलाबी मीनाकारी उत्तर प्रदेश के वाराणसी की सबसे प्रसिद्ध और प्राचीन हस्तकलाओं में शुमार की जाती है। एक ऐसा दौर भी आया था जब इस नायाब कला को खुले बाजार की कमी और नई पीढ़ी के कलाकारों के आगे न आने जैसी गंभीर चुनौतियों से जूझना पड़ा था। हालांकि, सरकारी स्तर पर इस कला को जरूरी पहचान मिलने और बेहतर बाजार से जुड़ने के बाद कारीगरों के दिन बहुरने लगे हैं। इस पारंपरिक कला को वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट यानी ODOP पहल के अंतर्गत शामिल किए जाने और इसे प्रतिष्ठित जीआई टैग मिलने से इसकी वैश्विक पहचान को बेहद मजबूती मिली है, जिससे स्थानीय हुनरबाजों को अपने उत्पादों को वैश्विक पटल तक पहुंचाने में बड़ी आसानी हुई है।
वर्तमान समय में गुलाबी मीनाकारी के खूबसूरत उत्पाद केवल वाराणसी या देश के अन्य महानगरों तक ही सीमित नहीं रह गए हैं, बल्कि समंदर पार बैठे विदेशी ग्राहकों से भी लगातार इनकी मांग आ रही है। रक्षाबंधन जैसे बड़े त्योहारों के मौके पर राखियों के ऑर्डर्स में आई इस बढ़ोतरी से स्थानीय कारीगरों को अतिरिक्त काम और अच्छी कमाई का सुनहरा मौका मिल रहा है। काशी की यह सदियों पुरानी कला जिस प्रकार पारंपरिक शिल्प में आधुनिक जीवन की जरूरतों को पिरो रही है, उससे युवा पीढ़ी के बीच भी इसके प्रति आकर्षण बढ़ने की पूरी उम्मीद है। कारीगरों के पास आ रहे ये बढ़ते ऑर्डर इस बात की एक स्पष्ट गवाही देते हैं कि यदि स्थानीय हुनर को सही और व्यापक बाजार उपलब्ध कराया जाए, तो पारंपरिक हस्तशिल्प देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी अपनी एक अलग और स्थायी छाप छोड़ सकता है।



















