भारत और पाकिस्तान के विभाजन पर कई फिल्में बनी हैं, लेकिन वर्ष 1998 में दर्शकों के सामने आई एक पीरियड ड्रामा फिल्म इस ऐतिहासिक त्रासदी को पेश करने के अपने अनूठे दृष्टिकोण के कारण आज भी विशेष स्थान रखती है। यह कहानी किसी राजनीतिक गलियारे या युद्ध के मैदान की गाथा नहीं सुनाती, बल्कि 1947 के खौफनाक दौर को एक 8 साल की मासूम बच्ची की नजरों से बयां करती है। बंटवारे की आग में जलते समाज और बिखरते मानवीय रिश्तों की यह दास्तान हर देखने वाले के दिल को झकझोर कर रख देती है।
बाप्सी सिधवा के उपन्यास पर आधारित लाहौर की कहानी
इस प्रभावशाली फिल्म का निर्देशन प्रसिद्ध फिल्ममेकर दीपा मेहता ने किया था। फिल्म की पटकथा बाप्सी सिधवा द्वारा लिखे गए विख्यात उपन्यास ‘क्रैकिंग इंडिया’ पर आधारित है। पूरी कहानी वर्ष 1947 के आसपास तत्कालीन लाहौर शहर की पृष्ठभूमि में रची गई है, जहां आठ साल की एक पारसी बच्ची लेनी अपनी दुनिया में खुशी-खुशी जी रही है। फिल्म में नन्हीं लेनी की केंद्रीय भूमिका को बाल कलाकार मैया सेठना ने बेहद जीवंत ढंग से निभाया है।
लेनी एक समृद्ध और संभ्रांत पारसी परिवार से आती है। उस छोटी सी उम्र में उसके लिए धर्म, जाति या संप्रदाय की कोई दीवारें मौजूद नहीं थीं। उसके आसपास की दुनिया प्यार और भाईचारे से भरी हुई थी। उसकी देखभाल करने वाली आया शांता उसके दिल के बेहद करीब थी। शांता का किरदार अभिनेत्री नंदिता दास ने निभाया है, जिनकी मासूमियत और सहज अभिनय ने इस भूमिका में जान फूंक दी। शांता के इर्द-गिर्द घूमने वाले सामाजिक दायरे में दो पुरुष दिल नवाज और हसन मुख्य रूप से शामिल हैं, जिनके साथ उसके भावनात्मक और प्रेम संबंधों का ताना-बाना पूरी कहानी को आगे बढ़ाता है।
बंटवारे की आग में टूटती दोस्ती और नफरत का दौर
फिल्म की भूमिका में दिल नवाज का अहम किरदार अभिनेता आमिर खान ने निभाया है, जबकि हसन की भूमिका में राहुल खन्ना नजर आते हैं। कहानी की शुरुआत में लाहौर का माहौल काफी सामान्य और सौहार्दपूर्ण दिखाई देता है। विभिन्न धर्मों और समुदायों के लोग आपस में मिल-जुलकर रहते हैं, एक-दूसरे के सुख-दुख में शरीक होते हैं और हंसी-खुशी समय बिताते हैं। हालांकि, जैसे-जैसे 1947 के विभाजन की घोषणा और उसकी रूपरेखा सामने आती है, वैसे-वैसे सदियों पुराने इन रिश्तों में अविश्वास की गहरी दरारें पड़ने लगती हैं।
सांप्रदायिक तनाव बढ़ने के साथ ही लोगों का आपसी भरोसा नफरत और कट्टरता में बदलने लगता है। इस सामाजिक बदलाव की सबसे दुखद मार दिल नवाज के चरित्र पर पड़ती है। शुरुआत में जो व्यक्ति शांता के प्रति गहरा प्रेम, अपनापन और संवेदनशीलता दिखाता था, वही हिंसा और सांप्रदायिकता के माहौल में धीरे-धीरे बदलने लगता है। शांता और हसन के बीच बढ़ती नजदीकियों को देखकर उसके भीतर ईर्ष्या और जलन की भावना घर कर लेती है। नतीजा यह होता है कि व्यक्तिगत भावनाएं और सांप्रदायिक नफरत आपस में उलझ जाती हैं, जिससे कहानी एक अत्यंत मार्मिक और दुखद मोड़ पर जाकर खत्म होती है।
दीपा मेहता का सिनेमाई दृष्टिकोण और ओटीटी पर उपलब्धता
निर्देशक दीपा मेहता हमेशा से ही अपने बेहतरीन विजन और बोल्ड विषयों पर फिल्में बनाने के लिए जानी जाती रही हैं। अपनी फिल्मों के माध्यम से उन्होंने महिलाओं के संघर्ष, उनके दृष्टिकोण और उनके अधिकारों को दुनिया के सामने प्रमुखता से रखा है। इस पीरियड ड्रामा में भी उन्होंने स्पष्ट रूप से रेखांकित किया है कि विभाजन जैसे विकट समय में महिलाओं की जिंदगी में किस प्रकार की उथल-पुथल मची और उन्हें किस तरह की पीड़ा का सामना करना पड़ा।
दीपा मेहता की यह कालजयी रचना दिखाती है कि कैसे वक्त के साथ इंसानी भावनाएं बदल सकती हैं और परिस्थितियां इंसान को क्या बना सकती हैं। यदि आप भारतीय सिनेमा की इस बेहतरीन और मार्मिक कृति को देखना चाहते हैं, तो यह फिल्म वर्तमान में ओटीटी प्लेटफॉर्म जियो हॉटस्टार पर देखने के लिए उपलब्ध है।



















