अल्बानिया के कई प्रमुख शहरों में सुरक्षा बलों और उग्र प्रदर्शनकारियों के बीच लंबे समय बाद बेहद गंभीर हिंसक टकराव देखने को मिला है। राजधानी तिराना के अलावा डुरेस, श्कोडर, कोर्चे और व्लोरा जैसे प्रमुख शहरों में तनाव फैल गया है, जहाँ सरकारी दफ्तरों से लेकर कुछ निजी प्रतिष्ठानों तक को निशाना बनाया गया है। शिक्षा और किताबों के भारी खर्च तथा बढ़ती महंगाई के खिलाफ छात्रों द्वारा शुरू किए गए इस आंदोलन में माध्यमिक स्कूलों के छात्र भी शामिल हो गए, जिससे विरोध प्रदर्शनों का दायरा अचानक काफी बड़ा हो गया। तिराना की सड़कों पर स्थिति उस समय बेकाबू हो गई जब नकाबपोश प्रदर्शनकारियों ने सुरक्षाकर्मियों पर पथराव शुरू किया। इसके जवाब में दंगा-रोधी पुलिस ने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पानी की बौछारों, आंसू गैस और लाठीचार्ज का सहारा लिया। संघर्ष के दौरान शिक्षा मंत्रालय की एक पूरी मंजिल में आग लगा दी गई, जबकि कई अन्य सरकारी संस्थान भी आगजनी की चपेट में आ गए।
सड़कों पर उतरा आक्रोश और पुलिसिया कार्रवाई
प्रदर्शनों के हिंसक रूप लेने के दौरान कई दिल दहला देने वाले दृश्य सामने आए। पुलिस कार्रवाई के दौरान गंभीर रूप से घायल एक युवक को जब लोग वहां से ले जा रहे थे, तो उसका टूटा हुआ पैर लटक रहा था और वह असहनीय दर्द से कराह रहा था। इस घटना के बाद लोगों में गुस्सा और भड़क गया। हालांकि बाद में प्रशासनिक स्तर पर माफी भी मांगी गई, लेकिन इससे जमीन पर तनाव कम नहीं हो सका। सड़कों पर उतरे युवा प्रदर्शनकारियों का कहना है कि वे लंबे समय से शांतिपूर्ण तरीके से अपनी आवाज उठा रहे थे, जिसे सरकार ने पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। प्रदर्शन में शामिल लिविया नाम की एक युवती ने रोष व्यक्त करते हुए कहा कि पांच महीने तक चले शांतिपूर्ण विरोध का जवाब केवल अपमान और उपहास से दिया गया, जो यह संदेश था कि सरकार उनकी आवाज सुनने को तैयार नहीं है। वहीं ब्रुनेला नाम की एक अन्य प्रदर्शनकारी ने आगे के हालात को लेकर चिंता जताते हुए कहा कि मीडिया और सत्तापक्ष की प्रतिक्रियाएं बेहद डरावनी हैं और यह केवल कुछ लोगों का नहीं बल्कि पूरे अल्बानियाई युवाओं की आवाज है।
फ्लेमिंगो आंदोलन से हिंसक टकराव तक का सफर
मौजूदा हिंसक घटनाक्रम अचानक पैदा नहीं हुआ, बल्कि इसकी पृष्ठभूमि में महीनों से चल रहा असंतोष है। इस गर्म मौसम के दौरान राजधानी तिराना के केंद्र में लगातार लगभग 140 दिनों तक हर शाम शांतिपूर्ण फ्लेमिंगो आंदोलन चलाया गया था। इन प्रदर्शनों में शामिल लोग गुलाबी फ्लेमिंगो की तस्वीरें हाथों में लेकर प्रधानमंत्री एदी रामा के इस्तीफे की मांग कर रहे थे, जो वर्तमान में अपने चौथे कार्यकाल में हैं। यह शांतिपूर्ण आंदोलन मूल रूप से एड्रियाटिक तट पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दामाद जेरेड कुशनर से जुड़ी एक मेगा पर्यटन परियोजना के विरोध में शुरू हुआ था। प्रदर्शनकारियों का स्पष्ट तर्क था कि तटीय शहर व्लोरा के निकट एक द्वीप पर यदि इस विलासितापूर्ण विकास परियोजना को आगे बढ़ाया गया, तो वहां पाए जाने वाले दुर्लभ पक्षी पूरी तरह विलुप्त हो जाएंगे। उस आंदोलन की खासियत यह थी कि उसमें बच्चे, माता-पिता और बुजुर्ग तक शामिल होते थे और वे हर रात प्रदर्शन खत्म होने के बाद स्थल की सफाई खुद करते थे।
भ्रष्टाचार के आरोप और मंत्रियों पर गिरती गाज
पर्यावरण चिंताओं के साथ-साथ सरकार में उच्च स्तर पर फैले भ्रष्टाचार के आरोपों ने भी जनता के आक्रोश को हवा दी है। मंत्रियों और वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। इस राजनीतिक हलचल के बीच एक उप प्रधानमंत्री पहले ही देश छोड़कर भाग चुके हैं, जबकि जांच चलने के कारण एक अन्य उप प्रधानमंत्री को पद छोड़ने का आधिकारिक आदेश दिया जा चुका है। फ्लेमिंगो आंदोलन से जुड़े लोग किसी भी राजनीतिक दल से अपना संबंध होने से पूरी तरह इनकार करते हैं। उनके मुख्य नारों में प्रधानमंत्री एदी रामा और मुख्य विपक्षी नेता साली बेरिशा दोनों को जेल भेजने की मांग शामिल रही है। गौरतलब है कि साली बेरिशा देश के पूर्व प्रधानमंत्री और पूर्व राष्ट्रपति रह चुके हैं और वर्तमान में मुख्य विपक्षी दल डेमोक्रेटिक पार्टी के नेता हैं। महीनों चले शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के बावजूद जब सरकार ने मांगों पर कोई सकारात्मक कदम नहीं उठाया, तो छात्रों और युवाओं का धैर्य जवाब दे गया और आंदोलन इस नए, उग्र चरण में पहुंच गया।
राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप और साजिश के दावे
हिंसा के बीच दर्जनों पुलिसकर्मियों के घायल होने की पुष्टि हुई है। यूरोपीय संघ की सदस्यता के प्रबल दावेदारों में गिने जाने वाले अल्बानिया पर अब पूरे यूरोप की निगाहें टिकी हैं। प्रधानमंत्री एदी रामा ने हिंसा प्रभावित और क्षतिग्रस्त सरकारी इमारतों का मुआयना किया और इन दंगों के पीछे मुख्य विपक्षी नेता साली बेरिशा का हाथ होने का सीधा आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि यह सब उसी हाथ की करतूत है जिसने अल्बानियाई विपक्ष का गला घोंट रखा है और जिसने पहले भी देश को जलाया और नष्ट किया है। प्रधानमंत्री ने साफ लफ्जों में इस्तीफा देने से इनकार करते हुए कहा कि वे वैध चिंताओं को सुनेंगे, उनका समाधान करेंगे और देश को आगे ले जाएंगे। दूसरी तरफ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि साली बेरिशा के समर्थकों की संख्या हाल के महीनों में काफी कम रही है, ऐसे में उनके द्वारा इतने बड़े पैमाने पर अशांति फैलाने की क्षमता को लेकर संदेह है, हालांकि वे इस स्थिति का राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश जरूर कर सकते हैं। इसके अलावा स्थानीय मीडिया और खुद प्रधानमंत्री ने बिना नाम लिए विदेशी ताकतों की संलिप्तता की ओर भी इशारा किया है, जिसमें सर्बिया पर अल्बानिया की यूरोपीय संघ में प्रगति से जलने के निराधार दावे किए जा रहे हैं। प्रधानमंत्री ने सवाल उठाया कि जब भी अल्बानिया अपने ऐतिहासिक यूरोपीय लक्ष्य के करीब पहुंचता है, ठीक उसी समय ऐसी आग भड़कना कोई संयोग नहीं हो सकता। फिलहाल कई शहरों में फैला यह उपद्रव नियंत्रण में बताया जा रहा है, लेकिन पर्यटन और अंतरराष्ट्रीय छवि को लेकर सरकार की चिंताएं बढ़ गई हैं।



















