बॉलीवुड में आमतौर पर प्यार, शादी और पारिवारिक रिश्तों को ही जीवन का एकमात्र उद्देश्य और सबसे बड़ी मंजिल के तौर पर परोसे जाने की लंबी परंपरा रही है। हालांकि समय के साथ सिनेमा के फलक पर कुछ ऐसी बेहतरीन और अनूठी फिल्में भी आईं जिन्होंने इस परंपरागत सोच को गहराई से चुनौती दी। इन फिल्मों ने दर्शकों को यह समझाया कि जीवन में खुशहाल रहने और मानसिक रूप से संतुष्ट होने के लिए किसी दूसरे रिश्ते का होना कतई अनिवार्य नहीं है। अपने वजूद से प्यार करना, अपने दबे हुए सपनों को खुली हवा में जीना और अपनी तय की गई शर्तों पर जिंदगी की गाड़ी चलाना अपने आप में एक बेहद खूबसूरत और खास अनुभव है। ये वो फिल्में हैं जिन्होंने बहुत खूबसूरती से यह साबित किया कि अकेलापन कोई कमजोरी नहीं है, बल्कि यह खुद को गहराई से जानने और समझने का सबसे बड़ा अवसर हो सकता है। सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि इस चुनिंदा सूची में तीन ब्लॉकबस्टर, चार हिट और तीन फ्लॉप फिल्में शामिल हैं, जिनकी प्रासंगिक सीख आज के दौर में भी उतनी ही दमदार और हर दिल को छू लेने वाली है जितनी रिलीज के वक्त हुआ करती थी।
जब वी मेट और खुद की अहमियत
मशहूर निर्देशक इम्तियाज अली के निर्देशन में बनी फिल्म ‘जब वी मेट’ में करीना कपूर खान द्वारा निभाया गया ‘गीत’ का किरदार अपनी जिंदगी से बेहद बेपनाह प्यार करता है। फिल्म की कहानी में जब तक प्यार का कोई दूसरा मोड़ नहीं आता, तब तक गीत का यह बेबाक अंदाज और मस्तमौला मिजाज दर्शकों को यह सिखाता है कि आपको अपनी खुद की वैल्यू या आंतरिक कीमत समझने के लिए किसी बाहरी इंसान के अप्रूवल या वैलिडेशन की कतई कोई जरूरत नहीं होती। यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर एक बहुत बड़ी ब्लॉकबस्टर साबित हुई थी और इसके संवाद आज भी लोगों की जुबान पर हैं।
लक बाय चांस और अकेले खड़े होने का साहस
निर्देशक जोया अख्तर की यह पहली फिल्म मुंबई जैसे विशाल और सपनों से भरे शहर में इंसानी महत्वाकांक्षा और अकेलेपन की बेहद कड़वी सच्चाई को हमारे सामने रखती है। साल 2009 में सिनेमाघरों में आई ‘लक बाय चांस’ फिल्म में कोंकणा सेन शर्मा ने संघर्षरत एक्ट्रेस सोना का बेहद यथार्थवादी किरदार अदा किया था। यह फिल्म मुंबई की रंगीन फिल्म इंडस्ट्री की चकाचौंध के ठीक पीछे छिपे हुए संघर्ष, महत्वाकांक्षा और अकेलेपन को पूरी ईमानदारी के साथ पर्दे पर उतारती है। इसके अलावा सोना का यह किरदार हमें यह भी सिखाता है कि जब आपका कोई करीबी पार्टनर आपको धोखा दे या सिर्फ अपनी निजी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए आपका इस्तेमाल करे, तो अपनी राहें बिल्कुल अलग चुनकर अकेले खड़े हो जाना ही आपका सबसे बड़ा और सच्चा आत्मसम्मान होता है। हालांकि बॉक्स ऑफिस के लिहाज से यह फिल्म फ्लॉप साबित हुई थी, लेकिन जाते-जाते यह दर्शकों को एक बहुत ही गहरी और अमूल्य सीख दे गई।
आयशा और अपनी शर्तों पर जीने की कला
लेखिका जेन ऑस्टेन के दुनिया भर में मशहूर उपन्यास ‘आयशा’ पर आधारित इस फिल्म में सोनम कपूर द्वारा निभाया गया आयशा का किरदार अपनी व्यक्तिगत पसंद, फैसलों और अपने लाइफस्टाइल को लेकर बेहद आश्वस्त नजर आता है। फिल्म दर्शकों को एक बहुत ही साफ और मजबूत मैसेज देती है कि समाज चाहे आपके बारे में पीठ पीछे कुछ भी बातें करे, अपनी तय की गई शर्तों पर खुलकर जीना ही जीवन का सबसे सुखद और संतोषजनक एक्सपीरियंस होता है। निर्देशक राजश्री ओझा के निर्देशन में बनी यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप जरूर रही, लेकिन इसका मुख्य लीड किरदार हर दर्शक को अपने खुद के फैसलों पर अटूट विश्वास रखना जरूर सिखाता है।
तनु वेड्स मनु और बेबाक अंदाज
निर्देशक आनंद एल. राय की इस सुपरहिट फिल्म में कंगना रनौत द्वारा अभिनीत तनु का किरदार एक ऐसी निडर और बेबाक लड़की का है जो पारंपरिक समाज के द्वारा तय किए गए तमाम खांचों और दायरों में ढलने से साफ इनकार कर देती है। भले ही यह फिल्म ऊपर से एक पारंपरिक लव स्टोरी जैसी दिखाई देती हो, लेकिन तनु हमेशा अपनी खुद की पसंद और अपने फैसलों को जिंदगी में सबसे ऊपर रखती है, भले ही इसके लिए उसे समाज के लोगों की तीखी आलोचना का सामना क्यों न करना पड़े। यही इस फिल्म की सबसे बड़ी यूएसपी थी जिसने देखने वालों के दिलों पर एक गहरी और अमूल्य छाप छोड़ी। यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर एक बड़ी हिट के रूप में दर्ज हुई।
इंग्लिश विंग्लिश और महिला की स्वतंत्र पहचान
साल 2012 में निर्देशिका गौरी शिंदे के निर्देशन में बड़े पर्दे पर आई फिल्म ‘इंग्लिश विंग्लिश’ में दिवंगत अभिनेत्री श्रीदेवी ने शशि नाम की एक साधारण घरेलू शादीशुदा महिला का शानदार किरदार निभाया था। जब शशि परिवार से दूर बिल्कुल अकेले न्यूयॉर्क शहर की यात्रा पर जाती है, तब उसे इस बात का गहरा अहसास होता है कि एक समर्पित पत्नी और एक ममतामयी मां होने के अलावा भी उसकी अपनी खुद की एक अलग व्यक्तिगत पहचान और मजबूत स्वाभिमान है। यह सुपरहिट फिल्म समाज को यह बहुत जरूरी संदेश देती है कि हर इंसान की अपनी एक खास स्वतंत्र पहचान होती है जो किसी भी सामाजिक रिश्ते की मोहताज नहीं होती है।
क्वीन और सिंगलहुड का जश्न
निर्देशक विकास बहल द्वारा बनाई गई यह फिल्म भारतीय सिनेमा के इतिहास में ‘सिंगलहुड’ यानी अकेले रहने के विषय पर बनी सबसे बेहतरीन और यादगार फिल्मों में से एक मानी जाती है। अपनी शादी टूटने के बाद फिल्म की मुख्य किरदार रानी पूरी तरह से अकेले ही अपने हनीमून की यात्रा पर निकल पड़ती है। अकेले बैठकर खाना खाना, नई जगहों पर घूमना और बेफिक्र होकर नाचना उसे इस बात का अहसास कराता है कि जिंदगी में खुद को पूरी तरह से पूर्ण महसूस करने के लिए किसी भी पुरुष के साथ की कोई आवश्यकता नहीं होती है। यह फिल्म हमें यह सिखाती है कि जीवन किसी एक रिश्ते के टूट जाने या खत्म हो जाने से कभी खत्म नहीं होता है, बल्कि वहीं से एक नई शुरुआत होती है। यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर एक बहुत बड़ी ब्लॉकबस्टर साबित हुई थी।
दिल धड़कने दो और घुटन भरे रिश्तों से आजादी
इस बहुचर्चित फिल्म में प्रियंका चोपड़ा द्वारा निभाया गया फराह का किरदार एक ऐसी घुटन भरी शादी में बुरी तरह फंसा हुआ दिखाया गया है जो उसे अंदर से तोड़ रही है। एक विशाल क्रूज शिप के सफर के दौरान जब वह खुद को चुनने का और उस दमघोटू रिश्ते से हमेशा के लिए बाहर निकल आने का साहसिक फैसला करती है, तो वह दृश्य हर उस इंसान के लिए एक बहुत बड़ी प्रेरणा बन जाता है जो अपने आत्मसम्मान को बचाने के लिए अकेले ही आगे बढ़ने का साहस जुटा रहा होता है। दर्शकों के बीच यह फिल्म एक सेमी हिट फिल्म साबित हुई थी।
पीकू और अपनी शर्तों पर आत्मनिर्भरता
निर्देशक शूजीत सरकार की चर्चित फिल्म ‘पीकू’ में दीपिका पादुकोण का किरदार अपनी मर्जी से सिंगल रहने वाली यानी सिंगल बाई चॉइस का है। पीकू अपने पेशेवर करियर, अपने बुजुर्ग पिता अमिताभ बच्चन की देखभाल और अपनी पूरी निजी लाइफ को पूरी तरह से अकेले ही बहुत अच्छे से संभालने में पूरी तरह सक्षम है। अपने करियर, अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों और अपनी निजी जिंदगी के बीच एक बेहतरीन संतुलन बिठाती हुई पीकू इस रूढ़िवादी सोच को जोरदार चुनौती देती है कि हर महिला की जिंदगी का अंतिम और एकमात्र लक्ष्य सिर्फ और सिर्फ शादी ही होना चाहिए। बॉक्स ऑफिस पर यह फिल्म एक बड़ी ब्लॉकबस्टर साबित हुई थी।
हसीन दिलरुबा और जटिल मानवीय भावनाएं
निर्देशक विजिल मैथ्यू द्वारा निर्देशित इस फिल्म में तापसी पन्नू द्वारा निभाया गया रानी का किरदार कई तरह के ग्रे शेड्स से भरा हुआ और काफी जटिल है। यह फिल्म खासतौर पर उन तमाम लोगों के लिए बनाई गई है जो इस बात से पूरी तरह थक चुके हैं कि आखिरकार समाज महिलाओं को किस सांचे में ढला हुआ देखना चाहता है। यह फिल्म एक ऐसी साहसी महिला की कहानी कहती है जो अपने निजी फैसलों और अपनी भावनाओं को समाज की किसी भी संकीर्ण कसौटी पर नहीं तौलती है। यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर एक हिट फिल्म साबित हुई थी।
गहराइयां और खुद की तलाश
निर्देशक शकुन बत्रा की इस फिल्म में दीपिका पादुकोण द्वारा अभिनीत अलिषा का किरदार आधुनिक रिश्तों और जीवन की तमाम जटिल उलझनों में बुरी तरह फंसा हुआ नजर आता है। हालांकि गहराइयां बॉक्स ऑफिस पर एक फ्लॉप फिल्म साबित हुई थी, लेकिन यह फिल्म पर्दे पर बहुत गहराई से यह दिखाती है कि जरूरी नहीं कि दुनिया के हर रिश्ते का अंत हमेशा एक खुशनुमा मोड़ पर हो, बल्कि कभी-कभी अपनी जिंदगी में अकेले रहकर खुद को दोबारा तलाशना ही इंसान के जीवन का सबसे असली और महत्वपूर्ण पड़ाव साबित होता है।



















